फर्जी पैकिंग मामले में पुलिस की चूक, कोर्ट का रिमांड से इंकार, आरोपियों को दी जमानत
जयपुर के झोटवाड़ा थाना इलाके में प्रतिष्ठित सरस डेयरी ब्रांड के नाम से फर्जी मोनोकार्टन, पॉलिपैक और अन्य पैकिंग सामग्री तैयार करने व इस्तेमाल करने के मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, जयपुर महानगर-द्वितीय की अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
अदालत ने अनिवार्य विधिक प्रावधानों और प्रक्रिया का पालन किए बिना आरोपियों को गिरफ्तार किए जाने के आधार पर पुलिस रिमांड की अर्जी को खारिज कर दिया।
इसके साथ ही कोर्ट ने दोनों आरोपियों को जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए।
अदालत ने जांच अधिकारी की घोर लापरवाही के संबंध में उचित विभागीय कार्रवाई के लिए उनके उच्च अधिकारियों को पत्र लिखने को भी कहा है।
यह है मामला
पुलिस थाना झोटवाड़ा में 29 सितंबर 2026 को FIR दर्ज की गई थी। यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), कॉपीराइट अधिनियम की धारा 63 व 64 तथा ट्रेडमार्क अधिनियम 1999 की धारा 103 व 104 के तहत दर्ज की गई थी। मामले में आरोप था कि निवारू रोड, झोटवाड़ा में सरस ब्रांड की नकली पैकिंग सामग्री तैयार कर असल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था।
अनुसंधान के दौरान पुलिस ने नामजद आरोपी श्यामसुंदर उर्फ श्याम सिंह चौहान और प्रमोद कुमार खंडेलवाल को 30 सितंबर 2026 की रात गिरफ्तार किया था। इसके बाद 1 अक्टूबर 2026 को अनुसंधान अधिकारी एसीपी झोटवाड़ा शिव कुमार भारद्वाज ने दोनों आरोपियों को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, जयपुर महानगर-द्वितीय के समक्ष पेश कर 8 दिन का पुलिस रिमांड मांगा।
आरोपियों के एडवोकेट महेंद्र गुप्ता व मनीष पारीक ने रिमांड के विरोध में कहा कि पुलिस ने जरुरी कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन किया है।
क्या कहा अदालत ने
अदालत ने केस डायरी और पत्रावली के आधार पर कहा कि सात वर्ष या उससे कम की सजा वाले अपराध में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(3) [पूर्ववर्ती CrPC की धारा 41A] के तहत आरोपी को नोटिस जारी किया जाना अनिवार्य कानूनी प्रावधान है।
केस डायरी में आरोपियों को नोटिस नहीं देने का कोई कोई ठोस आधार या पर्याप्त कारण नहीं लिखे हैं। इसके अलावा,गिरफ्तारी के वक्त आरोपियों से कोई माल इत्यादि की बरामदगी भी नहीं हुई है।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर कहा कि इन फैसलों में दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार सात साल तक की सजा वाले मामलों में नोटिस प्रक्रिया की पालना अनिवार्य है। इसका उल्लंघन आरोपियों के संविधानिक व कानूनी अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
घोर लापरवाही है यह
अदालत ने अनुसंधान अधिकारी की इस प्रक्रियात्मक चूक को घोर लापरवाही करार देते हुए पुलिस रिमांड की अर्जी को खारिज कर दिया और आरोपियों को 50,000-50,000 रुपये की जमानत राशि तथा मुचलका पेश करने पर तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने मामले के अनुसंधान अधिकारी की लापरवाही पर विभागीय कार्रवाई के लिए पुलिस के उच्च अधिकारियों को पत्र लिखने का आदेश भी दिया है।