राजस्थान निकाय चुनाव: भाजपा की साख और कांग्रेस के संगठन सृजन की बड़ी अग्निपरीक्षा
राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव इस बार सिर्फ स्थानीय सरकार बनाने की लड़ाई नहीं है, भाजपा के लिए यह सरकार के ढाई साल के काम और संगठन की पकड़ का टेस्ट है, तो कांग्रेस के लिए लंबे समय से चल रहे संगठन सृजन अभियान की असली परीक्षा।
चुनावी मैदान में दोनों दलों की तैयारी के साथ बड़े नेताओं की सक्रियता भी चर्चा में है। भाजपा ने केंद्रीय संगठन तक को मैदान में उतार दिया है, जबकि कांग्रेस की कमान फिलहाल कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के हाथ में नजर आ रही।
राजस्थान की राजनीति में निकाय चुनाव को विधानसभा चुनाव से पहले का बड़ा संकेत माना जाता है। शहरी इलाकों में भाजपा का पारंपरिक आधार मजबूत रहा है, लेकिन सरकार के आधे कार्यकाल के बीच हो रहे इन चुनावों ने पार्टी के सामने अपनी पकड़ बनाए रखने की चुनौती खड़ी कर दी।
दूसरी तरफ कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ माहौल को वोट में बदलने का मौका है, लेकिन इसके लिए सिर्फ एंटी-इन्कंबेंसी काफी होगी या संगठन भी उतना ही मजबूत साबित होगा, यही बड़ा सवाल है।
भाजपा ने केंद्रीय संगठन को उतारा मैदान में
भाजपा की चुनावी तैयारी में केंद्रीय संगठन की सक्रियता सबसे बड़ा संकेत है। राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष का जयपुर आकर लगातार बैठकें करना बताता है कि पार्टी इन चुनावों को सामान्य स्थानीय चुनाव की तरह नहीं देख रही। भाजपा का फोकस सिर्फ प्रत्याशी तय करने तक सीमित नहीं।
पार्टी सांसदों, विधायकों और संगठन के पदाधिकारियों को सक्रिय करने के साथ बूथ स्तर तक चुनावी तैयारी मजबूत करने में जुटी है। पार्टी की कोशिश है कि सरकार के कामकाज को स्थानीय चुनाव के मुद्दों से जोड़ा जाए और हर निकाय में बोर्ड बनाने के लिए संगठन की पूरी ताकत लगाई जाए।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि निकाय चुनाव सरकार के करीब ढाई साल के कार्यकाल के बीच हो रहे। ऐसे में स्थानीय मुद्दों के साथ सरकार के कामकाज का असर भी मतदाताओं के फैसले में दिखाई दे सकता।
युवा नाराजगी ने बढ़ाई भाजपा की चिंता
भाजपा के लिए एक और चुनौती युवा वर्ग को लेकर है। सीजेपी के आंदोलन और राजस्थान में उससे जुड़े घटनाक्रमों के बीच युवाओं में सरकार को लेकर नाराजगी का जो माहौल बना है, पार्टी उसे नजर अंदाज नहीं करना चाहती।
वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा के मुताबिक, भाजपा का शहरी क्षेत्रों में मजबूत आधार रहा है, लेकिन केंद्रीय संगठन के शीर्ष नेता का जयपुर आकर पूरे दिन नेताओं के साथ बैठक करना बताता है कि पार्टी चुनाव को लेकर पूरी तरह सतर्क है।
उनका मानना है कि 20 से 30 साल के युवा वर्ग का रुख भाजपा के लिए अहम होगा। यही वजह है कि पार्टी इस वर्ग को अपने साथ बनाए रखने के लिए संगठन, सरकार और राजनीतिक रणनीति-तीनों स्तरों पर काम कर रही। सीजेपी से जुड़े विवादों और जयपुर-जोधपुर में हुई घटनाओं ने भी सरकार के सामने राजनीतिक चुनौती बढ़ाई है। हालांकि इन घटनाक्रमों का चुनावी असर कितना होगा, इसका फैसला मतदान के बाद ही होगा।
कांग्रेस के सामने संगठन को जमीन पर साबित करने की चुनौती
कांग्रेस के लिए निकाय चुनाव की सबसे बड़ी परीक्षा उसका संगठन सृजन अभियान है। पार्टी पिछले एक साल से ज्यादा समय से बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने का दावा करती रही है। अब निकाय चुनाव में यह देखना होगा कि यह संगठन कागजों से निकलकर जमीन पर कितना सक्रिय दिखाई देता है।
टिकट वितरण में भी इस दावे की परीक्षा हो रही। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो कांग्रेस ने कई जगह विधायकों और विधायक प्रत्याशियों को ही अहमियत दी है। ऐसे में सवाल है कि जिन जिला और बूथ स्तर के संगठन को मजबूत करने की बात कही गई थी, उसे चुनावी फैसलों में कितनी जगह मिली।
