जयपुर नगर निगम में एक पद पर दो अधिकारी, हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने के 14 दिन बाद भी नहीं सुलझा विवाद
जयपुर नगर निगम में पशु चिकित्सा अधिकारी के एक पद को लेकर अजीब स्थिति बन गई है। सरकार ने एक डॉक्टर का ट्रांसफर कर दिया। उनकी जगह दूसरे डॉक्टर को नियुक्त भी कर दिया। ट्रांसफर का मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां 16 अक्टूबर को याचिका खारिज हो गई। इसके बावजूद नगर निगम में दोनों डॉक्टरों के बीच काम का बंटवारा जारी है।
हाईकोर्ट के फैसले को 13 दिन बीत चुके हैं, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ है। अब सवाल उठ रहा है कि जब ट्रांसफर के खिलाफ याचिका खारिज हो चुकी है तो नगर निगम ने अब तक जिम्मेदारियां स्पष्ट क्यों नहीं कीं।
जुलाई में हुआ ट्रांसफर, फिर मामला पहुंचा कोर्ट
पूरा विवाद पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. नेहा गौड़ के ट्रांसफर से जुड़ा है। राज्य सरकार ने 10 जुलाई 2026 को उन्हें नगर निगम से वापस मूल पशुपालन विभाग में भेजने का आदेश दिया था। पहले उन्हें जयपुर के बहुउद्देशीय पशु चिकित्सालय में रिपोर्ट करने को कहा गया। हालांकि, उसी दिन आदेश में संशोधन हुआ और उन्हें मेडिकल ऑफिसर (रेडियोलॉजी) के पद पर लगा दिया गया।
इसी ट्रांसफर प्रक्रिया में डॉ. जितेंद्र कुमार को जयपुर नगर निगम में पशु चिकित्सा अधिकारी के पद पर प्रतिनियुक्ति दी गई। डॉ. नेहा गौड़ ने अपने ट्रांसफर को राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण में चुनौती दी। अधिकरण ने 8 अगस्त को उनकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद मामला राजस्थान हाईकोर्ट पहुंच गया।
हाईकोर्ट ने 16 अक्टूबर को खारिज की याचिका
डॉ. गौड़ ने कोर्ट में ट्रांसफर आदेश जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनका तर्क था कि पशुपालन विभाग के निदेशक को उनका ट्रांसफर करने का अधिकार नहीं था। सुनवाई के शुरुआती दौर में हाईकोर्ट ने उन्हें अंतरिम राहत दी थी। बाद में राज्य सरकार ने ट्रांसफर से जुड़ा रिकॉर्ड कोर्ट के सामने रखा।
सरकार की ओर से बताया गया कि संबंधित मंत्री ने विभाग के प्रमुख सचिव और निदेशक के माध्यम से ट्रांसफर को मंजूरी दी थी। इसके बाद जस्टिस अनूप कुमार ढंड की पीठ ने 16 अक्टूबर को डॉ. गौड़ की याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट के फैसले के बाद भी दोनों डॉक्टरों में बंटा काम
जब ट्रांसफर का मामला कोर्ट में चल रहा था, तब नगर निगम के उपायुक्त ने दोनों डॉक्टरों के बीच जिम्मेदारियां बांट दी थीं। यह व्यवस्था इसलिए की गई थी, ताकि पशु चिकित्सा से जुड़े नियमित काम बंद न हों। लेकिन कोर्ट का फैसला आने के बाद भी दोनों डॉक्टरों के बीच काम का बंटवारा जारी रहने की जानकारी सामने आई है।
नगर निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस पर सवाल उठाए हैं। अधिकारी के मुताबिक, डॉ. गौड़ 27 अप्रैल को खातिपुरा स्थित सरकारी पोल्ट्री फार्म से प्रतिनियुक्ति पर निगम आई थीं। बाद में शिकायतों के चलते उन्हें मूल विभाग में लौटाने की प्रक्रिया शुरू हुई।
डॉ. नेहा गौड़ बोलीं—मुझे अभी तक कार्यमुक्त नहीं किया
डॉ. नेहा गौड़ ने अपने ट्रांसफर की प्रक्रिया को लेकर आपत्ति जताई है। उनके अनुसार, पशुपालन विभाग के निदेशक को उनका ट्रांसफर आदेश जारी करने का अधिकार नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रांसफर प्रक्रिया को सही साबित करने के लिए कोर्ट में पिछली तारीख का दस्तावेज पेश किया गया।
डॉ. गौड़ का कहना है कि नगर निगम ने उन्हें अभी तक कार्यमुक्त नहीं किया है। उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले को बड़ी पीठ के सामने चुनौती देने की संभावना भी जताई है।
नगर निगम आयुक्त का जवाब—मामले पर नजर रख रहे हैं
जयपुर नगर निगम आयुक्त ओमप्रकाश कसेरा ने कहा है कि निगम मामले पर नजर रख रहा है। नगर निगम की आधिकारिक वेबसाइट पर 29 जुलाई को पशु प्रबंधन शाखा के काम और कर्मचारियों की जिम्मेदारियों से जुड़ा आदेश संख्या 252 दर्ज है।
इधर आवारा कुत्तों के प्रबंधन पर हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
इस विवाद के बीच नगर निगम की पशु प्रबंधन व्यवस्था भी महत्वपूर्ण हो गई है। 27 अक्टूबर को राजस्थान हाईकोर्ट ने आवारा कुत्तों के प्रबंधन के मामले में स्वायत्त शासन और पंचायती राज से जुड़े अधिकारियों को कार्रवाई का ब्योरा पेश करने के निर्देश दिए हैं। इस अलग मामले में अगली सुनवाई 5 नवंबर को होगी।
इससे पहले जयपुर नगर निगम ने अगस्त में हाईकोर्ट को बताया था कि शहर में हर महीने करीब 800 आवारा कुत्तों की नसबंदी की जा रही है। निगम ने 300 जगहों को कुत्तों को भोजन देने के लिए चिह्नित करने की जानकारी भी दी थी। आवारा कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण और शिकायतों पर कार्रवाई जैसे काम नगर निगम की पशु प्रबंधन व्यवस्था से जुड़े हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अदालत में ट्रांसफर के खिलाफ याचिका खारिज हो चुकी है, तब नगर निगम दोनों अधिकारियों की जिम्मेदारियां स्पष्ट करने के लिए क्या फैसला लेगा।