हाई कोर्ट ने 16 साल की रेप पीड़िता को 7 महीने के गर्भ के अबॉर्शन की अनुमति दी

Jageshwar prasad | May 24, 2026, 11:30 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान हाईकोर्ट ने 16 साल की नाबालिग रेप पीड़िता को 7 महीने के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी। पीड़िता को गंभीर एनीमिया है। कोर्ट ने कहा अनचाहे गर्भ को धारण करना अनुच्छेद-21 का उल्लंघन। राज्य सरकार वहन करेगी पूरा खर्च।

News In Short

  • 16 साल की नाबालिग रेप पीड़िता को राजस्थान हाईकोर्ट ने दी गर्भपात की अनुमति।
  • पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट में 7 महीने (27 सप्ताह 4 दिन) के गर्भ की पुष्टि हुई।
  • पीड़िता को गंभीर एनीमिया है, गर्भ धारण करना जानलेवा हो सकता है।
  • कोर्ट ने कहा अनचाहे गर्भ को धारण करना अनुच्छेद-21 का उल्लंघन।
  • राज्य सरकार वहन करेगी इलाज, दवा, यात्रा और परिवार का पूरा खर्च।

News In Detail

राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक बेहद संवेदनशील मामले में 16 साल की नाबालिग रेप पीड़िता को 27 सप्ताह 4 दिन (करीब 7 महीने) के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दे दी है। जस्टिस मुकेश राजपुरोहित की एकल पीठ ने 22 मई को पीड़िता के शारीरिक, मानसिक और संवैधानिक अधिकारों को सर्वोपरि मानते हुए यह फैसला सुनाया है।



कोर्ट के आदेश के बाद जोधपुर कलेक्टर आलोक रंजन ने 22 मई को सीएमएचओ को नोडल अधिकारी नियुक्त कर दिया है और पीड़िता को सिरोही से जोधपुर शिफ्ट करने के लिए एम्बुलेंस रवाना की।



सिरोही जिले का मामला

इस मामले में पीड़ित के दादा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। सिरोही जिले के एक थाना क्षेत्र में नाबालिग के साथ हुए रेप और पॉक्सो के तहत मामला दर्ज किया गया था। जब तक परिवार को घटना और गर्भावस्था का पता चला, तब तक गर्भ 27 सप्ताह 4 दिन (करीब सात महीने) का हो चुका था।



याचिका दायर होने के बाद, कोर्ट ने पहले सिरोही और फिर डॉ. एसएन मेडिकल कॉलेज, जोधपुर में एक विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड का गठन कराया। मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि पीड़िता को गंभीर एनीमिया है और गर्भ 7 महीने का है जिसमें जोखिम है, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टर्स की निगरानी में अबॉर्शन किया जा सकता है।



मजबूर करना अनुच्छेद-21 का उल्लंघन

याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट सपना वैष्णव ने पैरवी करते हुए सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का संदर्भ दिया। उन्होंने बताया कि यह गर्भावस्था बलात्कार का परिणाम है और किसी नाबालिग को इस अवांछित गर्भ को बनाए रखने के लिए मजबूर करना उसकी शारीरिक स्वतंत्रता, प्रजनन अधिकार और गरिमा का उल्लंघन है।



सुनवाई के दौरान जब नाबालिग पीड़ित से पूछा गया, तो उसने भी खुद अदालत के सामने इस गर्भ को समाप्त कराने की इच्छा जताई। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता के सहयोगी एडवोकेट शेरसिंह राठौड़ उपस्थित हुए।



कोर्ट ने दिया सुरक्षित गर्भपात का निर्देश

मामले की गंभीरता को देखते हुए एसएन मेडिकल कॉलेज जोधपुर से संबद्ध हॉस्पिटल को सुरक्षित गर्भपात (मेडिकल टर्मिनेशन प्रक्रिया) कराने के निर्देश दिए। कोर्ट ने आदेश दिया कि इस पूरी प्रक्रिया में पीड़िता के इलाज, दवा, यात्रा और परिवार के रुकने व खाने-पीने का पूरा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी।



भविष्य की कानूनी कार्रवाई के लिए भ्रूण के डीएनए और फॉरेंसिक साक्ष्य सुरक्षित रखने के भी निर्देश दिए गए हैं। हाईकोर्ट के आदेश की पालना में जोधपुर कलेक्टर आलोक रंजन ने जोधपुर सीएमएचओ को नोडल अधिकारी नियुक्त किया। उन्हें मेडिकल रिलीफ सोसायटी के माध्यम से सारा खर्च वहन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।



SOP तय करने पर होगी सुनवाई

इसके अलावा हाईकोर्ट ने पॉक्सो मामलों में गर्भावस्था परीक्षण और मेडिकल प्रक्रिया में जान-बूझकर देरी (सिस्टमैटिक देरी) पर गहरी चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसे मामलों से निपटने के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) की सख्त जरूरत है। SOP तय करने के बड़े मुद्दे पर अब जुलाई के पहले सप्ताह में फिर से सुनवाई होगी।



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