400 साल पुराना एस्ट्रोलैब होगा लंदन में नीलाम, उस दौर का माना जाता था सुपरकंप्यूटर
News In Short
- जयपुर राजघराने का 400 साल पुराना खगोलीय यंत्र सोथबीज लंदन में होगा नीलाम।
- वैज्ञानिक और ऐतिहासिक महत्व के कारण इसकी बोली 15 से 25 करोड़ रुपए तक संभव।
- बिना बिजली चलने वाला यह एस्ट्रोलैब उस दौर का अत्याधुनिक 'सुपरकंप्यूटर' था।
- 8 किलो वजनी इस डिवाइस पर 94 शहरों के अक्षांश और 38 तारों के नाम अंकित हैं।
- इस यंत्र पर तारों के नाम फारसी और देवनागरी (संस्कृत) दोनों लिपियों में लिखे गए हैं।
News In Detail
Jaipur: आज की दुनिया जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और हाई-स्पीड प्रोसेसर्स पर टिकी है, वहीं 17वीं सदी का एक ऐसा कंप्यूटर दुनिया के सामने आया है जिसने वैज्ञानिकों और कलेक्टर्स को आश्चर्यचकित कर दिया है। पीतल से बना यह हाथ से चलने वाला 'एस्ट्रोलैब' जयपुर राजघराने का हिस्सा था। अब यह दुर्लभ डिवाइस 29 अप्रैल को लंदन के प्रसिद्ध नीलामी घर सोथबीज (Sotheby's) में नीलामी के लिए तैयार है, जिसकी कीमत 25 करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है।
क्या है यह 'एस्ट्रोलैब' और क्यों कहते हैं इसे कंप्यूटर?
एस्ट्रोलैब प्राचीन काल का एक ऐसा हाथ में पकड़ा जाने वाला डिवाइस है जिसे खगोलीय गणनाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता था। यह सूरज और तारों की स्थिति, समय का निर्धारण, अक्षांश-देशांतर का पता लगाने और यहां तक कि दिशा बताने में भी सक्षम था। इसमें कई परतें और घूमने वाली प्लेट्स होती हैं। इसे उस दौर का 'मल्टी-फंक्शनल' डिवाइस माना जाता है, जो आज के डिजिटल टैबलेट की तरह काम करता था।
जयपुर राजघराने से लंदन की नीलामी तक का सफर
यह ऐतिहासिक धरोहर सन् 1612 के आसपास मुगल काल में लाहौर में बनाई गई थी। इसे लाहौर के तत्कालीन प्रशासक आगा अफजल के लिए बनाया गया था। इसके निर्माता लाहौर स्कूल के प्रसिद्ध कारीगर मोहम्मद मुक़ीम और काइम मोहम्मद थे।
बाद में यह जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय के संग्रह की शान बना। उनकी मृत्यु के बाद यह उनकी पत्नी राजमाता गायत्री देवी के पास रहा। दशकों तक निजी संग्रह में रहने के बाद अब यह पहली बार दुनिया के सामने आया है।
तकनीकी विशेषताएं जो करती हैं हैरान
खगोलीय गणनाओं की सटीक जानकारी देने वाली इस डिवाइस की कुछ विशेषताएं इसे मास्टरपीस बनाती हैं:
विशाल आकार: इसका वजन करीब 8 किलो और ऊंचाई 46 सेंटीमीटर है, जो इसे अब तक मिले सबसे बड़े एस्ट्रोलैब्स में से एक बनाता है।
ग्लोबल डेटाबेस: इस पर उस दौर के 94 प्रमुख शहरों के नाम और उनके सटीक अक्षांश-देशांतर अंकित हैं।
भाषाई संगम: इस पर तारों के नाम फारसी और देवनागरी (संस्कृत) दोनों लिपियों में लिखे गए हैं, जो भारत की साझी वैज्ञानिक विरासत को दर्शाता है।
सटीकता: इसकी प्लेट्स में डिग्री को एक-तिहाई हिस्से तक सूक्ष्म रूप से विभाजित किया गया है।
करोड़ों में लगेगी बोली
विशेषज्ञों के अनुसार, इसकी ऐतिहासिक और वैज्ञानिक अहमियत को देखते हुए इसकी नीलामी 1.5 मिलियन से 2.5 मिलियन पाउंड (लगभग 15 से 25 करोड़ रुपए) के बीच हो सकती है।
यह एस्ट्रोलैब इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि मध्यकालीन भारत में खगोलशास्त्र और धातु विज्ञान अपने चरम पर थे। यह केवल एक प्राचीन वस्तु नहीं, बल्कि भारत के गौरवशाली वैज्ञानिक इतिहास का एक चमकदार पन्ना है।
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