पक्ष और विपक्ष ने किया बड़ी चौपड़ पर ध्वजारोहण, मदन राठौड़ ने मांगी माफी

Ashish Bhardwaj | Aug 15, 2026, 12:02 IST
ध्वजारोहण
जयपुर की बड़ी चौपड़ पर स्वतंत्रता दिवस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष ने अलग-अलग दिशाओं में झंडा फहराया। वंदे मातरम् न बजने पर राजस्थान भाजपा प्रदेशाध्यक्ष ने माफी मांगी। यह परंपरा 1947 से चली आ रही है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • जयपुर बड़ी चौपड़ पर सत्ता और विपक्ष ने फहराया तिरंगा।
  • भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ और टीकाराम जूली ने किया ध्वजारोहण।
  • 1947 से चली आ रही है बड़ी चौपड़ की अनूठी परंपरा।
  • कार्यक्रम में वंदे मातरम् को लेकर दोनों पक्षों से हुई चूक।
  • ध्वजारोहण के दौरान बीजेपी कार्यकर्ता को आया हार्ट अटैक।

जयपुर में बड़ी चौपड़ पर सत्ता और विपक्ष ने झंडा रोहण किया। सत्ता पक्ष की ओर से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने झंडा फहराया, वहीं विपक्ष की ओर से नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने झंडा फहराया। यह जयपुर की एक ऐतिहासिक परंपरा है, जो हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर निभाई जाती है।



कार्यक्रम के दौरान कार्यकर्ता को आया हार्ट अटैक

बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ जब कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे, उसी दौरान बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के कार्यकर्ता खालिद बंदूक को हार्ट अटैक आ गया। बीजेपी कार्यकर्ताओं ने तुरंत उन्हें एंबुलेंस से एसएमएस (SMS – Sawai Man Singh) अस्पताल इलाज के लिए भेजा।



जयपुर की अनूठी परंपरा

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जयपुर की सबसे अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा शहर के हृदय स्थल बड़ी चौपड़ पर देखने को मिलती है। यहां हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों जनता के बीच अलग-अलग दिशाओं में ध्वजारोहण करते हैं।



देश के अधिकांश राज्यों में राष्ट्रीय पर्वों के सरकारी आयोजन विधानसभा या सचिवालय परिसरों तक ही सीमित रहते हैं। लेकिन जयपुर में मुख्यमंत्री से लेकर नेता प्रतिपक्ष तक खुले चौक में आम नागरिकों के बीच तिरंगे को सलामी देते हैं। यही परंपरा बड़ी चौपड़ को देश के लोकतांत्रिक मूल्यों का अनूठा प्रतीक बनाती है।



वंदे मातरम् न बजने पर हुई चूक

80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर बड़ी चौपड़ पर ध्वजारोहण के दौरान एक बड़ी चूक भी नजर आई। सत्ता पक्ष की ओर से ध्वजारोहण कार्यक्रम में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् का मूल गीत नहीं चलाया गया। इसके बाद बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने इसके लिए माफी मांगी।



वहीं इसके बाद विपक्ष की ओर से ध्वजारोहण के समय राष्ट्रगीत की जगह राष्ट्रगान की धुन बज गई। हालांकि स्थिति को संभालते हुए नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, प्रताप सिंह खाचरियावास और कांग्रेस शहर अध्यक्ष सुनील शर्मा ने खुद राष्ट्रगीत गाया।



1947 से चली आ रही है यह परंपरा

देश की आजादी के बाद 15 अगस्त 1947 की शाम बड़ी चौपड़ पर तत्कालीन राज्य प्रमुख टीकाराम पालीवाल ने पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। उस ऐतिहासिक अवसर पर तत्कालीन राजपरिवार के सदस्य भी मौजूद रहे। इसके बाद कांग्रेस नेता गोकुलभाई भट्ट ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और तब से यह सिलसिला लगातार जारी है।



किस तरह निभाई जाती है यह परंपरा

बड़ी चौपड़ पर राष्ट्रीय पर्वों के दौरान सबसे पहले सत्तारूढ़ दल पूर्वमुखी होकर ध्वजारोहण करता है। इसके तुरंत बाद विपक्ष दक्षिणमुखी होकर तिरंगा फहराता है। मान्यता है कि पूर्व दिशा उगते सूर्य का प्रतीक है, इसलिए सत्ता पक्ष पूर्वमुखी होकर ध्वजारोहण करता है, जबकि विपक्ष दक्षिण दिशा की ओर ध्वज फहराने की परंपरा निभाता है।



भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ा इतिहास

इतिहासकारों के अनुसार बड़ी चौपड़ पर ध्वजारोहण की शुरुआत 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हुई थी। उस समय आजाद मंडल (आजाद मोर्चा) और जयपुर के युवाओं ने यहां राष्ट्रीय ध्वज फहराकर स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी थी। उस दौर में महाराजा कॉलेज के छात्रों की भूमिका भी बेहद अहम रही।



1968 की राजनीति से जुड़ा रोचक किस्सा

इस परंपरा से एक दिलचस्प राजनीतिक प्रसंग भी जुड़ा है। वर्ष 1968 में प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता और राष्ट्रपति शासन की स्थिति के दौरान ज्योतिषाचार्यों की सलाह पर सत्तारूढ़ दल ने पूर्वमुखी होकर ध्वजारोहण किया था। इसके जवाब में विपक्ष ने दक्षिणमुखी होकर तिरंगा फहराया।



बाद के वर्षों में प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और 1971 में मोहनलाल सुखाड़िया के स्थान पर बरकतुल्लाह खान मुख्यमंत्री बने। इस घटना को बड़ी चौपड़ की परंपरा से जोड़कर भी देखा जाता है।



धरना-प्रदर्शनों का भी रहा है केंद्र

वर्ष 2001 तक विधानसभा सवाई मानसिंह टाउन हॉल क्षेत्र में होने के कारण बड़ी चौपड़ राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रही। विधानसभा के लालकोठी स्थानांतरित होने के बाद यहां धरना-प्रदर्शन कम हो गए, लेकिन राष्ट्रीय पर्वों पर ध्वजारोहण की परंपरा आज भी उसी गरिमा के साथ निभाई जाती है।



लोकतंत्र की जीवंत मिसाल

करीब आठ दशक पुरानी यह परंपरा केवल एक ध्वजारोहण कार्यक्रम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति की मिसाल है। एक ही चौक पर सत्ता और विपक्ष का अलग-अलग ध्वजारोहण करना यह संदेश देता है कि राष्ट्रीय ध्वज राजनीति से ऊपर है और लोकतंत्र की असली ताकत जनता के बीच ही निहित है। जयपुर की बड़ी चौपड़ आज भी इसी गौरवशाली विरासत को संजोए हुए है।



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