बंदरों का बढ़ता आतंक: विधानसभा में मंत्री ने गिनाए कारण, वजह जानकर रह जाएंगे हैरान
News in Short
- राजस्थान विधानसभा में शहरी और ग्रामीण इलाकों में बंदरों के आतंक का मुद्दा उठा।
- स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने विधानसभा में इसके जवाब में गिनाए कई कारण।
- मंत्री ने कहा- मानवीय हस्तक्षेप और भोजन की कमी से बंदर जंगलों से आ रहे बाहर।
- अब तक राजस्थान में 2084 बंदरों को पकड़ा जा चुका है, जिसमें ₹13.32 लाख खर्च हुए।
- बंदरों के पुनर्वास के लिए कदम उठाते हुए जयपुर के संजय वन में बंदरों के लिए सोलर फेंसिंग और फलदार पौधे विकसित किए गए हैं।
News in Detail
राजस्थान के कई शहरी और ग्रामीण इलाकों में बंदरों का आतंक एक गंभीर समस्या बन चुका है। यह मुद्दा सोमवार को विधानसभा में शाहपुरा विधायक मनीष यादव ने उठाया, तो स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने इसके कारणों और समाधान पर जवाब दिया। मंत्री ने कहा कि जंगलों में लोगों के बढ़ते हस्तक्षेप से बंदर गांव और शहरों में पलायन कर रहे है।
एक लाल मुंह का बंदर और एक हनुमान बंदर
मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने विधानसभा में चुटकी लेते हुए जवाब दिया। उन्होने कहा कि बंदर दो तरह के होते है, एक लाल मुंह का दूसरा हनुमान बंदर। इनके हमलों की संख्या इसी वजह से बढ़ी है कि इनके खाने की कमी हो गई है। लोगों का दखल भी इनके आवासीय क्षेत्रों में बढ़ गया है।
बंदरों का पलायन बना आतंक का कारण
मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने बताया कि मानवीय हस्तक्षेप और जंगलों में बढ़ती हलचल के कारण बंदरों ने सुरक्षित स्थानों की तलाश में शहरों की ओर पलायन करना शुरू कर दिया है। पहले ये बंदर जंगलों में रहते थे, लेकिन अब भोजन की कमी और लोगों की बढ़ती संख्या के कारण यह समस्या और गंभीर हो गई है।
पूर्वजों से लेकर ‘मदारी’ तक का सफर
मंत्री खरा ने जीव विज्ञान का हवाला देते हुए कहा कि बंदर और हनुमान लंगूर मानव के पूर्वज माने जाते हैं। उन्होंने उदाहरण दिया, "50-60 साल पहले मदारी बच्चों को बंदर दिखाने आता था, लेकिन अब ये बंदर इतने उच्छृंखल हो गए हैं कि वे रसोई में घुसकर बर्तनों की तोड़फोड़ करते हैं और बुजुर्गों और बच्चों पर हमला करते हैं।"
पेट की भूख से गुस्सेल हुए बंदर
जयपुर के गलता जी और सामोद जैसे धार्मिक स्थलों पर पहले श्रद्धालु बंदरों को चने और केले खिलाकर उनका पेट भरते थे, लेकिन अब इन स्थलों पर बंदरों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि भोजन की कमी हो रही है। इसके कारण बंदर अपनी सुरक्षित जगहों को छोड़कर शहरों की ओर बढ़ने लगे हैं। यही वजह है कि बंदरों के पेट भूख से वह गुस्सेल हो गए है और बच्चों के साथ बुजुर्गों पर भी हमला कर रहे है।
मंत्री ने बताया बदरों के रेस्क्यू का खर्चा
मंत्री ने शाहपुरा तहसील का डेटा (data) प्रस्तुत करते हुए बताया कि 2019 से अब तक हजारों बंदरों को पकड़ा जा चुका है। हालांकि, इस प्रक्रिया पर काफी खर्च हुआ है:
- 2019-20: 664 बंदर पकड़े गए, खर्च ₹4.79 लाख
- 2021-22: 919 बंदर पकड़े गए, खर्च ₹4.83 लाख
- कुल आंकड़ा: अब तक कुल 2084 बंदरों को पकड़ा गया, और ₹13.32 लाख खर्च हुए हैं।
बंदरों की समस्या का समाधान किसकी जिम्मेदारी?
इस समस्या के समाधान को लेकर सदन में भ्रम की स्थिति सामने आई। वन विभाग और स्वायत्त शासन विभाग दोनों अपनी जिम्मेदारी से बचते रहे थे। मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने बताया कि अब सभी जिला कलेक्टरों को बंदरों और लंगूरों के मामलों के निस्तारण के लिए प्राधिकृत अधिकारी नियुक्त किया गया है।
बंदरों के पुनर्वास के लिए कदम
जयपुर के संजय वन में बंदरों के पुनर्वास के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इनमें सोलर फेंसिंग, चेन लिंक जालियां और फलदार पौधों की खेती शामिल है। इन प्रयासों से बंदरों को भोजन मिल सके और वे शहरों में न आएं।
मंत्री ने विधायकों से भी मांगे सुझाव
मंत्री ने सदन में सभी विधायकों से बंदरों की समस्या के समाधान के लिए लिखित सुझाव मांगे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि यह समस्या व्यापक है। इसे लगातार पकड़-धकड़ और वन क्षेत्रों में भोजन की व्यवस्था कर नियंत्रित किया जा सकता है।