जयपुर में कचरा उठाने का 8 महीने बाद तक बिल, हर महीने का हिसाब गायब, लोगों ने पूछा- किस आधार पर वसूल रहे पैसा?
जयपुर में घर-घर कचरा उठाने की व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। शहर के कई इलाकों में लोगों को हर महीने बिल देने के बजाय तीन से आठ महीने का बिल एक साथ थमाया जा रहा है। परेशानी यह है कि बिल में यह साफ नहीं होता कि किस महीने का कितना पैसा जोड़ा गया है। कई लोगों की शिकायत है कि कचरा उठाने वाली गाड़ी भी नियमित नहीं आती, लेकिन शुल्क पूरा मांगा जा रहा है।
नगर निगम ने कचरा कलेक्शन और यूजर चार्ज वसूली की जिम्मेदारी प्राइवेट कंपनियों को दे रखी है। नियमों के मुताबिक इन कंपनियों को हर महीने बिल देना होता है। इसके बावजूद कई महीने का बिल एक साथ जारी होने की शिकायतें सामने आई हैं।
पांच महीने का बिल 560 रुपए, कर्मचारी भी नहीं बता पाए हिसाब
मुरलीपुरा निवासी प्रशांत पंडित ने कचरा कलेक्शन के बिल को लेकर सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक, जनवरी से मई तक का 560 रुपए का बिल दिया गया। प्रशांत ने बिल की राशि का हिसाब जानना चाहा, लेकिन सफाई कर्मचारियों के सुपरवाइजर भी स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए। उन्हें बताया गया कि मशीन में डाटा डालने के बाद राशि अपने आप निकलती है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब शुल्क वसूलने वाले कर्मचारी ही बिल का हिसाब नहीं समझा पा रहे हैं, तो आम नागरिक कैसे जांच करेगा कि उससे सही पैसा लिया जा रहा है या नहीं?
सी-स्कीम में चार महीने बाद मिल रहा 400 से 800 रुपए का बिल
सी-स्कीम निवासी बरखा ने भी कचरा कलेक्शन की व्यवस्था पर नाराजगी जताई है। उनके मुताबिक, पिछले एक साल से उन्हें करीब चार महीने के अंतराल पर बिल मिल रहा है। कभी 400 रुपए तो कभी 800 रुपए तक की राशि मांगी जाती है।
बरखा की शिकायत है कि कचरा उठाने वाली गाड़ी समय पर नहीं आती। इसके बावजूद शुल्क वसूला जा रहा है। बिल गाड़ी के ड्राइवर देते हैं, लेकिन रकम के हिसाब की जानकारी किससे ली जाए, यह स्पष्ट नहीं है।
13 में से 10 जोन में RFID सिस्टम, फिर भी शिकायतें
जयपुर नगर निगम के 13 जोन में से 10 में RFID आधारित सिस्टम लागू है। इस तकनीक से कचरा कलेक्शन गाड़ियों की आवाजाही और कचरा उठाने की निगरानी की जाती है। इसके बावजूद कई इलाकों से गाड़ियां नियमित नहीं आने और बिल समय पर नहीं मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
झोटवाड़ा, सांगानेर और जगतपुरा जोन में RFID आधारित शुल्क वसूली की व्यवस्था लागू नहीं है। बाकी 10 जोन में अर्बन एनवायरो वेस्ट मैनेजमेंट लिमिटेड और रवि ट्रैवलर्स कचरा कलेक्शन और शुल्क वसूली का काम संभाल रही हैं।
ऐसे में सवाल है कि जिन जोन में गाड़ियों की निगरानी के लिए तकनीक मौजूद है, वहां भी लोगों को नियमित सेवा और समय पर बिल क्यों नहीं मिल पा रहा है?
कचरा उठाने और पैसा वसूलने की जिम्मेदारी प्राइवेट कंपनियों के पास
नगर निगम सीधे घरों से यूजर चार्ज नहीं वसूलता। जोनवार ठेका लेने वाली कंपनियां ही कचरा उठाने के साथ शुल्क वसूली का काम करती हैं। कंपनियों को निर्धारित व्यवस्था के अनुसार हर महीने बिल जारी करना होता है। लेकिन कई महीनों का बिल एक साथ आने से लोगों के लिए यह जांचना मुश्किल हो रहा है कि किस अवधि का कितना शुल्क लिया गया है।
इस व्यवस्था में एक और सवाल है कि अगर किसी घर से नियमित कचरा नहीं उठाया गया, तो उसकी शिकायत और शुल्क से जुड़े विवाद का समाधान कैसे होगा?
निगम उपायुक्त अतुल शर्मा बोले- हर महीने बिल देना जरूरी
नगर निगम के उपायुक्त (गैराज) अतुल शर्मा ने स्पष्ट किया है कि टेंडर की शर्तों के मुताबिक संबंधित कंपनी को हर महीने बिल जारी करना जरूरी है। उनके अनुसार, यदि कोई कंपनी कई महीने बाद एक साथ बिल जारी करती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
अतुल शर्मा ने कहा कि जिन इलाकों में इस तरह की समस्या आ रही है, वहां के लोग नगर निगम में शिकायत दर्ज करा सकते हैं। नियमों में एक साल या कई महीनों का बिल एक साथ जारी करने का प्रावधान नहीं है।
अब सवाल- कंपनियों पर कार्रवाई कब होगी?
नगर निगम ने हर महीने बिल जारी करने की शर्त रखी है। इसके बावजूद लोगों को तीन से आठ महीने का बिल एक साथ मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं। ऐसे में सवाल है कि नगर निगम अब तक कितनी शिकायतों की जांच कर चुका है? कितनी कंपनियों को नोटिस दिए गए और नियम तोड़ने पर कितनी पेनल्टी लगाई गई?
दूसरा सवाल बिल की पारदर्शिता का है। अगर किसी घर से 560 या 800 रुपए वसूले जा रहे हैं, तो बिल में हर महीने का शुल्क और कुल रकम का हिसाब साफ क्यों नहीं दिया जा रहा? फिलहाल नगर निगम ने शिकायत मिलने पर कार्रवाई करने की बात कही है। लेकिन लोगों की परेशानी केवल बिल की राशि नहीं, बल्कि नियमित कचरा कलेक्शन और वसूले जा रहे पैसे का स्पष्ट हिसाब नहीं मिलना भी है।