पुलिस को ट्रेनिंग की जरूरत, महेश जोशी की गिरफ्तारी में हाई कोर्ट की फटकार
समझें क्या है पूरा मामला
- हाईकोर्ट ने महेश जोशी की गिरफ्तारी में एसीबी की गंभीर चूक मानी।
- एसीबी गिरफ्तारी के आधार और कारण का अंतर नहीं समझ पाई।
- विशेष न्यायाधीश ने 31 दिन तक गिरफ्तारी की वैधता का आवेदन लंबित रखा।
- कोर्ट ने कहा- एसीबी के जवाब में तथ्यों में हेरफेर किया गया।
- हाईकोर्ट ने पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को ट्रेनिंग की सिफारिश की।
राजस्थान हाई कोर्ट ने पूर्व मंत्री महेश जोशी की गिरफ्तारी को अवैध घोषित करने की उनके बेटे रोहित जोशी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus petition) खारिज कर दी।
लेकिन जस्टिस उमाशंकर व्यास और जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने अपने विस्तृत आदेश में माना कि इस मामले में एसीबी (Anti Corruption Bureau) और विशेष न्यायाधीश दोनों के स्तर पर गंभीर चूक हुई हैं।
कोर्ट ने कहा कि ACB को गिरफ्तारी के आधार यानी ग्राउंड ऑफ अरेस्ट की मूलभूत अवधारणा ही नहीं पता। प्रदेश की पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की ट्रेनिंग की जरूरत है।
याचिका खारिज, लेकिन ACB को फटकार
खंडपीठ ने 12 जून को याचिका खारिज की थी। बुधवार को विस्तृत आदेश सुनाया गया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार जब कोई व्यक्ति न्यायिक आदेशों के तहत हिरासत में हो, तो हैबियस कॉर्पस याचिका से गिरफ्तारी को अवैध घोषित नहीं किया जा सकता। इसलिए याचिका खारिज हुई।
लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता के पास विशेष न्यायाधीश के आदेश को कानून के अनुसार चुनौती देने का रास्ता अभी भी खुला है।
ACB को ग्राउंड ऑफ अरेस्ट की अवधारणा ही नहीं पता
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत यह संवैधानिक आवश्यकता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में बताए जाएं।
लेकिन ACB रिकॉर्ड पर ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सकी जिससे यह साबित हो कि महेश जोशी को वास्तविक गिरफ्तारी के आधार बताए गए थे।
ACB ने केवल अपराध की धाराएं बताईं। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार और गिरफ्तारी के कारण, ये दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं। ACB इस मूलभूत अंतर को ही नहीं समझ पाई।
तथ्यों में हेरफेर
हाईकोर्ट की फटकार यहीं नहीं रुकी। कोर्ट ने ACB के रवैये पर और सख्त टिप्पणी की। ACB ने पहले अपने जवाब में कहा था कि महेश जोशी को गिरफ्तारी के आधार बताए गए थे। बाद में पलटकर कहा कि उनके परिवार को आधार बताए गए थे।
कोर्ट ने कहा कि ये दोनों बातें परस्पर विरोधाभासी हैं। बाद में दाखिल जवाब में कई तथ्य जोड़े गए जो प्रथम दृष्टया हेरफेर किए गए प्रतीत होते हैं।
विशेष जज पर भी कड़ी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने ACB के साथ-साथ ACB मामलों के विशेष न्यायाधीश की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। महेश जोशी की ओर से 7 मई को ही रिमांड के समय गिरफ्तारी की वैधता पर आपत्ति उठाई गई थी।
उस आपत्ति पर उसी वक्त निर्णय लेना विशेष जज का संवैधानिक दायित्व था। लेकिन उन्होंने आवेदन लंबित रखा और करीब 31 दिन बाद उसे खारिज किया।
खंडपीठ ने कहा कि यह देरी बिल्कुल अस्वीकार्य है।
पुलिस और जजों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की ट्रेनिंग जरूरी
हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले पर सिस्टमेटिक सुधार की जरूरत जताते हुए कहा कि प्रदेश की पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बारे में ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।
खंडपीठ ने आदेश की प्रति हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी है ताकि वे इसे मुख्य न्यायाधीश के सामने रख सकें। साथ ही आदेश की कॉपी एसीएस (Additional Chief Secretary) होम को भी भिजवाने के निर्देश दिए हैं।
FAQ
- ग्राउंड ऑफ अरेस्ट और रीजन ऑफ अरेस्ट में क्या फर्क है?
रीजन ऑफ अरेस्ट मतलब वह सामान्य कारण जिसके लिए गिरफ्तारी हुई जैसे धारा बताना। ग्राउंड ऑफ अरेस्ट मतलब उन विशेष तथ्यों और परिस्थितियों का विवरण जिनके आधार पर उस व्यक्ति विशेष को गिरफ्तार किया गया। संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत यह विवरण लिखित में देना अनिवार्य है।
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