बाल विवाह की बेड़ियों से आजादी, 9 साल बाद विवाह निरस्त, अब फिर शुरू करेगी पढ़ाई
News In Short
- जोधपुर के पारिवारिक न्यायालय का बाल विवाह को लेकर बड़ा फैसला।
- खुशबू का 9 साल बाद कानूनी तौर पर बाल विवाह हुआ निरस्त।
- 12 साल की उम्र में हुआ था बाल विवाह, आ गई थी डिप्रेशन में।
- विवाह से मुक्ति के लिए लड़ी कानूनी जंग, एक संस्था बनी सहयोगी।
- विवाह रद्द होने के बाद अब खुशबू फिर से अपनी पढ़ाई कर सकेगी।
News In Detail
Jodhpur: राजस्थान में बाल विवाह के खिलाफ सामाजिक जंग में फिर न्याय की जीत हुई है। जोधपुर के पारिवारिक न्यायालय संख्या-2 ने एक फैसला सुनाते हुए खुशबू के बाल विवाह को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। महज 12 साल की उम्र में अनजाने में जिस रिश्ते में उसे बांधा गया था, उससे पूरे 9 साल बाद अब उसे कानूनी तौर पर आजादी मिल गई है।
9 साल का लंबा इंतजार
21 साल की हो चुकी खुशबू का विवाह साल 2016 में जोधपुर जिले में सामाजिक दबाव के चलते कर दिया गया था। उस समय वह केवल 12 वर्ष की थी। विवाह के मायने भी नहीं समझती थी। जैसे-जैसे वह बड़ी हुई, ससुराल पक्ष की ओर से गौने (विदाई) का दबाव बढ़ने लगा। अपनी शिक्षा और भविष्य को लेकर सजग खुशबू इस रिश्ते को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी।
ससुराल पक्ष और समाज के दबाव ने उसे मानसिक रूप से डिप्रेशन की स्थिति में धकेल दिया था। इसी दौरान उसे बाल विवाह के खिलाफ काम करने वाली संस्था सारथी ट्रस्ट और उसकी मैनेजिंग ट्रस्टी व प्रख्यात मनोवैज्ञानिक डॉ. कृति भारती की मुहिम के बारे में पता चला।
न्यायालय का कड़ा संदेश
खुशबू ने डॉ. कृति भारती के सहयोग से न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। मामले की गंभीरता को देखते हुए जज वरुण तलवार ने बाल विवाह के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने न केवल खुशबू के विवाह को शून्य घोषित किया, बल्कि समाज को कड़ा संदेश भी दिया कि बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के लिए आधुनिक समाज में कोई जगह नहीं है। नौ साल बाद मिली इस आजादी ने खुशबू के चेहरे पर खोई हुई मुस्कान वापस ला दी है।
अब वापस करेगी पढ़ाई
खुशबू का सबसे पहला टारगेट अपनी अधूरी छूटी हुई पढ़ाई को फिर से शुरू करना है। डॉ. कृति भारती के मार्गदर्शन में वह अब अपने करियर और उज्ज्वल भविष्य की नई इबारत लिखने को तैयार है।
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