पाली निकाय चुनाव की कलह: कांग्रेस वार रूम में हंगामा, बागी पार्षदों ने उठाया गलत टिकट वितरण का मुद्दा
राजस्थान कांग्रेस (Rajasthan Congress) में चल रहा भीतरघात का संकट अब एक बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच चुका है। शहरी निकाय चुनावों में बहुमत होने के बाद भी पाली नगर निगम में अपना मेयर न बना पाना कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ा राजनीतिक और अनुशासनात्मक संकट बन गया है।
इस हार के बाद शुरू हुई आंतरिक कलह अब स्थानीय स्तर से निकलकर सीधे प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के जयपुर स्थित वॉर रूम तक पहुंच गई है। जहां शुक्रवार को नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच जमकर हंगामा देखने को मिला। यह नजारा पार्टी की अंदरूनी एकजुटता पर सवाल खड़े कर रहा है।
क्रॉस वोटिंग जांच कमेटी का सख्त रुख
इस पूरे विवाद को सुलझाने और क्रॉस वोटिंग (Cross Voting) की जांच के लिए गठित उच्च स्तरीय कमेटी के अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी (CP Joshi) ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। हंगामे के दौरान उन्होंने बागी पार्षदों को दो टूक लहजे में साफ कर दिया कि अनुशासन के मोर्चे पर कोई समझौता नहीं होगा।
उन्होंने साफ कहा कि कमेटी हर व्यक्ति से व्यक्तिगत तौर पर नहीं मिल सकती। यदि किसी को अपनी बात कहनी है तो वे सीधे प्रदेशाध्यक्ष के सामने अपनी बात रखें। डॉ. जोशी का यह सख्त रवैया साफ संकेत देता है कि कांग्रेस नेतृत्व इस समय किसी भी प्रकार के दबाव में आने के मूड में नहीं है।
बागी पार्षदों का गलत टिकट वितरण का आरोप
दूसरी ओर हंगामा करने वाले राजबाला हिंगड़ गुट के पार्षदों ने गलत टिकट वितरण का मुद्दा उठाकर नेतृत्व को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। इन बागी पार्षदों का सीधा आरोप है कि स्थानीय स्तर पर गलत उम्मीदवार को मेयर का टिकट दिया गया। जिसके कारण वे क्रॉस वोटिंग करने पर मजबूर हुए।
पार्षदों का मानना है कि उनकी यह बगावत कोई पार्टी विरोधी गतिविधि नहीं है। बल्कि थोपे गए नेतृत्व के खिलाफ एक लोकतांत्रिक विरोध है। वे खुद को दोषी मानने के बजाय टिकट बांटने वाले बड़े नेताओं पर ही सवाल उठा रहे हैं। यह स्थिति पार्टी के लिए चिंता का विषय है।
कांग्रेस वॉर रूम बना अखाड़ा
यह पूरी घटना दर्शाती है कि जो वॉर रूम कभी चुनावी रणनीतियों और एकजुटता का केंद्र हुआ करता था, वह अब गुटबाजी और आंतरिक कलह का अखाड़ा बन चुका है। पाली से आए दोनों गुटों ने एक-दूसरे पर पार्टी को हरवाने और सुनवाई न होने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
इससे पार्टी की छवि पर असर पड़ रहा है। कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ रही है। अगर समय रहते संगठन ने इस असंतोष को दूर नहीं किया तो यह गुटबाजी आने वाले पंचायत चुनावों में कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है।
पाली नगर निगम में क्या हुआ था?
गौरतलब है कि पाली नगर निगम में कांग्रेस को 65 में से 29 वार्ड पार्षद मिले थे। भाजपा के 21 और 15 निर्दलीय पार्षद जीते थे। कांग्रेस ने राजबाला हिंगड़ को मेयर का प्रत्याशी बनाया था।
लेकिन कांग्रेस पार्षदों की क्रॉस वोटिंग के कारण भाजपा की प्रत्याशी नमिता 33 वोट लेकर मेयर का चुनाव जीत गईं। कांग्रेस प्रत्याशी को मात्र तीन वोट ही मिले थे। यह नतीजा कांग्रेस के लिए बड़ा झटका था। इसी वजह से पार्टी में अंदरूनी कलह शुरू हुई।
अब गेंद प्रदेश नेतृत्व के पाले में
अब गेंद प्रदेश नेतृत्व के पाले में है। क्या वह बागियों पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करता है या कार्यकर्ताओं की नाराजगी को देखते हुए टिकट वितरण के फैसले की समीक्षा करता है। यह देखना जरूरी है।
अगर पार्टी ने समय रहते सही फैसला नहीं लिया तो आने वाले चुनावों में नुकसान हो सकता है। पंचायत चुनाव सिर पर हैं। ऐसे में पार्टी को एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा। अब सबकी नजर प्रदेश नेतृत्व के फैसले पर टिकी है।