16 साल बाद भी प्लॉट नहीं मिला: मंगलम बिल्डर पर 1.10 लाख रुपए हर्जाना, 11 लाख 9% ब्याज सहित लौटाने के आदेश
समझें क्या है पूरा मामला
- जसमिल कौर ने मंगलम ग्रीन योजना में प्लॉट बुक कराने के लिए 11 लाख रुपए जमा किए थे।
- लंबे समय तक प्लॉट का कब्जा नहीं मिलने पर उन्होंने उपभोक्ता आयोग में शिकायत की।
- कंपनी ने योजना का काम हाईकोर्ट की रोक के कारण रुकने की दलील दी।
- आयोग ने लगातार आश्वासन देने और एडवांस की रकम नहीं लौटाने को सेवा में कमी माना।
- आयोग ने 1.10 लाख रुपए हर्जाना और 11 लाख रुपए 9 प्रतिशत सालाना ब्याज सहित लौटाने के निर्देश दिए।
जयपुर में प्लॉट बुक करने के बाद लंबे समय तक कब्जा नहीं मिलने के मामले में जिला उपभोक्ता आयोग नंबर-4 ने मंगलम बिल्ड डेवलपर्स को हर्जाना देने और एडवांस की राशि ब्याज सहित लौटाने के निर्देश दिए हैं। आयोग ने कंपनी पर कुल 1 लाख 10 हजार रुपए का हर्जाना लगाया है। इसके अलावा, प्लॉट बुक कराने के लिए जमा किए गए 11 लाख रुपए पर भुगतान की तारीख से 9 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का आदेश दिया है।
मामला मंगलम बिल्ड डेवलपर्स की मंगलम ग्रीन आवासीय योजना से जुड़ा है। परिवादिया जसमिल कौर ने योजना में प्लॉट बुक कराने के लिए 11 लाख रुपए एडवांस जमा कराए थे। उनका कहना था कि लंबे समय तक इंतजार करने के बाद भी न तो प्लॉट मिला और न ही जमा राशि वापस की गई।
मंगलम ग्रीन योजना में प्लॉट बुक कराने के बाद क्या हुआ?
परिवादिया जसमिल कौर के अनुसार, उन्होंने मंगलम बिल्ड डेवलपर्स की मंगलम ग्रीन योजना में प्लॉट बुक कराने के लिए 11 लाख रुपए एडवांस जमा कराए थे। इसके बावजूद लंबे समय तक योजना में विकास कार्य शुरू नहीं हुआ और उन्हें प्लॉट का कब्जा नहीं मिला। परिवादिया ने यह भी आरोप लगाया कि कंपनी ने एडवांस की राशि वापस नहीं की। इसके बाद उन्होंने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई। मामले में मुख्य सवाल यह था कि जब योजना विकसित नहीं हो सकी और प्लॉट देना संभव नहीं था, तो कंपनी ने जमा राशि वापस क्यों नहीं की?
मंगलम बिल्ड डेवलपर्स ने क्या दलील दी?
कंपनी की ओर से आयोग में कहा गया कि योजना तत्कालीन मास्टर प्लान और भू-उपयोग के प्रावधानों के अनुसार शुरू की गई थी। बाद में मास्टर प्लान से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने रोक लगा दी, जिसके कारण योजना का विकास कार्य रुक गया। कंपनी के मुताबिक, परिवादिया को इस स्थिति की जानकारी दी गई थी और उन्होंने इंतजार करने पर सहमति जताई थी।
हालांकि, आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि योजना विकसित नहीं होने की स्थिति में भी एडवांस की राशि लंबे समय तक वापस नहीं करना और लगातार आश्वासन देना सेवा में कमी है।
आयोग ने मंगलम बिल्डर को क्या आदेश दिया?
जिला उपभोक्ता आयोग नंबर-4 की पीठ, जिसमें अध्यक्ष अशोक कुमार शर्मा और सदस्य नीलम शर्मा शामिल थे, ने कंपनी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।आयोग के अनुसार, किसी आवासीय योजना का प्रचार करने और बुकिंग लेने से पहले जरूरी कानूनी औपचारिकताएं और स्वीकृतियां सुनिश्चित करना बिल्डर की जिम्मेदारी है। आयोग ने माना कि जब योजना विकसित ही नहीं हो सकी, तो परिवादिया को प्लॉट का कब्जा दिलाना संभव नहीं है। ऐसे में जमा राशि वापस करने और सेवा में कमी के लिए हर्जाना देना जरूरी है।
आदेश के अनुसार:
- कंपनी को 1 लाख 10 हजार रुपए हर्जाना देना होगा।
- एडवांस के 11 लाख रुपए जमा करने की तारीख से 9 प्रतिशत सालाना ब्याज सहित लौटाने होंगे।
आदेश की तारीख और भुगतान की अंतिम समयसीमा उपलब्ध जानकारी में स्पष्ट नहीं है। प्रकाशन से पहले आयोग के मूल आदेश से इनकी पुष्टि की जानी चाहिए।
यह मामला क्यों जरूरी है?
आवासीय योजना में प्लॉट खरीदने के लिए लोग अपनी बचत का बड़ा हिस्सा जमा करते हैं। अगर बुकिंग के बाद योजना विकसित नहीं होती और रकम भी वापस नहीं मिलती, तो खरीदार को आर्थिक नुकसान और लंबे इंतजार का सामना करना पड़ता है।
इस मामले में उपभोक्ता आयोग ने स्पष्ट किया कि योजना का विकास रुकने की स्थिति में भी खरीदार की जमा राशि को अनिश्चित समय तक रोके रखना उचित नहीं है। यह फैसला आवासीय योजनाओं में बुकिंग लेने से पहले कानूनी मंजूरियों और ग्राहकों के हितों का ध्यान रखने की जिम्मेदारी को रेखांकित करता है।