पंचायत चुनाव से पहले गहलोत-पायलट में पिघल रही बर्फ? जयपुर की बैठक में दिखी कांग्रेस की नई केमिस्ट्री
Jaipur: कभी एक-दूसरे पर तीखे हमले। कभी सरकार पर संकट। कभी 'निकम्मा-नाकारा' तो कभी 'गद्दार' जैसे शब्द। राजस्थान कांग्रेस में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच करीब पांच साल तक रिश्ते ऐसे रहे कि पार्टी हाईकमान को बार-बार बीच में आना पड़ा लेकिन बुधवार को जयपुर के कांग्रेस वॉर रूम में तस्वीर कुछ और थी।
गहलोत ने पायलट की चुटकी ली तो उन्होंने भी मुस्कुराते हुए ऐसा जवाब दिया कि पूरी बैठक में ठहाके लग गए। इससे पहले पायलट खुद कार चलाते दिखे। साथ में प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली बैठे थे। यानी पंचायत चुनाव से पहले कांग्रेस की गाड़ी में फिलहाल बड़े नेता एक साथ बैठे नजर आ रहे हैं। सवाल यही है कि क्या गहलोत-पायलट के बीच पुरानी बर्फ पिघल रही? या निकाय चुनाव में अंदरूनी खींचतान से नुकसान उठाने के बाद कांग्रेस अब पंचायत चुनाव से पहले एक जाजम पर बैठकर यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी एक है?
गहलोत ने ली चुटकी, पायलट के जवाब पर लगे ठहाके
जयपुर के कांग्रेस वॉर रूम में बुधवार को पंचायत चुनाव की तैयारियों को लेकर बैठक हुई। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, सचिन पायलट, प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली समेत बड़े नेता पहुंचे। इसी बैठक का एक वीडियो चर्चा में है। गहलोत ने रंधावा और पायलट की तरफ इशारा करते हुए कहा कि राजस्थान में आप सचिन पायलट के इंचार्ज हैं और पंजाब में ये आपके इंचार्ज। पायलट भी कहां पीछे रहने वाले थे। मुस्कुराते हुए बोले कि कोई कहीं का भी इंचार्ज बने लेकिन हम सबके असली इंचार्ज तो आप ही हैं। इसके बाद बैठक में सबकी हंसी छूट गई।
बात हल्की-फुल्की थी लेकिन राजस्थान कांग्रेस की पुरानी राजनीति को देखें तो तस्वीर मायने रखती। यही गहलोत और पायलट कई बार आमने-सामने रहे हैं। बयान ऐसे चले कि विरोधियों को ज्यादा मेहनत ही नहीं करनी पड़ी।
पायलट ने संभाली स्टेयरिंग, डोटासरा-जूली साथ बैठे
वॉर रूम की बैठक से पहले एक और वीडियो सामने आया। सचिन पायलट कार चला रहे थे। उनके साथ गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली बैठे थे। यानी इस बार पायलट सिर्फ नाम के नहीं, कार के भी 'पायलट' थे।इन तस्वीरों के जरिए कांग्रेस के भीतर एक साथ होने का संदेश जाता दिख रहा। इसकी वजह भी साफ है। पंचायत चुनाव सामने हैं और पार्टी निकाय चुनाव जैसी स्थिति दोबारा नहीं चाहती।
निकाय चुनाव में प्रचार से दूर रहे गहलोत-पायलट
हाल के राजस्थान नगर निकाय चुनाव में भाजपा के बड़े नेता पूरे प्रदेश में प्रचार करते दिखे। इसके मुकाबले कांग्रेस का प्रचार ज्यादातर स्थानीय नेताओं के भरोसे रहा। अशोक गहलोत और सचिन पायलट व्यापक चुनाव प्रचार में नहीं उतरे। गहलोत सरकार पर हमले करते रहे लेकिन उम्मीदवारों के लिए प्रदेशभर में सीधा प्रचार नहीं दिखा। पायलट भी बड़े स्तर पर प्रचार में नजर नहीं आए। नतीजों के बाद खुद गहलोत ने कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि अगर भाजपा के रोड शो का जवाब इसी अंदाज में दिया जाता तो कांग्रेस ज्यादा सीटें जीत सकती थी।
राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजों के बाद अंदरूनी खींचतान भी खुलकर सामने आई। कई जगह क्रॉस वोटिंग और पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ जाने की शिकायतें आईं। कांग्रेस ने इन मामलों की जांच के लिए पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी की अगुआई में 9 सदस्यीय कमेटी बनाई। 400 से ज्यादा कांग्रेस पार्षदों की भूमिका की जांच की बात सामने आई है।
अब राजस्थान में पंचायत चुनाव सामने हैं। ऐसे में कांग्रेस निकाय चुनाव की कमियों से आगे बढ़ते हुए इस बार शुरुआत से ही बड़े नेताओं को एक साथ दिखाने की कोशिश कर रही, लेकिन गहलोत-पायलट का एक साथ सहज दिखना इसलिए ज्यादा चर्चा में है, क्योंकि दोनों की राजनीतिक कहानी में कई ऐसे मोड़ आए जब लगा कि अब साथ चलना मुश्किल है। इसकी शुरुआत 2018 में हुई थी।
गहलोत-पायलट के बीच पहला विवाद: 2018 में CM की कुर्सी
2018 के विधानसभा चुनाव से पहले गहलोत और सचिन पायलट एकसाथ प्रचार करते दिखे थे। एक तस्वीर में बाइक पायलट चला रहे थे और पीछे गहलोत बैठे थे। संदेश था कि कांग्रेस एक है। कांग्रेस सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर दोनों की दावेदारी सामने आई। कई दिन तक दिल्ली में खींचतान चली थी। आखिर गहलोत मुख्यमंत्री बने और पायलट को डिप्टी CM और प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। यहीं से दोनों के बीच सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर दूरी और तल्खी बढ़ने लगी।
