पुलिस को नहीं है बेल बॉन्ड निरस्त करने का अधिकार, हाई कोर्ट ने की बड़ी टिप्पणी
News In Short
- राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा, पुलिस को नहीं है बेल बॉन्ड रद्द करने का अधिकार।
- कोर्ट ने कहा एक बार स्वीकार किए गए बेल बॉन्ड केवल कोर्ट ही रद्द कर सकती है।
- जांच एजेंसी किसी आरोपी की स्वतंत्रता छीनने के लिए न्यायिक शक्तियों का उपयोग नहीं कर सकती।
- कोर्ट ने पाया कि इस मामले में बिजली अधिनियम की धारा-136 जबरन जोड़ी गई।
- पुलिस को जमानत रद्द करानी है तो उसे सक्षम अदालत में प्रार्थना पत्र पेश करना होगा।
News In Detail
राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा है कि पुलिस या अन्य जांच एजेंसी किसी आरोपी के बेल बॉन्ड को एक बार स्वीकार किए जाने के बाद रद्ध नहीं कर सकतीं। स्वीकार किए गए बेल बॉन्ड को रद्द करने का अधिकार केवल कोर्ट को है।
जस्टिस अनिल उपमन ने यह आदेश मानवेन्द्र सिंह राठौड़ उर्फ मोनू की आपराधिक याचिका पर दिया। याचिका में जोधपुर के बोरूंदा थाने में दर्ज एफआईआर को निरस्त करने की मांग की गई थी।
यह है मामला
नागौर निवासी सत्यनारायण अग्रवाल ने 2 जनवरी 2023 को बोरूंदा थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। इसमें उसने याचिकाकर्ता मानवेन्द्र सिंह पर अपने कृषि मंडी स्थित गोदाम पर जबरन कब्जा करने व जान से मारने की धमकी देने के आरोप लगाए थे।
याचिकाकर्ता का कहना था कि कब्जा तो एफआईआर दर्ज करवाने वाले ने कर रखा है और गोदाम का पट्टा उसके दादा के नाम है। पुलिस ने शुरु में गैर-जमानती धाराओं में मामला दर्ज किया था और याचिकाकर्ता की जमानत के बेल-बांड भी स्वीकार कर लिए थे। लेकिन, बाद में मामले को गैर-जमानती बनाने के लिए बिजली अधिनियम की धारा-136 जोड़ दी ओर बेल बांड रद्ध कर दिए।
कोर्ट ने माना-संपत्ति विवाद है असली जड़
हाई कोर्ट ने सुनवाई के बाद कहा कि प्रथमदृष्टया मामला संपत्ति विवाद का है। शिकायतकर्ता लंबे समय से गोदाम पर कब्जा किए हुए था जबकि,उसका पट्टा याचिकाकर्ता के दादा के नाम पर है। इससे स्पष्ट है कि दोनों पक्षों के बीच संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा था।
बिजली कंपनी ने क्यों नहीं करवाई रिपोर्ट दर्ज
हाईकोर्ट ने कहा है कि घटना के समय बिजली चोरी या बिजली उपकरण चोरी का कोई आरोप नहीं था। बिजली विभाग ने एफआईआर दर्ज नहीं करवाई।
रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जो धारा 136 जोड़ने को उचित ठहराता हो। मीटर रीडर की रिपोर्ट घटना के लगभग एक महीने बाद तैयार की गई। यदि वास्तव में बिजली मीटर से छेड़छाड़ हुई होती तो बिजली विभाग तुरंत कार्रवाई करता। धारा 136 को आरोपी की स्वतंत्रता सीमित करने के उद्देश्य से जोड़ा गया।
पुलिस होती कौन है..
हाई कोर्ट ने कहा कि एक बार बेल बॉन्ड स्वीकार हो जाने के बाद पुलिस अपने स्तर पर उसे रद्द नहीं कर सकती। बेल बांड रद्ध करने का अधिकार केवल अदालतों के पास है। अनुसंधान के दौरान यदि गंभीर या गैर-जमानती धाराओं में मामला बनना पाया भी जाता है तो भी पुलिस स्वयं बेल बांड रद्ध नहीं कर सकती।
तो कोर्ट आती पुलिस
कोर्ट ने कहा है कि यदि जांच एजेंसी को लगता है कि आरोपी को जमानत पर बने रहने का अधिकार नहीं है तो उसे सक्षम अदालत में जमानत रद्ध करने की अर्जी दायर करनी होगी। कोर्ट ने कहा है कि यदि जांच एजेंसी को स्वतः बेल रद्द करने की शक्ति देना पुलिस को न्यायिक शक्तियां देना होगा। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के बेल बांड प्रभावी रहने, लेकिनएफआईआर रद्ध करने से इनकार कर दिया है।
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