बिना चीर-फाड़ किए एंडोस्कोपी से निकाला 10×10 सेमी का ट्यूमर; राजस्थान में पहली बार ऐसी सफलता

Jageshwar prasad | May 01, 2026, 14:20 IST
Photograph: (the sootr)
एम्स जोधपुर ने राजस्थान में पहली बार ESD तकनीक के जरिए 10×10 सेमी का रेक्टल ट्यूमर बिना ओपन सर्जरी के जरिए सफलतापूर्वक निकाला है। डॉ. आशीष अग्रवाल के नेतृत्व में 8 घंटे चले इस प्रोसिजर से अंग सुरक्षित रहा और मरीज की रिकवरी तेज हुई।

News In Short

  • एम्स जोधपुर ने बिना चीर-फाड़ ESD के जरिए निकाला 10×10 सेमी का विशाल ट्यूमर।
  • गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग की टीम ने 8 घंटे की सूक्ष्म प्रक्रिया के बाद हासिल की सफलता।
  • एंडोस्कोपिक सबम्यूकोसल डिसेक्शन (ESD) तकनीक में कोई चीरा नहीं लगाया जाता।
  • बिना टांके और चीरे के हुए इस ऑपरेशन से मरीज को जल्द मिलेगी अस्पताल से छुट्टी।
  • अब जटिल गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल उपचारों के लिए प्रदेश के मरीजों को बाहर नहीं जाना पड़ेगा।

News In Detail

Jodhpur: राजस्थान में एम्स जोधपुर ने वह कर दिखाया है, जो अब तक चिकित्सा क्षेत्र में बड़ी चुनौती माना जाता था। संस्थान के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के डॉक्टरों ने अपनी सूझबूझ और आधुनिक तकनीक का परिचय देते हुए एक मरीज के मलाशय (Rectum) से 10×10 सेमी आकार का विशाल ट्यूमर बिना किसी ओपन सर्जरी के सफलतापूर्वक बाहर निकाल दिया है। यह उपलब्धि न केवल जोधपुर बल्कि पूरे राजस्थान के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगी।



डॉ. आशीष अग्रवाल के नेतृत्व में यह जटिल प्रक्रिया लगभग 8 घंटे तक चली। यह ट्यूमर लेटरली स्प्रेडिंग ट्यूमर (LST) था, जो मलाशय की दीवार के एक बड़े हिस्से में फैला हुआ था। ESD तकनीक के माध्यम से इसे अत्यंत सूक्ष्मता के साथ मलाशय के अंग को सुरक्षित रखते हुए निकाला गया। यह सफलता एम्स जोधपुर को न्यूनतम इनवेसिव गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल प्रक्रियाओं के क्षेत्र में देश के अग्रणी संस्थानों की श्रेणी में खड़ा करती है।



ESD तकनीक का हुआ इस्तेमाल

आमतौर पर इतने बड़े ट्यूमर के इलाज के लिए पारंपरिक ओपन सर्जरी का सहारा लिया जाता है, जिसमें पेट पर बड़ा चीरा लगाना पड़ता है और रिकवरी में काफी समय लगता है। हालांकि, एम्स के विशेषज्ञों ने एंडोस्कोपिक सबम्यूकोसल डिसेक्शन (ESD) तकनीक का उपयोग किया।



एंडोस्कोपिक सबम्यूकोसल डिसेक्शन (ESD) तकनीक में कोई चीरा नहीं लगाया जाता। मुंह या मलद्वार के रास्ते एक पतली पाइप (एंडोस्कोप) डाली जाती है, जिसके आगे छोटा सा कैमरा और बारीक चाकू लगा होता है। डॉक्टर स्क्रीन पर देखकर अंदर ही अंदर ट्यूमर को काटकर बाहर निकाल लेते हैं।



तेज रिकवरी और कम जटिलताएं

गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आशीष अग्रवाल ने बताया कि इस न्यूनतम इनवेसिव तकनीक के कई फायदे हैं। इसमें सर्जरी की तुलना में अंग को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। संक्रमण और खून बहने जैसी सर्जिकल जटिलताएं न्यूनतम हो जाती हैं। साथ ही मरीज बहुत जल्दी स्वस्थ होकर अपने काम पर लौट सकता है। इस मामले में भी मरीज की स्थिति में तेजी से सुधार हो रहा है और उसे जल्द ही डिस्चार्ज कर दिया जाएगा।



अब जटिल उपचार के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं

एम्स जोधपुर की इस सफलता पर कार्यकारी निदेशक डॉ. गोवर्धन दत्त पुरी ने डॉक्टर्स की टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि एम्स प्रशासन विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस तरह की उच्च विशेषज्ञता वाली प्रक्रियाओं की उपलब्धता से अब राजस्थान के मरीजों को जटिल गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल उपचार के लिए दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों की ओर रुख नहीं करना पड़ेगा।



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