जेल के गेट से गिरफ्तारी पर हाई कोर्ट सख्त, SOG से पूछा- सवा दो साल से क्यों सोई थी एजेंसी?

Mukesh Sharma | May 20, 2026, 19:00 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान में पेपर लीक माफिया जगदीश बिश्नोई को जेल गेट से दोबारा गिरफ्तार करने पर हाई कोर्ट ने SOG को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग माना है।

राजस्थान में पेपर लीक के कई मामलों में आरोपी जगदीश बिश्नोई 2020 के एक मामले में दो साल से अधिक समय से जेल में बंद था। यह मामला जयपुर के सांगानेर थाने में हुआ था। हाई कोर्ट की दो अलग-अलग बैंच ने में इस मामले में जगदीश को 7 मार्च 2025 और 16 जनवरी 2026 को जमानत दे दी थी।



जमानत की कानूनी प्रक्रिया पूरी करके जगदीश 19 जनवरी 2026 को रिहाई के लिए जेल के बाहर पहुंचा था। ठीक उसी समय SOG के अधिकारियों ने उसे जेल के गेट पर ही दबोच लिया।



यह गिरफ्तारी परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल से जुड़े एक नए मामले में 2026 में एसओजी विशेष थाने में दर्ज एफआईआर में की गई थी।



चौंकाने वाली बात यह है कि यह नई FIR साल 2020-2021 की एक घटना से संबंधित है। यानी घटना के करीब चार साल बाद यह मामला दर्ज किया गया।



कोर्ट ने SOG की नीयत पर उठाए सवाल

हाई कोर्ट ने कहा है कि घटनाओं का यह क्रम किसी निष्पक्ष या अचानक हुई जांच का हिस्सा नहीं, बल्कि एक नियोजित रणनीति की ओर स्पष्ट इशारा करता है।



जस्टिस फरजंद अली ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि जब याचिकाकर्ता जगदीश विश्नोई दो साल से जेल में था तो एसओजी ने नए मामले में उससे पूछताछ या गिरफ्तारी की कोशिश तक नहीं की।



जस्टिस फरजंद अली ने 30 अप्रैल के आदेश में SOG को फटकार लगाते हुए आरोपी को तुरंत रिहा करने के आदेश दिए। कोर्ट ने कहा है कि अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, सरकार की एजेंसियां कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं कर सकतीं।



यह महज इत्तेफाक नहीं

कोर्ट ने कहा कि अपराध की जानकारी एजेंसी को काफी समय से थी। फिर भी जब तक जगदीश हिरासत में रहा, तब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। ठीक उसकी रिहाई के दिन ही गिरफ्तारी करने को महज एक इत्तेफाक नहीं माना जा सकता है। कोर्ट के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम से जांच एजेंसी की नीयत (bona fides) पर गंभीर संदेह पैदा होता है।



यह तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा हमला

अदालत ने SOG की कार्यप्रणाली की आलोचना करते हुए कहा कि एजेंसी ने आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों को उलट दिया।



गिरफ्तारी के समय न तो शिकायतकर्ता और न ही मुख्य गवाहों के बयान दर्ज किए गए थ। और ना ही आरोपी के खिलाफ कोई ठोस सबूत जुटाए थे।



ऐसा लगता है कि जांच को बाद की औपचारिकता बना दिया गया और गिरफ्तारी को प्राथमिकता दे दी गई। यह तरीका संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर सीधा हमला है ।



कानून का शासन या साम, दाम, दंड, भेद की नीति!

अदालत ने माना कि प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और फर्जीवाड़े के आरोप बेहद गंभीर हैं। यह रात-दिन मेहनत करने वाले लाखों युवाओं के सपनों और उम्मीदों पर पानी फेरते हैं, राज्य की मशीनरी पर अनुचित बोझ डालते हैं। लेकिन आरोपों की गंभीरता कितनी भी क्यों न हो, इससे राज्य के अधिकारियों को कानून की स्थापित प्रक्रिया का उल्लंघन करने का लाइसेंस नहीं मिल जाता ।



मर्यादाहीनता की सीमा तक नहीं जा सकते..

जस्टिस फरजंद अली ने अपनी टिप्पणी में कहा, राज्य और आरोपी के बीच की कानूनी लड़ाई को मर्यादाहीनता की प्रतिस्पर्धा में नहीं बदला जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि राज्य किसी अदालत के जमानत आदेश से असंतुष्ट है तो उसके पास अपील का रास्ता मौजूद है।



लेकिन किसी भी कीमत पर येन-केन-प्रकारेण (by hook or by crook) अदालती आदेशों को बेअसर करने के लिए एक के बाद एक नया मुकदमा ठोकना और आरोपी को जेल में सड़ने के लिए मजबूर करना पूरी तरह से गैर-कानूनी है ।



ADG से मांगा जवाब, मुआवजे की चेतावनी

कोर्ट ने कहा कि वह कानून की आड़ में हो रही इस कथित अवैध हिरासत को मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकता। इसलिए, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADGP) से व्यक्तिगत हलफनामा (Affidavit) दायर कर निम्नलिखित बिंदुओं पर स्पष्टीकरण देने को कहा है:



  • आरोपी की रिहाई के ठीक उसी दिन, करीब चार साल पुरानी घटना को लेकर FIR संख्या 03/2026 दर्ज करने के पीछे क्या परिस्थितियां थीं?
  • गिरफ्तारी के वक्त याचिकाकर्ता के खिलाफ जांच एजेंसी के पास क्या ठोस सामग्री उपलब्ध थी ?
  • बिना किसी ठोस और प्रत्यक्ष जांच के, FIR दर्ज होते ही तुरंत गिरफ्तारी करने का क्या औचित्य था ?
  • यदि यह हिरासत अंतिम रूप से अवैध पाई जाती है तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित रहे आरोपी को राज्य सरकार से मुआवजा क्यों नहीं दिलवाया जाए?

तुरंत रिहाई के आदेश

कोर्ट ने याचिका पर अंतिम फैसला आने तक पेपर लीक मास्टरमाइंड जगदीश बिश्नोई को एक लाख रुपए की व्यक्तिगत जमानत पर तत्काल रिहा करने के आदेश दिए। इस मामले में विशेष बात यह है कि जगदीश विश्नाई की पैरवी उसकी पत्नी सरस्वती कुमारी ने की थी।



बेल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची सरकार

राजस्थान सरकार ने जगदीश विश्ननोई के 16 जनवरी,2026 के जमानत देने वाले आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।



सुप्रीम कोर्ट जगदीश विश्ननोई को नोटिस देकर जवाब मांग चुका है। सरकार का कहना है वह एसआई भर्ती 2021 के पेपर लीक मामले सहित पेपर लीग संगठित अपराध का मास्टरमाइंड और किंगपिन है।



उसके विरुद्ध पुख्ता सबूत हैं इसके बावजूद हाईकोर्ट ने उसे जमानत दी है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से जगदीश विश्ननोई की जमानत रद्ध करने की गुहार की है।



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