भाजपा विधायक ने यूजीसी के नए नियमों पर उठाए सवाल, पीएम को भेजी चिट्ठी, पुनर्विचार का आग्रह

Mukesh Sharma | Jan 28, 2026, 20:29 IST
Photograph: (the soort)
राजस्थान के भाजपा विधायक प्रताप सिंह सिंघवी ने यूजीसी के नए सामाजिक नियमों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर नियमों पर पुनर्विचार की मांग की है।

News In Short

  • भाजपा विधायक ने कहा, यूजीसी के नए नियमों पर हो पुनर्विचार
  • यूजीसी पर सामाजिक व दंडात्मक नियम बनाने के अधिकार पर सवाल
  • प्रधानमंत्री को नए नियमों पर पुनर्विचार के लिए पत्र लिखा
  • नए नियमों में भेदभाव की परिभाषा में ही है भेदभाव
  • सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं होना गंभीर
  • राजस्थान में भाजपा के वरिष्ठ नेता छठी बार हैं विधायक

News In Detail

राजस्थान से भाजपा विधायक प्रताप सिंह सिंघवी ने यूजीसी की सामाजिक व दंडात्मक नियम बनाने के अधिकार पर सवाल उठाया है। बांरा की छबड़ा सीट से छठी बार के विधायक सिंघवी ने इस संबंध में प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। उन्होंने कहा कि यूजीसी के नए नियमों के कारण देशभर में छात्र व शिक्षाविद्ध,अभिभाव व जनप्रतिनिधियों में गहरी चिंता है। इसलिए इन नए नियमों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।



भेदभाव की परिभाषा में ही भेदभाव

सिंघवी ने लिखा है कि यूजीसी के नए नियमों में भेदभाव की परिभाषा को एकतरफा तय किया है। इसमें सामान्य वर्ग को ना तो पीड़ित के रुप में मान्यता दी है और ना ही उनके संरक्षण की कोई स्पष्ट व्यवस्था है। इससे समानता के संविधानिक सिद्वांत पर प्रश्नचिन्ह उत्पन्न होता है। नियमों में झूठी और दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर किसी भी प्रकार के दंड का प्रावधान नहीं होना गंभीर चिंता का विषय है।





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सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं होना गंभीर

भाजपा विधायक सिंघवी के अनुसार 24 घंटे के भीतर कार्रवाई का नियम और बिना प्राथमिक जांच के एक्शन का प्रावधान इन नियमों के दुरुपयोग की आशंका को ज्यादा बढ़ाता है। इस कारण शिक्षण संस्थाओं में भय और अस्थिरता का वातावरण बन सकता है। समानता कमेटी में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व का अभाव निर्णय प्रक्रिया को एकतरफा बना सकता है। इससे निष्पक्षता व पारदर्शिता प्रभावित होने की प्रबल संभावना है।



उच्च शिक्षा की गुणवत्ता होगी प्रभावित

प्रताप सिंह सिंघवी ने कहा कि नियमों में शिकायतों के आधार पर कॉलेज की मान्यता रद्ध करने तथा अनुदान बंद करने जैसे कठोर प्रावधान हैं। इसके भय के कारण संस्थान मेरिट व योग्यता के आधार पर स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय लेने में हिचकेंगे। अंतत: इस कारण उच्च शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी।



यूजीसी का काम नहीं है यह

सिंघवी ने लिखा है कि यूजीसी कानून-1956 के तहत यूजीसी को सामाजिक व दंडात्मक नियम नहीं बना सकती। बल्कि, यूजीसी का मूल काम एकेडमिक मानक तय करना है।



सभी पक्षों से राय ली जाए

सिंघवी ने ​लिखा है कि यूजीसी के नए नियमों के कारण देशभर में छात्र व शिक्षाविद्ध,अभिभाव व जनप्रतिनिधियों में गहरी चिंता है। नियमों को पढ़ने से लगता है कि इनमें अनेक व्यावहारिक,संविधानिक और न्यायसंगत प्रश्न उत्पन्न हो रहे हैं। इसलिए इन पर पुनर्विचार हो और सभी पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श किया जाए ताकि संतुलित,निष्पक्ष तथा विश्वास का वातावरण बनाने वाले नियम बनाए जा सकें।



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