जयपुर में BJP का मुस्लिम कार्ड फेल: कांग्रेस ही नहीं, निर्दलीयों ने भी रोकी राह

Raghvendra Singh Rathore | Sept 14, 2026, 18:02 IST
जयपुर नगर निगम चुनाव में BJP के 8 मुस्लिम प्रत्याशियों में से एक ने नामांकन नहीं किया और बाकी सातों चुनाव हार गए। चार सीटें कांग्रेस और तीन सीटें निर्दलीयों के खाते में गईं।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • जयपुर में BJP का मुस्लिम कार्ड फेल, सातों प्रत्याशी हारे
  • 8 को टिकट, 7 मैदान में, जीत एक को भी नहीं मिली
  • कांग्रेस के साथ निर्दलीयों ने भी रोकी BJP की राह
  • मुस्लिम चेहरा उतारने का फॉर्मूला नहीं दिला सका जीत
  • जयपुर निकाय नतीजों ने दिया BJP को बड़ा सियासी संदेश

जयपुर नगर निगम चुनाव में भाजपा ने शहर में मजबूत प्रदर्शन किया, लेकिन इसी नतीजे के बीच पार्टी का एक बड़ा सियासी प्रयोग सफल नहीं हो सका। मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पकड़ बढ़ाने के लिए भाजपा ने इस बार 8 मुस्लिम चेहरों को टिकट दिया था। एक प्रत्याशी ने नामांकन नहीं किया और मैदान में उतरे बाकी सातों प्रत्याशी चुनाव हार गए।



नतीजे भाजपा के लिए एक और दिलचस्प संकेत देते हैं। सात में से चार प्रत्याशियों को कांग्रेस ने हराया, जबकि तीन भाजपा उम्मीदवार निर्दलीयों से हार गए। भाजपा जिन वार्डों में मुस्लिम चेहरों के जरिए नया समीकरण बनाने की कोशिश कर रही थी, वहां चुनौती सिर्फ कांग्रेस से नहीं बल्कि स्थानीय और निर्दलीय चेहरों से भी मिली।





8 को टिकट, लेकिन मैदान में उतरे 7

भाजपा ने जयपुर में वार्ड 19 से शाहनवाज अंसारी, 109 से जाकिर हुसैन खान, 113 से फरीदुद्दीन, 117 से शबाब जहां, 128 से माजिद पठान, 136 से मिजाना मिर्जा, 137 से मोहम्मद रईस मंसूरी और 146 से अफसाना को टिकट दिया था।



हालांकि वार्ड 146 से अफसाना ने नामांकन दाखिल नहीं किया। इस तरह भाजपा के आठ घोषित मुस्लिम उम्मीदवारों में से सात ही चुनाव मैदान में पहुंचे।



चार जगह कांग्रेस ने रोका रास्ता

भाजपा के सात मुस्लिम उम्मीदवारों में से चार सीधे कांग्रेस प्रत्याशियों से चुनाव हारे। वार्ड 19 में भाजपा के शाहनवाज अंसारी को कांग्रेस के मोहम्मद फारुख ने हराया। वार्ड 113 में भाजपा के फरीदुद्दीन के सामने कांग्रेस के गजनफर अली विजयी रहे।



वार्ड 117 में भाजपा की शबाब जहां को कांग्रेस की संजीदा गुलाम मुस्तफा ने मात दी। वहीं वार्ड 137 में भाजपा के मोहम्मद रईस मंसूरी को कांग्रेस के सलमान मंसूरी ने हरा दिया। इस तरह भाजपा के सात मुस्लिम प्रत्याशियों में से चार की राह कांग्रेस ने रोक दी।



तीन सीटों पर निर्दलीय पड़े भारी

तीन वार्ड ऐसे रहे जहां भाजपा को कांग्रेस ने नहीं, बल्कि निर्दलीय उम्मीदवारों ने झटका दिया। वार्ड 109 में भाजपा के जाकिर हुसैन खान को निर्दलीय रहीस खान ने हराया। वार्ड 128 में भाजपा के माजिद पठान के सामने निर्दलीय इशाक मंसूरी जीत गए।



वार्ड 136 में भी यही तस्वीर रही। भाजपा की मिजाना मिर्जा को निर्दलीय जमीला बेगम फारुख ने शिकस्त दी। यह नतीजा महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे इन वार्डों में मुकाबला केवल भाजपा बनाम कांग्रेस तक सीमित नहीं दिखाई देता। स्थानीय स्तर पर मजबूत निर्दलीय उम्मीदवार भी निर्णायक साबित हुए।



मुस्लिम चेहरा देने का फॉर्मूला नहीं दिला सका जीत

भाजपा के लिए इन सात सीटों का नतीजा सिर्फ सात प्रत्याशियों की हार तक सीमित नहीं है। पार्टी ने मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर स्थानीय स्तर पर अपना सामाजिक आधार बढ़ाने की कोशिश की थी।



लेकिन सिर्फ मुस्लिम चेहरा उतारना जीत का फॉर्मूला साबित नहीं हुआ। सात में एक भी उम्मीदवार भाजपा को सीट नहीं दिला सका।



हालांकि इन नतीजों के आधार पर यह सीधे नहीं कहा जा सकता कि मुस्लिम मतदाताओं ने किस पार्टी को कितना वोट दिया। उसके लिए बूथवार मतदान और वोट शेयर का अलग विश्लेषण जरूरी होगा। लेकिन सीटों का परिणाम इतना जरूर बताता है कि भाजपा का उम्मीदवार चयन इन वार्डों में चुनावी जीत में तब्दील नहीं हो पाया।



कांग्रेस को भी नहीं मिला पूरा फायदा

भाजपा के मुस्लिम प्रत्याशियों की हार का पूरा फायदा कांग्रेस को भी नहीं मिला। सात में कांग्रेस सिर्फ चार सीटें जीत पाई, जबकि तीन सीटों पर निर्दलीयों ने बाजी मार ली।



यही इस चुनाव का दूसरा बड़ा संकेत है। मुस्लिम बहुल वार्डों में भाजपा के सामने कांग्रेस के साथ-साथ स्थानीय राजनीतिक समीकरण और मजबूत निर्दलीय चेहरे भी बड़ी चुनौती बने।



जीत के बीच BJP के लिए एक सियासी संदेश

जयपुर के चुनावी नतीजों में भाजपा के लिए तस्वीर दो हिस्सों में दिखाई देती है। शहर में पार्टी का प्रदर्शन मजबूत रहा, लेकिन मुस्लिम प्रत्याशियों वाली सीटों पर उसका प्रयोग नहीं चला। 8 को टिकट दिया, 7 चुनाव मैदान में पहुंचे और जीत एक को भी नहीं मिली। इनमें चार सीट कांग्रेस और तीन निर्दलीयों ने जीतीं।



ऐसे में चुनाव के बाद भाजपा के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि उसके मुस्लिम उम्मीदवार क्यों हारे। बड़ा सवाल यह भी है कि क्या केवल स्थानीय मुस्लिम चेहरा उतारने से उन वार्डों में पार्टी का सामाजिक आधार बढ़ाया जा सकता है, जहां अब तक उसका प्रभाव सीमित रहा है?



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