सुप्रीम कोर्ट का जयपुर बम धमाके के आरोपी सरवर आजमी को जमानत देने से इनकार
समझें क्या है पूरा मामला
- जयपुर बम धमाका केस में सरवर आज़मी को जमानत नहीं।
- सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया।
- 2008 जयपुर ब्लास्ट केस में उम्रकैद काट रहा आरोपी।
- चांदपोल के बिना फटे बम मामले से जुड़ा केस।
- जस्टिस सुंदरेश-वराले की बेंच ने खारिज की याचिका।
सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के जयपुर सीरियल ब्लास्ट के एक मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे मोहम्मद सरवर आज़मी को जमानत देने से इंकार कर दिया है। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना वी. वराले की बैंच ने कहा कि मामला सामान्य नहीं है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा व आमजन की सुरक्षा से जुड़ा है।
जयपुर में 13 मई, 2008 को अलग-अलग जगहों पर नौ बम लगाए गए थे। इनमें से आठ बम फटे थे और 70 लोगों की मौत हो गई और करीब 200 से ज्यादा घायल हुए थे। चांदपोल बाजार में रखा गया नौवां बम नहीं फटा था। पुलिस ने उस बम को निष्क्रिय कर दिया था। वर्तमान मामला उसी बिना फटे नौंवे बम के मामले में मिली उम्र कैद की सजा का है।
उम्रकैद की मिली थी सजा
ट्रायल कोर्ट ने 2025 में आज़मी को इस मामले में उम्रकैद की सजा दे दंडित किया था। राजस्थान हाई कोर्ट में अपनी सजा को चुनौती देकर अपील के निपटारा होने तक जमानत पर रिहा करने की मांग की थी। लेकिन,हाईकोर्ट ने जमानत नहीं दी थी।
आठ मामलो में मिली थी मौत की सजा
दिसंबर 2019 में, जयपुर की एक विशेष अदालत ने मोहम्मद सैफ, मोहम्मद सरवर आज़मी, सैफुर रहमान और मोहम्मद सलमान को बम लगाने और विस्फोट करने का दोषी मानकर मौत की सजा दी थी। पांचवें आरोपी शाहबाज अहमद पर विस्फोटों की जिम्मेदारी लेने वाला ईमेल भेजने का आरोप था, लेकिन सबूतों के अभाव में उसे बरी कर दिया था।
हाई कोर्ट ने किया था बरी
इस आदेश के खिलाफ अपील पर राजस्थान हाई कोर्ट ने 29 मार्च,2023 को दिए फैसले में मौत की सजा को रद्द करते हुए चारों आरोपियों को बरी कर दिया था। कोर्ट ने 2019 में निचली ट्रायल कोर्ट से बरी हुए पांचवे आरोपी को बरी करने के फैलसे को बरकरार रखा था।
मनगढ़ंत सबूत
हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी करते हुए कहा था कि राजस्थान पुलिस का आतंकवाद-विरोधी दस्ता (एटीएस) सबूतों के किसी भी पहलू को साबित करने में विफल रहा है। साजिश के उसके सिद्धांत को स्थापित करने का कोई आधार नहीं है। आरोपियों को फंसाने की कोशिश की गई थी। कोर्ट ने कुछ सबूतों के मनगढ़ंत होना भी कहा था और अनुसंधान अधिकारियों के खिलाफ जांच के आदेश दिए थे।
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