दूसरा विवाद: अपनी ही सरकार को घेरने लगे पायलट
2019 से 2020 के बीच कई मुद्दों पर पायलट ने अपनी ही सरकार के फैसलों पर सवाल उठाए। मेयर चुनाव के तरीके को लेकर उन्होंने गहलोत सरकार से अलग राय रखी थी। कोटा के जेके लोन अस्पताल में बच्चों की मौत के बाद भी पायलट ने कहा कि एक साल सरकार में रहने के बाद पिछली भाजपा सरकार को जिम्मेदार बताने से काम नहीं चलेगा। यानी सरकार कांग्रेस की थी और उसके डिप्टी CM ही कई फैसलों पर सवाल उठा रहे थे।
पायलट-गहलोत के बीच तीसरा विवाद: 2020 में होटल तक पहुंची लड़ाई
जुलाई 2020 में अशोक गहलोत और पायलट के बीच का विवाद खुलकर सामने आया था। पायलट अपने 18 समर्थक विधायकों के साथ दिल्ली और हरियाणा चले गए। गहलोत खेमे के विधायकों को जयपुर और जैसलमेर के होटलों में रखा गया। राजस्थान में कांग्रेस सरकार पर संकट आ गया। कांग्रेस आलाकमान ने पायलट को डिप्टी CM और प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया। गहलोत ने उन पर तीखे हमले किए और 'निकम्मा-नाकारा' जैसे शब्दों तक का इस्तेमाल किए। करीब एक महीने बाद कांग्रेस हाईकमान के दखल से मामला शांत हुआ।
चौथा विवाद: समझौता हुआ पर मन नहीं मिले
अगस्त 2020 में सचिन पायलट वापस लौट आए। उनकी शिकायतों को देखने के लिए कांग्रेस ने कमेटी बनाई लेकिन दोनों खेमों के बीच दूरी बनी रही। राजस्थान में मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर खींचतान चलती रही। पायलट समर्थक नेतृत्व में बदलाव की मांग उठाते रहे। दूसरी तरफ गहलोत खेमा भी जवाब देता रहा। यानी ऊपर से समझौता था लेकिन अंदर सब कुछ सामान्य नहीं था।
पांचवां विवाद: 2022 में 'गद्दार' तक पहुंची बात
साल 2022 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव आया तो अशोक गहलोत का नाम अध्यक्ष पद के लिए चर्चा में आया। इसके साथ ही राजस्थान में सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की चर्चा तेज हो गई। 25 सितंबर 2022 को गहलोत के घर कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई गई लेकिन गहलोत खेमे के विधायक इसमें नहीं पहुंचे। उन्होंने अलग बैठक की और इस्तीफे तक सौंप दिए।
कांग्रेस विधायकों की मांग थी कि 2020 में पायलट के साथ गए 19 विधायकों में से किसी को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाए। इसके बाद गहलोत-पायलट के रिश्ते और बिगड़ गए। कुछ महीने बाद गहलोत ने पायलट को 'गद्दार' तक कह दिया।
2023 में पायलट ने पिछली वसुंधरा राजे सरकार के समय के कथित भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई नहीं होने पर अपनी ही सरकार को घेरा था। उन्होंने जयपुर में एक दिन का अनशन किया था और बाद में यात्रा भी निकाली। दूसरी तरफ गहलोत ने आरोप लगाया था कि 2020 के सियासी संकट के दौरान कांग्रेस के कुछ विधायकों ने भाजपा से पैसे लिए थे। पायलट ने इन आरोपों को गलत बताया। विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले तक दोनों नेताओं के बीच यह खींचतान जारी रही।
अब पंचायत चुनाव से पहले फिर 'हम साथ-साथ हैं'?
अब 2026 की तस्वीर बदली हुई दिख रही। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि गहलोत और पायलट के बीच पुराने मतभेद पूरी तरह खत्म हो गए। जुलाई 2026 तक भी पार्टी के कार्यक्रमों में दोनों के अलग-अलग रहने को लेकर गुटबाजी की चर्चा उठी थी लेकिन पंचायत चुनाव से ठीक पहले पार्टी अलग संदेश देना चाहती दिख रही।
राजस्थान नगर निकाय चुनाव में क्रॉस वोटिंग और अंदरूनी नाराजगी के मामले कांग्रेस के सामने हैं। पार्टी उनकी जांच करा रही है। दूसरी तरफ पंचायत चुनाव का कार्यक्रम भी सामने आ चुका। ऐसे में कांग्रेस के लिए इस बार सिर्फ भाजपा से मुकाबला करना ही चुनौती नहीं। अपने घर को संभालना भी जरूरी। इसीलिए बुधवार की बैठक की तस्वीर सियासी तौर पर अहम है।
गहलोत, पायलट, डोटासरा, जूली और रंधावा एक जाजम पर बैठे। हंसी-मजाक हुआ। पुराने तल्ख रिश्तों के बीच सम्मान दिखा। पायलट की कार में डोटासरा और जूली बैठे तो वॉर रूम में गहलोत के साथ पायलट सहज दिखे।
कांग्रेस शायद पंचायत चुनाव से पहले यही तस्वीर नीचे तक पहुंचाना चाहती है कि पुराने हिसाब बाद में, फिलहाल चुनाव सामने है।अब यह मेल-मिलाप सिर्फ तस्वीरों और वीडियो तक रहता है या टिकट बांटने से लेकर प्रचार और मतदान तक भी दिखाई देता है, इसकी असली परीक्षा पंचायत चुनाव में होगी।