माही जल समझौते के रिव्यू की मांग तेज, मिल सकता है अधिक पानी
समझें क्या है पूरा मामला
- यमुना जल विवाद के हल के बाद राजस्थान के लिए एक नई उम्मीद जगी।
- अब निगाहें 60 साल पुराने माही जल बंटवारा समझौते पर टिक गई हैं।
- माही जल समझौते की समीक्षा कर राजस्थान को अधिक पानी मिल सकता है।
- माही का कीमती पानी प्रतिवर्ष व्यर्थ बहकर समुद्र में चला जाता है
Udaipur: यमुना जल विवाद के समाधान के बाद राजस्थान के लिए एक नई उम्मीद जगी है। अब प्रदेश की निगाहें 60 साल पुराने माही जल बंटवारा समझौते पर टिक गई हैं।
वर्तमान में राजस्थान, गुजरात और केंद्र तीनों ही स्तरों पर भाजपा की सरकारें हैं। ऐसे में जनता को उम्मीद है कि दशकों पुराने माही जल समझौते की समीक्षा कर राजस्थान को अधिक पानी मिल सकता है।
अगर इस समझौते की समीक्षा होती है तो माही नदी के पानी का रुख अब सिर्फ बांसवाड़ा-डूंगरपुर क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह अन्य जिलों के जल भविष्य को बदलने में मददगार हो सकता है।
समीक्षा से राजस्थान को कैसे होगा फायदा?
राजस्थान किसान संघर्ष समिति के अनुसार इस समझौते के दौरान एक शर्त यह रखी गई थी कि जब गुजरात के खेड़ा जिले तक नर्मदा नदी का पानी पहुंच जाएगा, तब माही नदी के पूरे पानी का उपयोग करने का अधिकार राजस्थान को सौंप दिया जाएगा।
हालांकि, वर्तमान स्थिति यह है कि गुजरात के उन क्षेत्रों में नर्मदा का पानी पूरी तरह पहुंच चुका है। उन्हें वहां पानी मिलने के बाद भी राजस्थान को माही के पूरे पानी का उपयोग करने का अधिकार आज तक नहीं मिल सका है।
इसके कारण माही का जो कीमती पानी प्रतिवर्ष व्यर्थ बहकर समुद्र में चला जाता है, उससे पश्चिमी राजस्थान को काफी फायदा हो सकता है। यदि इस समझौते का रिव्यू किया जाता है तो नतीजे सकारात्मक निकलने की संभावना है।
क्या है 1966 का मूल माही समझौता?
10 जनवरी, 1966 को राजस्थान और गुजरात के बीच माही जल समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत पानी में राजस्थान की हिस्सेदारी 45 फीसदी और गुजरात की 55 प्रतिशत तय की गई थी।
राजस्थान में स्थित माही बांध की कुल भराव क्षमता 77 टीएमसी (TMC) है। समझौते के नियमों के तहत गुजरात के लिए 40 टीएमसी पानी रिजर्व रखना होता है। राजस्थान को केवल 25 से 37 टीएमसी पानी ही उपयोग के लिए मिल पाता है।
सरकार को लिखा पत्र
इस गंभीर विषय पर प्रदेश में सियासत भी गरमाने लगी है। राज्य सरकार ने बजट 2026-27 में माही बेसिन के अतिरिक्त जल को जालौर और अन्य सूखा प्रभावित जिलों तक पहुंचाने के लिए 5,900 करोड़ रुपए की एक योजना घोषित की है।
इस बीच, स्थानीय सांसद राजकुमार रोत ने इस योजना और समझौते पर सवाल उठाते हुए सरकार को पत्र लिखा है। उनका कहना है कि माही जल बंटवारे की शर्तों पर पुनर्विचार होना चाहिए।
अनास नदी से जालौर-पाली जैसे जिलों को पानी उपलब्ध कराने के लिए बजट तो आवंटित हुआ है, लेकिन स्थानीय जरूरतें पूरी होने के बाद ही अतिरिक्त पानी अन्य क्षेत्रों को दिया जाना चाहिए।
समझौते का रिव्यू जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि यमुना जल समझौते की तरह माही जल समझौते की भी समय रहते समीक्षा किया जाए। इससे राजस्थान को बड़ा फायदा मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि माही के पानी को प्रदेश के सूखाग्रस्त इलाकों तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है। इससे वहां की हमेशा के लिए पानी की किल्लत से मुक्ति मिल सकती है।
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