जल जीवन मिशन घोटाला: संजय बड़ाया और शुभांशु दीक्षित को सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत
समझें क्या है पूरा मामला
- संजय बड़ाया और शुभांशु दीक्षित को मिली जमानत
- महेश जोशी की याचिका पर 5 अक्टूबर को सुनवाई।
- जेजेएम 979 करोड़ रुपयों के टेंडर के लिए फर्जी अनुभव प्रमाण पत्रों का।
- ACB ने कोर्ट में पेश की है 17,500 से अधिक पन्नों की चार्जशीट
- इरकॉन इंटरनेशनल से फर्जी दस्तावेजों की शिकायत को किया अनदेखा।
राजस्थान की राजनीति को प्रभावित करने वाले जल जीवन मिशन घोटाले के दो आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई है।
कोर्ट ने आरोपी संजय बड़ाया और राजस्थान वाटर सप्लाई एंड सीवरेज मैनेजमेंट बोर्ड के तत्कालीन सचिव शुभांशु दीक्षित को जमानत दे दी है। पूर्व मंत्री महेश जोशी की जमानत पर 5 अक्टूबर को सुनवाई होगी। बड़ाया और महेश जोशी को पहले ईडी ने गिरफ्तार किया था और दोनों को ही ईडी केस में जमानत मिल चुकी है।
यह है मामला
सितंबर-2023 में केंद्र सरकार की योजना जल जीवन मिशन के तहत राजस्थान में 979.27 करोड़ के टेंडर हुए थे। आरोप है जयपुर की दो कंपनियों मै. श्याम ट्यूबवैल और मै. गणपति ट्यूबवेल ने फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र से ये टेंडर हासिल किए थे।
विभाग में इनके खिलाफ कई बार शिकायत हुई। लेकिन बावजूद इसके बिना एक्शन लिए कंपनियों को टेंडर जारी कर दिए। मामला पहली बार तब पकड़ में आया जब एसीबी ने जलदाय विभाग के एक इंजीनियर मायालाल सैनी को दबोचा। इसके बाद घोटाला सामने आया था।
एसीबी के अलावा मामले में ईडी और सीबीआई भी जांच कर चुकी हैं। रिटायर्ड आईएएस सुबोध अग्रवाल (तत्कालीन एसीएस जलदाय विभाग), पूर्व जलदाय मंत्री महेश जोशी गिरफ्तार होकर फिलहाल जेल में हैं।
एसीबी ने चार्जशीट में लगाए आरोप
राजस्थान एसीबी ने जेजेएम घोटाले में 4 जून 2026 को करीब 17,500 पन्नों की चार्जशीट पेश की थी। इससे पहले 10 अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट पेश कर चुकी थी।
चार्जशीट में शामिल आरोपी दिनेश गोयल, कृष्णदीप गुप्ता, शुभांशु दीक्षित, सुशील शर्मा, नीरिल कुमार, विशाल सक्सेना, अरुण श्रीवास्तव, डीके गौड़, महेंद्र प्रकाश सोनी, मुकेश पाठक और सुबोध अग्रवाल हैं।
इससे पहले एसीबी की एसआईटी ने सभी आरोपियों को 17 फरवरी 2026 को गिरफ्तार किया था। अब तक केवल एक आरोपी अरुण श्रीवास्तव को कोर्ट से बेल मिली थी। जेल में बंद 7 आरोपियों के खिलाफ सरकार ने पिछले दिनों ही अभियोजन स्वीकृति दी है। सुबोध अग्रवाल के खिलाफ राज्य सरकार स्वीकृति दे चुकी है और केंद्र सरकार से मिलनी बाकी है।
किस आरोपी पर हैं क्या आरोप:
कृष्ण दीप गुप्ता, तत्कालीन मुख्य अभियंता, ग्रामीण
आरोप: टेंडर प्रक्रिया में फर्जी अनुभव और वर्क-कम्प्लीशन प्रमाणपत्रों के आधार पर कंपनियों को पात्र मानने और कथित तौर पर नियमों की अनदेखी कर ठेके दिलाने में भूमिका।
फर्जी अनुभव प्रमाणपत्रों के आधार पर फर्मों की पात्रता और टेंडर प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से जुड़ी फाइलें-दस्तावेज एसीबी के पास सबूत के तौर पर रिकॉर्ड में है।
शुभांशु दीक्षित, तत्कालीन सचिव, राजस्थान वाटर सप्लाई एंड सीवरेज मैनेजमेंट बोर्ड। फर्जी दस्तावेजों के आधार पर टेंडर देने की प्रक्रिया में अधिकारियों की मिलीभगत में शामिल। नियमों को दरकिनार कर चुनिंदा कंपनियों को लाभ पहुंचाया।
टेंडर प्रक्रिया और संबंधित निर्णयों में प्रशासनिक भूमिका, एसीबी का आरोप कि फर्जी दस्तावेजों के बावजूद प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया और नियमों की अनदेखी हुई।
