बच्चों का पेट भरने वाले रसोइयों की जेब खाली, जयपुर में 13 महीने, उदयपुर में 7 महीने से मानदेय अटकने का दावा
राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बच्चों को रोजाना गर्म भोजन उपलब्ध कराने वाले रसोइयों को अपना मानदेय पाने के लिए महीनों इंतजार करना पड़ रहा है। राजधानी जयपुर में कुक-कम-हेल्पर को पिछले 13 महीने से मानदेय नहीं मिला है। यह स्थिति द सूत्र की पड़ताल में सामने आई है। दूसरी ओर उदयपुर में भी करीब 5,200 रसोइयों का सात महीने का भुगतान अटका हुआ है।
दिवाली से ठीक पहले सामने आई इस स्थिति ने शिक्षा विभाग की भुगतान व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन कर्मचारियों पर सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए भोजन तैयार करने की जिम्मेदारी है, उन्हें अपने ही काम का पैसा समय पर नहीं मिल रहा। जयपुर और उदयपुर में भुगतान लंबित रहने की अवधि अलग-अलग है, लेकिन दोनों मामलों में सबसे बड़ा सवाल एक ही है। आखिर मानदेय की राशि कर्मचारियों के खातों तक क्यों नहीं पहुंच रही है?
जयपुर में 13 महीने का बकाया, भुगतान व्यवस्था पर उठे सवाल
द सूत्र की पड़ताल में जयपुर के कुक-कम-हेल्पर का 13 महीने से मानदेय लंबित होने की बात सामने आई है। इतने लंबे समय तक भुगतान नहीं होना शिक्षा विभाग की निगरानी और भुगतान प्रक्रिया पर सवाल उठाता है। सरकारी स्कूलों में कुक-कम-हेल्पर बच्चों के लिए भोजन तैयार करने से लेकर रसोई से जुड़े कई जरूरी काम संभालते हैं। इसके बावजूद उन्हें नियमित मानदेय नहीं मिल रहा है।
अब यह जानना जरूरी है कि जयपुर में कितने कर्मचारी इस समस्या से प्रभावित हैं, उनका भुगतान किस स्तर पर रुका है और विभाग ने बकाया राशि जारी करने के लिए क्या कार्रवाई की है।
उदयपुर में 5,200 कर्मचारियों का सात महीने का मानदेय अटका
जयपुर के बाद उदयपुर से भी रसोइयों के भुगतान का मामला सामने आया है। राजस्थान पंचायती राज एवं माध्यमिक शिक्षक संघ के अनुसार उदयपुर जिले में करीब 5,200 कुक-कम-हेल्पर का सात महीने का मानदेय लंबित है। संघ के प्रदेशाध्यक्ष शेर सिंह चौहान ने बताया है कि कर्मचारियों को अप्रैल 2026 से भुगतान नहीं मिला है। उन्होंने भुगतान में देरी को लेकर शिक्षा विभाग के अधिकारियों के सामने मामला उठाया है।
कुक-कम-हेल्पर का मासिक मानदेय 2,467 रुपए है। इस आधार पर यदि उदयपुर के सभी 5,200 कर्मचारियों का पूरे सात महीने का भुगतान बाकी है, तो बकाया राशि करीब 8 करोड़ 98 लाख रुपए होती है।
बाल गोपाल योजना के खर्च का भी 15 महीने से इंतजार
रसोइयों के मानदेय के साथ सरकारी स्कूलों में संचालित पन्नाधाय बाल गोपाल योजना के भुगतान पर भी सवाल उठ रहे हैं। शिक्षक संघ के अनुसार योजना के तहत दूध गर्म करने, चीनी और एलपीजी गैस पर होने वाले खर्च का भुगतान अगस्त 2025 से लंबित है। यानी करीब 15 महीने से इस मद की राशि नहीं मिली है।
सरकारी स्कूलों में बच्चों को दूध उपलब्ध कराने की व्यवस्था नियमित रूप से चलनी है। ऐसे में संबंधित खर्च का भुगतान लंबे समय तक अटका रहना स्कूलों के लिए भी परेशानी का कारण बन सकता है।
पोर्टल बदला, लेकिन कर्मचारियों तक भुगतान क्यों नहीं पहुंचा?
राजस्थान पंचायती राज एवं माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेशाध्यक्ष शेर सिंह चौहान ने भुगतान में देरी के पीछे नई भुगतान प्रणाली को भी वजह बताया है। उनके मुताबिक पहले पीडी और एसएनए व्यवस्था के माध्यम से भुगतान किया जाता था। अब एसएनए स्पर्श पोर्टल से भुगतान की प्रक्रिया लागू की गई है। संघ का कहना है कि इस बदलाव के बाद भुगतान संबंधी परेशानियां बढ़ी हैं।
हालांकि भुगतान रुकने की वास्तविक वजह क्या है, यह विभागीय रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होगा। बजट जारी होने, बिल स्वीकृत होने और कर्मचारियों के बैंक खातों में राशि पहुंचने के बीच भुगतान किस चरण पर अटका है, इसकी जांच जरूरी है।
तीन दिन में भुगतान नहीं हुआ तो आंदोलन की चेतावनी
उदयपुर में शिक्षक संघ ने 2 नवंबर को जिला शिक्षा अधिकारी प्रारंभिक दुर्गेश कुमार मेनारिया को ज्ञापन सौंपकर लंबित भुगतान जारी करने की मांग की। संघ ने दिवाली से पहले तीन दिन के भीतर कुक-कम-हेल्पर का मानदेय और बाल गोपाल योजना का बकाया भुगतान करने की मांग रखी है। साथ ही चेतावनी दी है कि तय समय में भुगतान नहीं होने पर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।
शिक्षा विभाग ने जांच के निर्देश दिए, अब भुगतान का इंतजार
मामला सामने आने के बाद शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव राजेश यादव ने भुगतान में देरी की जांच कराने और लंबित राशि जारी कराने के निर्देश देने की बात कही है। लेकिन जयपुर में 13 महीने और उदयपुर में सात महीने से भुगतान लंबित रहने की स्थिति ने विभाग के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जब कर्मचारी नियमित रूप से स्कूलों में काम कर रहे हैं, तो उनका मानदेय समय पर जारी क्यों नहीं किया जा रहा?
जयपुर में सामने आए मामले पर संबंधित जिला अधिकारियों और मिड-डे मील आयुक्तालय का स्पष्ट जवाब भी जरूरी है। यह जानना होगा कि बकाया राशि कितनी है और कर्मचारियों को भुगतान कब तक मिलेगा। दिवाली से पहले सरकारी स्कूलों के रसोइयों के लिए सबसे जरूरी बात आश्वासन नहीं, बल्कि उनके खातों में लंबित मानदेय का पहुंचना है।