डीडवाना पशु मेले पर लम्पी का ग्रहण, गौवंश की खरीद-फरोख्त पर रोक से पशुपालकों को हो रहा आर्थिक नुकसान
कुचामनसिटी में जिले के पशु मेले राष्ट्रीय पहचान रखते हैं। परबतसर का वीर तेजा पशु मेला, लाडनूं का पाबोलाव मेला और डीडवाना का इंडोलाव पशु मेला वर्षों से अपनी अलग छाप छोड़ते आए हैं। यह मेले नागौरी नस्ल के बैलों के लिए पूरे देशभर में प्रसिद्ध हैं।
लेकिन अब इन मेलों पर ग्रहण लगता जा रहा है। ये मेले दिनों-दिन सिमटते जा रहे हैं। हाल ही में गौवंश में आई लम्पी वायरस (Lumpy Virus) ने इन मेलों को और अधिक नुकसान पहुंचाया है। इससे पशु मेले की रौनक ही खत्म हो गई है।
क्यों है डीडवाना पशु मेला खास?
पशु मेला प्रभारी खुमाराम सारण ने जानकारी दी। डीडवाना पशु मेला (Didwana Animal Fair) नागौरी नस्ल के बैलों (Nagauri bulls) के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। नागौरी नस्ल के बछड़े देशभर में खेती-बाड़ी के लिए उत्तम माने जाते हैं। साथ ही देशभर में नस्ल सुधार के लिए भी इनकी खरीद बड़ी तादाद में होती है।
यही कारण है कि हर साल हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश सहित कई राज्यों से पशुपालक नागौरी बैलों को खरीदने के लिए यहां पहुंचते हैं। लेकिन अबकी बार राजस्थान में गौवंश में पनपी लम्पी डिजीज बीमारी के कारण पशुपालन विभाग ने गौवंश को पशु मेले में लाने और उनकी खरीद-फरोख्त पर रोक लगा दी है।
इस रोक के चलते बैल, गायें और अन्य गौवंश भी मेले में नहीं पहुंच पाए हैं। मेले में मवेशियों की संख्या में 60 प्रतिशत तक कमी आ गई है। इससे पहले से ही संकट से जूझ रहा पशु मेला अब और अधिक चिंताजनक स्थिति में पहुंच गया है।
डीडवाना के पशु मेले पर पिछले एक दशक से संकट
डीडवाना के पशु मेले पर पिछले एक दशक से संकट के बादल मंडरा रहे हैं। कुछ सालों पहले तक डीडवाना पशु मेले में 70 हजार से एक लाख तक मवेशी पहुंचते थे। जो अब सिमटकर केवल डेढ़ से 2 हजार ही रह गई है।
इसका सबसे बड़ा कारण नागौरी नस्ल के बछड़ों के राजस्थान से बाहर ले जाने पर रोक है। इसके कारण बाहरी पशुपालक बैलों को राजस्थान से बाहर नहीं ले जा सकते। वहीं दूसरा बड़ा कारण कथित गौरक्षकों की हिंसा है।
व्यापारियों की क्या है परेशानी?
पशुपालकों का कहना है कि जब वे नागौरी नस्ल के बैल खरीदकर अपने राज्यों में ले जाते हैं, तो रास्ते में पुलिस और कथित गौरक्षा दल उन्हें रोक लेते हैं। मेले में खरीद के वैध दस्तावेज दिखाने के बावजूद उन पर आरोप लगाया जाता है कि वे बैलों को काटने के लिए ले जा रहे हैं।
जबकि असलियत यह है कि नागौरी बैल कृषि कार्य के लिए उत्तम माने जाते हैं। दलदली जमीन पर फसलों के बीच हल चलाने में नागौरी बैल लाभकारी होते हैं। इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में नस्ल सुधार के लिए भी नागौरी बैलों की खरीद की जाती है।
लेकिन कथित गौरक्षकों की हिंसा से मवेशियों के खरीदार पशु मेले में आने से डरने लगे हैं। अब रही सही कसर लम्पी डिजीज बीमारी ने पूरी कर दी है। इस कारण जो मेला नागौरी बैलों के लिए प्रसिद्ध था, उसी मेले में नागौरी बैलों और गौवंश की बिक्री पर रोक लगा दी गई है।
निराश लौट रहे व्यापारी
लम्पी बीमारी की वजह से गौवंश पर लगी रोक के कारण इस बार मेले में न तो बैलों की खरीद-फरोख्त हो पाई है, न ही गायों की बिक्री हो सकी है। जो पशुपालक अपने गौवंश लेकर मेले में आ रहे हैं, उन्हें मेला प्रबंधन द्वारा सख्ती से वापस लौटाया जा रहा है।
इससे मेले में गौवंश की संख्या शून्य रह गई है। इसकी वजह से देश के अलग-अलग राज्यों से आए व्यापारियों को गौवंश नहीं मिल रहे हैं। उन्हें निराश होकर वापस लौटना पड़ रहा है। बैलों और गायों की बिक्री नहीं होने से पशुपालकों और खरीदारों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
क्यों अहम है यह मामला
नागौरी नस्ल के बैल राजस्थान की पहचान हैं। ये देशभर में खेती और नस्ल सुधार के लिए जाने जाते हैं। पशु मेले इनकी खरीद-फरोख्त का बड़ा जरिया हैं। लेकिन अब ये मेले सिमट रहे हैं।
इससे पशुपालकों की आजीविका पर असर पड़ रहा है। साथ ही नागौरी नस्ल का संरक्षण भी खतरे में है। सरकार को चाहिए कि पशुपालकों को राहत दे और मेलों की रौनक लौटाए। अब देखना जरूरी है कि आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।