दिनेश गोयल, तत्कालीन मुख्य अभियंता, विशिष्ट परियोजना-जेजेएम।
मिलीभगत में शामिल,टेंडर प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की, जबकि पता था की आवेदक कंपनी के लगाए दस्तावेज फर्जी हैं। 17 फरवरी को उदयपुर में एक होटल से गिरफ्तार किया।
टेंडर नंबर 73/2022-23 और 74/2022-23 में दोनों फर्मों के अनुभव प्रमाणपत्रों की जांच करनी थी। ACB को पड़ताल के दौरान विभाग को दी ऐसी कोई स्पष्ट जांच रिपोर्ट नहीं मिली है।
अरुण श्रीवास्तव, तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य अभियंता, प्रथम
टेंडर जारी करने वाली कमेटी के मेंबर थे। एसीबी के अनुसार श्रीवास्तव को पता था कि दस्तावेज फर्जी हैं। इसके बाद बाद भी कोई आपत्ति नहीं की और टेंडर जारी कर दिए। आरोपी को दिल्ली स्थित आवास से गिरफ्तार किया गया था।
फर्जी अनुभव प्रमाणपत्रों के सत्यापन के लिए फर्जी ई-मेल आईडी पर ई-मेल भेजे गए। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में एसीबी ने इसे जानबूझकर किया गया कृत्य बताया है।
महेंद्र प्रकाश सोनी, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, अजमेर
फर्जी अनुभव और वर्क-कम्प्लीशन प्रमाणपत्रों के आधार पर टेंडर प्रक्रिया में कंपनियों को पात्र बनाने और कथित अनियमितताओं में भूमिका रही,एसीबी ने इन के खिलाफ अलग से भी एफआईआर में नामजद किया था।
फर्जी अनुभव प्रमाणपत्रों को स्वीकार करने और उनके आधार पर कंपनियों को पात्रता देने की प्रक्रिया में भूमिका के सबूत हैं।
दिलीप कुमार गौड़, तत्कालीन मुख्य अभियंता/तकनीकी सदस्य
कंपनी के फर्जी डॉक्यूमेंट होने के बावजूद तकनीकी स्तर पर टेंडर प्रक्रिया को मंजूरी दे दी। किसी भी प्रकार से उसे रोकने की कोशिश नहीं की। न ही सरकारी एजेंसियों को सूचना दी। जयपुर से गिरफ्तार किये गए।
फर्जी प्रमाणपत्रों के बावजूद प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया, चाहते तो टेंडर होने से रोक भी सकते थे, ऐसी कोई टिप्पणी एसीबी को नहीं मिली है।
विशाल सक्सेना, पद- तत्कालीन अधिशासी अभियंता, शाहपुरा
फर्जी अनुभव प्रमाणपत्रों की जांच के बाद उन्हें सही बताने वाली रिपोर्ट तैयार करने और उसके आधार पर आगे की टेंडर प्रक्रिया को बढ़ाने में भूमिका का आरोप। एसीबी का आरोप है कि इन प्रमाणपत्रों के आधार पर कंपनियों को करीब 979 करोड़ रुपए के टेंडर मिले। एसीबी की टीम ने बाड़मेर रेलवे स्टेशन से इन्हें गिरफ्तार किया था।
फर्जी अनुभव प्रमाणपत्रों की जांच के बाद उन्हें सही मानने वाली रिपोर्ट ही सबसे बड़ा सबूत है। इसी प्रक्रिया के जरिए संबंधित कंपनियों को टेंडर हासिल करने में मदद मिली थी।
कंपनी ने मेल भेजकर बताया, फिर भी एक्शन नहीं
जेजेएम घोटाले में करीब 979.27 करोड़ रुपए की बंदरबांट हुई। एसीबी की पड़ताल के अनुसार टेंडर की शर्तों में कथित तौर पर नियमों के विपरीत 50 करोड़ रुपए से अधिक के प्रोजेक्ट में साइट विजिट सर्टिफिकेट की अनिवार्यता जोड़ी गई।
इससे टेंडर में प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई। इस बीच जयपुर की दोनों फर्मों ने इरकॉन इंटरनेशनल के फर्जी लेटर हेड पर अनुभव और वर्क-कम्प्लीशन सर्टिफिकेट तैयार किया।
एसीबी का मानना है कि टेंडर से पहले ही इसकी प्लानिंग हो चुकी थी। इसके बाद जब कंपनी इरकॉन को इस फर्जीवाड़े का पता चला तो उसने 16 फरवरी 2023 को ई-मेल के जरिए विभाग को शिकायत भेजी। लेकिन जिम्मेदार अफसरों ने कोई एक्शन नहीं लिया था।