राजस्थान निकाय चुनाव कांग्रेस के लिए इसलिए भी अहम हैं क्योंकि स्थानीय स्तर पर मजबूत संगठन ही पार्टी को वार्ड से लेकर निकाय बोर्ड तक बढ़त दिला सकता। अगर संगठन सृजन अभियान का असर चुनाव में नहीं दिखता है तो पार्टी के दावे पर सवाल उठना तय है।
डोटासरा-जूली सक्रिय, बड़े चेहरों की दूरी चर्चा में
कांग्रेस की ओर से प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली चुनावी मोर्चे पर सबसे ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। दोनों नेता संगठन और प्रत्याशियों के बीच समन्वय बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
इसके मुकाबले पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट जैसे बड़े नेताओं की निकाय चुनाव में सीमित सक्रियता चर्चा का विषय है। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व भी राजस्थान के निकाय चुनाव को लेकर भाजपा की तुलना में उतना सक्रिय नजर नहीं आया है।
हालांकि चुनाव अभी शुरुआती दौर में है और आगे बड़े नेताओं की सक्रियता बढ़ सकती है, लेकिन फिलहाल भाजपा और कांग्रेस की चुनावी शैली में यह अंतर साफ दिखाई दे रहा है। भाजपा जहां संगठन के हर स्तर को सक्रिय करने पर जोर दे रही है, वहीं कांग्रेस का अभियान मुख्य रूप से प्रदेश नेतृत्व के आसपास केंद्रित नजर आ रहा।
भाजपा सरकार के काम बनाम कांग्रेस की एंटी-इन्कंबेंसी
निकाय चुनाव में भाजपा की रणनीति सरकार के ढाई साल के काम को जनता के सामने रखने की है। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि सरकार की उपलब्धियों को स्थानीय मुद्दों और वार्ड स्तर की समस्याओं से कैसे जोड़ा जाए।
कांग्रेस के पास इसके उलट सरकार की कमियों को मुद्दा बनाने का मौका है। सीजेपी आंदोलन से बने माहौल, स्थानीय समस्याओं और सरकार के खिलाफ नाराजगी को कांग्रेस अपने पक्ष में करने की कोशिश कर सकती, लेकिन यहां कांग्रेस के सामने एक बड़ा सवाल है-क्या केवल सरकार के खिलाफ नाराजगी उसे वोट दिला देगी? चुनावी राजनीति में नाराजगी को वोट में बदलने के लिए मजबूत उम्मीदवार, बूथ मैनेजमेंट और कार्यकर्ताओं की सक्रियता जरूरी होती है। यही वह मोर्चा है जहां कांग्रेस की असली परीक्षा होगी।
क्या कांग्रेस का संगठन सृजन जमीन पर दिखेगा?
कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना यही होगा कि पार्टी कितने वार्डों में अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर पाती है और कितने निकायों में मजबूत चुनावी मुकाबला खड़ा करती है।
महेश शर्मा के मुताबिक, कांग्रेस के सामने संगठन और सड़क पर संघर्ष करने की क्षमता की चुनौती बनी हुई है। उनका कहना है कि अगर कांग्रेस ने योजनाबद्ध तरीके से समन्वय बनाकर चुनाव अभियान चलाया तो वह बड़ी संख्या में निकायों में मजबूत स्थिति बना सकती है। दूसरी ओर भाजपा के लिए भी चुनाव आसान नहीं है। पार्टी को सरकार के कामकाज, स्थानीय मुद्दों और युवाओं की नाराजगी-तीनों मोर्चों पर संतुलन बनाना होगा। सिर्फ संगठन की ताकत के भरोसे चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं होगा।
राजस्थान के निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों के पास अपने-अपने फायदे और चुनौतियां हैं। भाजपा के पास सत्ता, संगठन और केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता है, लेकिन उसके सामने सरकार के ढाई साल के काम का रिपोर्ट कार्ड और युवा वर्ग की नाराजगी का सवाल है।
कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ माहौल को भुनाने का मौका है, लेकिन उसे यह साबित करना होगा कि संगठन सृजन अभियान ने वास्तव में बूथ और वार्ड स्तर पर पार्टी को मजबूत किया है। बड़े नेताओं की सक्रियता और कार्यकर्ताओं की जमीन पर मौजूदगी भी उसके लिए निर्णायक होगी।
इसलिए यह चुनाव सिर्फ किस पार्टी को कितनी सीटें मिलती हैं, इसका हिसाब नहीं होगा। भाजपा के लिए यह सत्ता के आधे कार्यकाल का रिपोर्ट कार्ड और संगठन की पकड़ की परीक्षा है, जबकि कांग्रेस के लिए यह उसके संगठन सृजन अभियान की पहली बड़ी जमीनी अग्निपरीक्षा है। आखिरकार जीत उसी की होगी जो नाराजगी को वोट और संगठन को बूथ तक पहुंच में बदल पाएगा।
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