बाड़मेर की बहू अब बनेगी गुजरात में जज, ससुराल में घूंघट में रहकर की तैयारी, एक कमरे को बनाया रीडिंग रूम
News In Short
- राजस्थान में बाड़मेर की बहू ने गुजरात में बनेगी जज।
- दो बार असफल रहीं, तीसरे प्रयास में मिली कामयाबी।
- घूंघट में रहकर की तैयारी, नहीं बना कामयाबी में बाधा।
- ससुराल में तैयारी के लिए एक कमरे को दी हॉस्टल की शक्ल।
- दीपू कंवर ने सफलता का श्रेय ससुराल वालों को दिया।
News In Detail
राजस्थान के रेतीले धोरों से निकलकर जब बेटी या बहू सफलता के आसमान को छूती है, तो वह सोच में बदलाव का संकेत होती है। बाड़मेर जिले के जालीपा की बहू दीपू कंवर ने घूंघट में रहकर कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। शादी के 7 साल बाद और एक बच्चे की मां होने की जिम्मेदारी निभाते हुए दीपू ने गुजरात न्यायिक सेवा में 79वीं रैंक हासिल कर जज बनने का अपना सपना सच कर दिखाया है। घूंघट ओढ़े इस बहू की सफलता के पीछे ससुराल वालों का पूरा सहयोग रहा।
ससुराल का एक कमरा बना 'हॉस्टल'
दीपू कंवर मूल रूप से गुजरात के जामनगर की रहने वाली हैं, लेकिन उनकी कर्मभूमि बाड़मेर का जालीपा गांव बना। करीब 7 साल पहले लोकेंद्र सिंह के साथ उनका विवाह हुआ। आमतौर पर ग्रामीण परिवेश में शादी के बाद घंघट ओढ़े बहुओं के कंधों पर घर-काज और चूल्हे-चौके की जिम्मेदारी आ जाती है, लेकिन दीपू के मामले में कहानी अलग थी।
उन्होंने अपने ससुराल के ही एक कमरे को 'हॉस्टल' की शक्ल दे दी थी। वहां उन्होंने दुनिया से कटकर दिन-रात अपनी किताबों के बीच गुजारे। दीपू बताती हैं कि तैयारी का यह सफर आसान नहीं था। दो बार असफलता हाथ लगी, लेकिन ससुराल वालों के अटूट विश्वास ने उन्हें टूटने नहीं दिया। तीसरे प्रयास में उन्होंने अपनी मंजिल पा ही ली।
जब ससुर की प्यार भरी डांट बनी ताकत
दीपू की इस कामयाबी में सबसे अनोखा पहलू उनके ससुर थानसिंह का समर्थन रहा। अक्सर देखा जाता है कि बहुओं पर घर के कामों का दबाव होता है, लेकिन यहां नजारा उल्टा था। जब भी घूंघट में रहकर दीपू घर के रोजमर्रा के कामों में हाथ बंटाने की कोशिश करतीं, तो उनके ससुर उन्हें प्यार से डांटते हुए कहते, बीनणी, पढ़ाई करो, घर के काम के लिए हम सब हैं।
सफलता के बाद घूंघट में ही रहकर दीपू कहती हैं, ससुरजी के वे शब्द मेरे लिए टॉनिक से कम नहीं थे। इस सफलता में घूंघट कभी बाधा नहीं बना। यह किसी बहू के लिए सम्मान का प्रतीक है।
7 साल का संघर्ष और 79वीं रैंक
दीपू कंवर की सफलता केवल एक परीक्षा पास करना नहीं है, बल्कि बाधाओं को पार करना है। एक बेटी की मां होने के नाते पढ़ाई के लिए वक्त निकालना किसी चुनौती से कम नहीं था। उनकी सास समद कंवर और पति लोकेंद्र सिंह ने न केवल उनका हौसला बढ़ाया, बल्कि यह सुनिश्चित किया कि दीपू को पढ़ाई के बीच कोई व्यवधान न आए।
अपनी सफलता का श्रेय देते हुए दीपू भावुक होकर कहती हैं कि समाज में माना जाता है कि शादी के बाद ससुराल की जिम्मेदारियों के बीच सपने पीछे छूट जाते हैं। लेकिन मेरे ससुराल वालों ने मुझे जज बनने के लिए प्रेरित किया। अगर परिवार बेटियों और बहुओं के पंखों को उड़ान देने का फैसला कर ले, तो वे किसी भी मुकाम तक पहुँच सकती हैं।
खुशी का ठिकाना नहीं, गांव में जश्न
जैसे ही गुजरात न्यायिक सेवा के परिणाम घोषित हुए और दीपू का नाम 79वीं रैंक पर चमका। जालीपा गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। 7 साल के लंबे इंतजार और कड़ी मेहनत के बाद मिली इस कामयाबी ने यह साबित कर दिया कि उम्र या वैवाहिक स्थिति कभी सपनों के आड़े नहीं आती।
दीपू की यह कहानी आज उन हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो शादी के बाद अपने करियर को खत्म मान लेती हैं। बाड़मेर की इस जज बहू ने दिखा दिया है कि यदि ससुर 'पिता' बनकर और ससुराल 'मायका' बनकर साथ खड़ा हो जाए, तो कोई भी लक्ष्य नामुमकिन नहीं है।
मुख्य बिंदु एक नजर में:
नाम: दीपू कंवर (बाड़मेर की बहू, जामनगर की बेटी)
उपलब्धि: गुजरात न्यायिक सेवा में चयन (79वीं रैंक)
प्रेरणा: ससुर थानसिंह और पति लोकेंद्र सिंह का सहयोग
संघर्ष: शादी के 7 साल बाद और तीसरे प्रयास में सफलता
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