खुले कुएं बने रहे मौत के सौदागर, आदेश के बाद भी नहीं हुई कार्यवाही; बजट की कमी बनी बाधा

Ashish Bhardwaj | Oct 18, 2026, 12:06 IST
जानलेवा बनते खुले बोरवेल
दौसा जिले में खुले कुएं और बोरवेल से होने वाले हादसे सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर रहे हैं। प्रशासन के आदेशों के बावजूद, ये कुएं एवं बोरवेल बंद नहीं हो पा रहे हैं। ग्रामीणों का मानना है कि बजट की कमी और निगरानी की लापरवाही इसके मुख्य कारण हैं।

दौसा। जिले में पहले बोरवेल हादसों को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है, अब खुले कुएं भी लोगों की जान के लिए खतरा बन रहे हैं। कई जगह कुएं बिना ढक्कन या बिना किसी सुरक्षा घेरा के पड़े हैं। इनमें गिरने से लोगों की मौत के मामले सामने आ चुके हैं। इसके बावजूद इन्हें बंद करने की व्यवस्था अब तक पूरी नहीं हो सकी है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन के आदेश जारी होने के बाद भी जमीनी स्तर पर काम नहीं हुआ।



दौसा में दिसंबर 2024 में कालीखाड़ गांव का पांच साल का बच्चा आर्यन खुले बोरवेल में गिर गया था। करीब 56 से 57 घंटे के बचाव अभियान के बाद उसे बाहर निकाला गया, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी। इस हादसे के बाद जिला प्रशासन ने खुले बोरवेल और कुओं को सुरक्षित करने के निर्देश देने की बात कही थी। बाद में भी खुले कुओं की समस्या सामने आती रही।



आर्यन हादसे के बाद भी नहीं बदले हालात

कालीखाड़ गांव में हुए हादसे के दौरान प्रशासन और बचाव दल ने बच्चे को निकालने के लिए लगातार कोशिश की थी। मौके पर बड़ी मशीनें लगाई गईं और कई अधिकारी वहां मौजूद रहे। लंबी मशक्कत के बावजूद बच्चे को नहीं बचाया जा सका। घटना के बाद खुले बोरवेल और कुओं (Open Wells Dausa) को ढकने की जरूरत पर जोर दिया गया।



राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस घटना का स्वतः संज्ञान लिया था। आयोग ने कहा था कि ऐसी घटनाएं रोकने के लिए जारी दिशा-निर्देशों के पालन पर सवाल उठते हैं। आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से रिपोर्ट मांगी थी।



सिकराय क्षेत्र में खुले कुओं की समस्या

सिकराय विधानसभा क्षेत्र के गांवों और ढाणियों में बड़ी संख्या में खुले कुएं होने की बात सामने आई है। सरपंच संघ अध्यक्ष विपिन मीणा के मुताबिक, ग्राम पंचायतों के पास इन्हें बंद कराने के लिए पर्याप्त बजट नहीं है। उनका कहना है कि एक कुएं को सुरक्षित करने में 50 हजार रुपये से ज्यादा खर्च आ सकता है। कई पंचायतों में ऐसे दर्जनों कुएं मौजूद हैं।



पंचायतों के सामने चुनौती केवल कुओं की पहचान करने की नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित करने के लिए धन जुटाने की भी है। यदि हर पंचायत को पर्याप्त बजट मिले, तो खुले कुओं को बंद करने या उनके आसपास सुरक्षा घेरा बनाने का काम तेजी से किया जा सकता है।



हालांकि, कितने कुएं खुले पड़े हैं और कितनों को सुरक्षित किया जा चुका है, इसका जिलेवार आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है। ऐसे में समस्या का वास्तविक पैमाना सामने लाने के लिए प्रशासन को सर्वे और सार्वजनिक सूची तैयार करने की जरूरत है।



हादसे हुए, लेकिन सुरक्षा का इंतजाम नहीं

स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार, सिकराय क्षेत्र के कुडेरा गांव में एक युवक खुले कुएं में गिर गया था, जिससे उसकी मौत हो गई। कालवान गांव में भी कुएं में गिरने से एक व्यक्ति की जान जाने की जानकारी दी गई है। वहीं, बांदीकुई क्षेत्र में रात के समय मोटरसाइकिल समेत कुएं में गिरने से एक युवक की मौत का मामला भी सामने आया था।



पहले भी सामने आई है खुले कुएं व बोरवेल घटना

दौसा में खुले कुओं से जुड़े हादसों की समस्या पहले भी रिपोर्ट की जा चुकी है। अप्रैल 2025 की एक रिपोर्ट में कालवान गांव में युवक की मौत और ग्राम पंचायतों में दर्जनों खुले कुएं व बोरवेल होने की बात कही गई थी। जून 2025 में बांदीकुई क्षेत्र में एक युवक की कुएं में गिरने से मौत की भी रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी।



इन घटनाओं से साफ है कि खुले कुओं को सुरक्षित करना केवल कागजी निर्देशों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हादसे के बाद बचाव अभियान चलाना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि ऐसे खतरे पहले ही खत्म कर दिए जाएं।




बजट और जिम्मेदारी तय करना जरूरी

ग्रामीणों के सामने सवाल है कि जब खुले कुओं से हादसे हो रहे हैं, तो उन्हें सुरक्षित करने का काम कब पूरा होगा। पंचायतों के पास बजट की कमी है, वहीं प्रशासन के आदेशों के बाद भी समस्या बनी रहने की शिकायतें हैं। ऐसे में जिम्मेदारी तय करना और काम की निगरानी करना जरूरी है।




बोरवेल के लिए बजट नहीं

प्रशासन को गांव-गांव सर्वे कर खुले कुओं और बोरवेल (Borewell Accidents Rajasthan) की सूची तैयार करनी चाहिए। खतरे वाले स्थानों पर तत्काल ढक्कन, मजबूत जाली या सुरक्षा घेरा लगाया जाना चाहिए। जहां कुएं उपयोग में नहीं हैं, उन्हें नियमानुसार सुरक्षित तरीके से बंद कराने की जरूरत है।



दौसा में हुए हादसे चेतावनी हैं कि लापरवाही की कीमत किसी परिवार को अपनी जान देकर नहीं चुकानी चाहिए। अब जरूरत नए निर्देश जारी करने से ज्यादा उनके पालन की है।



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