जेडीए विस्तार बना ग्रामीणों के लिए गले की फांस, 644 गांवों का काम अटका, चक्कर काटने को मजबूर
राजस्थान सरकार ने पिछले साल एक अक्टूबर को एक अधिसूचना जारी कर 644 गांव को जेडीए रीजन में शामिल किया था। इसके बाद अधिकांश गांवों की सरकारी जमीन को राजस्व रिकार्ड में जेडीए के नाम दर्ज कर दिया है। इसलिए ग्रामीण जेडीए के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
6000 वर्ग किलोमीटर हुआ जेडीए रीजन
644 गांवों को जेडीए रीजन में शामिल करने से जयपुर का क्षेत्रफल करीब 3000 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 6 हजार वर्ग किलोमीटर हो गया।
लेकिन, जेडीए जब तक इन बढ़े हुए अतिरिक्त एरिया में कुछ काम शुरु करता तब तक, मार्च 2026 में हाईकोर्ट ने संजय जोशी की जनहित याचिका पर अधिसूचना से शामिल नए गांवों में निर्माण करने पर रोक लगा दी। यह रोक आज भी जारी है।
लेकिन, सरकार ने इन गांव की जमीनों को जेडीए के रिकार्ड में दर्ज कर दिया है। इससे अब ग्रामीण निर्माण की अनुमति सहित जमीन संबंधी दूसरी अनुमति लेने के लिए जेडीए के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
ग्राम पंचायतों के अधिकारों को खात्मा है यह
बस्सी की झर ग्राम पंचायत निवासी मोहन मीणा का कहना है कि बस्सी में करीब-करीब पूरी सरकारी जमीन सरकारी रिकार्ड में दर्ज हो चुकी है। झर ग्राम पंचायत की करीब 1800 बीघा चारागाह जमीन जेडीए के नाम दर्ज हो गई है। ग्राम पंचायतों के पास अब सिर्फ आबादी की जमीन के अधिकार ही रहे हैं।
स्थिति यह है कि अब सरकारी जमीन पर सड़क,ड्रेनेज या एक सार्वजनिक शौचालय भी बनाने के लिए जेडीए की अनुमति जरुरी है और उसके लिए 35 किलोमीटर दूर जयपुर आना पड़ेगा।
मोहन मीणा का कहना है कि जेडीए के रीजन बढ़ाने से कोई समस्या नहीं है लेकिन,सच्चाई यह है कि जेडीए सिर्फ जमीनों को बेचकर पैसा कमाने का काम करता है और सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं होता। इससे शाहपुरा और चौमूं एरिया के ग्रामीणों को तो और भी ज्यादा समस्या होगी। क्यों कि उनको तो करीब 50 से 70 किलोमीटर से जयपुर आना होगा।
बिना किसी आकलन के बढ़ाया एरिया
हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने वाले एडवोकेट संजय जोशी का कहना है कि जेडीए रीजन में शामिल सभी 644 गांव कृषि प्रधान हैं। सरकार ने यह विस्तार बिना किसी वैध मास्टर प्लान, जोनल डेवलपमेंट प्लान या पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के किया है। मौजूदा मास्टर प्लान 2025 में इन गांवों को शामिल करने का कोई प्रावधान नहीं था। 2025 के बाद लागू होने वाला नया मास्टर प्लान 2047 भी अभी तक तैयार नहीं है। इसके बावजूद सरकार ने सीधे 644 गांवों को जोड़कर प्रक्रिया की अनदेखी की है।
ना एक्सपर्ट की राय ली ना ग्रामीणों से पूछा
विस्तार एक आंतरिक समिति की रिपोर्ट पर आधारित है। शुरुआत में 272 गांवों को शामिल करने का प्रस्ताव था। लेकिन बाद में इसे 100 किलोमीटर के दायरे तक बढ़ा दिया। इस प्रक्रिया में न तो ग्राम पंचायतों से कोई सलाह ली गई और न ही किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ या पर्यावरणीय अध्ययन को आधार बनाया गया। जबकि यह कदम पर्यावरण, कृषि भूमि और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है।
बुनियादी सुविधाएं आज तक नहीं
इस विस्तार से जयपुर का क्षेत्रफल लगभग 3000 से बढ़कर करीब 6000 वर्ग किलोमीटर हो जाएगा। पहले से शामिल कई क्षेत्र में आज तक बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। 1999 और 2010-11 के विस्तार के बाद भी कई इलाके आज तक सड़क,पानी,सीवरेज जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।
मास्टर प्लान में बदलाव या विस्तार से पहले पर्यावरणीय आकलन, जनसुनवाई और पारदर्शी प्रक्रिया जरूरी है। लेकिन इस मामले में इन सभी आवश्यकताओं की अनदेखी की गई है। इस विस्तार से कृषि भूमि का नुकसान, भूजल स्तर में गिरावट, जंगलों और पर्यावरणीय क्षेत्रों पर दबाव तथा अनियंत्रित रियल एस्टेट गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।