पंचायत-निकाय चुनाव: निर्वाचन आयोग बोला-हम तैयार, सरकार ने मांगी कानूनी राय
ऐसे समझें पूरा मामला
- 31 जुलाई की डेडलाइन नजदीक, बिना चुनाव गहरा सकता है कानूनी टकराव।
- राज्य चुनाव आयोग बोला, हम चुनाव के लिए तैयार, सरकार ने AG से मांगी राय।
- ओबीसी आयोग की रिपोर्ट और सर्वे में देरी को सरकार बना रही अपना ढाल।
- ओबीसी आयोग को सीट आरक्षण के लिए नहीं मिल रहे डेटा, टिप्पणी से इनकार।
- चुनाव टालने से पंचायती राज और स्थानीय निकायों में प्रशासक राज हो रहा हावी।
राजस्थान में पंचायत और शहरी निकायों के चुनावों को लेकर अभी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। हाई कोर्ट ने चुनाव कराने के लिए सरकार को 31 जुलाई की समय सीमा दी है। हकीकत यह है कि चुनाव कराने को लेकर सरकार, राज्य निर्वाचन आयोग और ओबीसी आयोग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं।
हालांकि, राज्य चुनाव आयोग के अध्यक्ष राजेश्वर सिंह का कहना है कि उनकी तैयारी पूरी है। जैसे ही सरकार सीटों का आरक्षण करके उन्हें दे देगी, चुनाव करवा दिए जाएंगे। उधर, सरकार ने सोमवार को ही महाधिवक्ता को पत्र लिखकर उनसे कानूनी राय मांगी है।
यह तक की कोर्ट ने चुनाव की डेडलाइन
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार राजस्थान सरकार पंचायत व निकाय चुनाव 5 साल में करवाने के लिए बाध्य है। आपात स्थितियों को छोड़कर इन चुनावों को टाला नहीं जा सकता।
राजस्थान में दिसंबर 2024 और जनवरी 2025 में बड़ी संख्या में पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो गया था। लेकिन, सरकार ने चुनाव नहीं करवाए और पूर्व सरपंचों को प्रशासक लगा दिया।
हाईकोर्ट ने नवंबर 2025 में प्रदेश में 15 अप्रैल तक पंचायत व निकाय चुनाव करवाने के आदेश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा था।
सरकार और राज्य चुनाव आयोग ने 15 अप्रैल तक चुनाव करवाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। पूर्व विधायक संयम लोढा ने आयोग व सरकार के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की थी। 23 मई को हाई कोर्ट ने 31 जुलाई तक चुनाव करवाने की नई तारीख तय कर दी।
नहीं दिख रही सरकार की तैयारी
इसके बावजूद चुनाव कराने को लेकर सरकार की तैयारी नहीं दिख रही है। सूत्रों का कहना है कि सरकार इन चुनावों को 31 जुलाई तक कराने के मूड़ में नहीं है। वह इन्हें आगे के लिए टालना चाहती है।
पूर्व विधायक संयम लोढ़ा का कहना है कि पंचायत और स्थानीय निकायों में निर्वाचित प्रतिनिधि बोर्ड के अस्तित्व में नहीं होने से जनता सीधे तौर पर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित हो रही है।
सूत्रों को कहना है कि सरकार इस बार भी चुनाव टालना चाह रही है। उसकी मंशा वन नेशन, वन इलेक्शन की भावना के अनुरूप प्रदेश में चुनाव कराने की है।
चुनाव आयोग बोला, आज ही भेजा रिमाइंडर
उधर, राज्य चुनाव आयोग के अध्यक्ष राजेश्वर सिंह ने बताया कि वह एक जून को ही सरकार को पत्र लिखकर ओबीसी, एससी-एसटी व महिलाओं की आरक्षित सीटों के बारे में जानकारी मांग चुके हैं। जवाब नहीं आने पर आज ही ( 15 जून को ) सरकार को फिर से रिमाइंडर भेजा है।
ओबीसी आयोग के रिपोर्ट देने में देरी पर राजेश्वर का कहना है कि यह सरकार और ओबीसी आयोग के बीच का मामला है। इस बारे में वह कुछ नहीं कह सकते।
ओबीसी आयोग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) के अध्यक्ष मदन सिंह भाटी ने इस मामले में ज्यादा कुछ बताने से इनकार कर दिया। उन्होंने यह जरुर कहा कि हाई कोर्ट ने उन्हें कोई निर्देश नहीं दिए हैं।
नौकरशाही की जकड़न में पंचायती राज
नियमानुसार पंचायत व स्थानीय निकाय बोर्ड का कार्यकाल खत्म होने से पहले अगले कार्यकाल के लिए चुनाव हो जाने चाहिए।
पिछले वर्ष नवंबर में हाईकोर्ट ने 15 अप्रैल तक चुनाव करवाने को कहा था। इसके बाद 31 जुलाई की तारीख तय की। इसका सीधा परिणाम यह हुआ है कि पंचायतों व निकायों में सरपंचों व पार्षदों के स्थान पर प्रशासक राज स्थापित हो गया है।
पूर्व विधायक लोढ़ा के अनुसार गांवों और कस्बों की कमान निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बजाय सरकारी अधिकारियों (प्रशासकों) के हाथ में है। नागरिक के लिए अपनी नाली, सड़क, पानी और बिजली जैसी बुनियादी समस्याओं के लिए किसी निर्वाचित पार्षद या सरपंच के पास जाना अधिक आसान है।
उन्होंने कहा कि निर्वाचित पंचायत व बोर्ड और वित्तीय समितियों के नहीं होने से केंद्रीय और राज्य वित्त आयोग से मिलने वाले बड़े विकास फंड का उपयोग नीतियों के अभाव में ठप्प पड़ा है।
सर्वे और प्रक्रिया का बहाना या मिलीभगत
सरकार का तर्क है कि पहले ओबीसी, एससी-एसटी आरक्षण तय होना चाहिए। इसके बाद ही महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान की पालना होगी। यह सब हो जाने के बाद ही चुनाव करवाए जा सकते हैं।
लेकिन राज्य ओबीसी आयोग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) रिपोर्ट नहीं दे रहा है। इस रिपोर्ट के मिलने पर ही ओबीसी, एससी-एसटी व महिलाओं की सीटें तय होंगी। जब तक यह प्रक्रिया पूरी न हो तब तक चुनाव करवाना संभव नहीं है।
लाचार प्रशासन या हार का डर
पूर्व विधायक संयम लोढ़ा के अनुसार चुनाव के लिए ओबीसी आयोग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) की रिपोर्ट नहीं मिलने की दलील का कोई अर्थ नहीं है। इससे तो सरकार की प्रशासनिक लाचारी झलकती है। वास्तविकता में यह सत्ता विरोधी लहर के कारण पंचायतों व स्थानीय निकायों में हार के डर से चुनाव टालने की सोची-समझी रणनीति है ?
लोढ़ा का दावा है कि सरकार हाई कोर्ट के आदेश की पालना में 31 जुलाई तक चुनाव करवाने के लिए बाध्य है। अन्यथा सरकार के गैर-संविधानिक काम के विरुद्ध अदालत से लेकर सड़क तक संघर्ष किया जाएगा।
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