राजस्थान निकाय चुनाव 2026: सीएम भजनलाल का ताबड़तोड़ प्रचार, वसुंधरा राजे दूर
समझें क्या है पूरा मामला
- निकाय चुनाव में सीएम भजनलाल बने BJP का मुख्य चेहरा।
- सीएम भजनलाल शर्मा ने ताबड़तोड़ 5 दिनों में नापे 10 शहर।
- निकाय चुनाव प्रचार से अभी तक दूर हैं पूर्व सीएम वसुंधरा राजे
- अपने-अपने गढ़ में प्रचार करने में जुटे है कांग्रेस के दिग्गज नेता।
- डोटासरा ने सीकर में, तो जूली ने अलवर में संभाला मोर्चा।
राजस्थान का निकाय चुनाव भले ही वार्ड और शहरों का है, लेकिन प्रचार ने बड़े नेताओं का सियासी वजन भी सामने ला दिया है। BJP में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सबसे ज्यादा डिमांड दिख रही है।
पांच दिन में उनके लिए 10 शहरों का रोड शो प्लान बनाया गया। प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ को जिलों में उतारा गया और सतीश पूनिया को बूथ मैनेजमेंट में लगाया गया। लेकिन इस पूरी चुनावी दौड़ में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अब तक मैदान से दूर हैं।
कांग्रेस ने इससे अलग रास्ता पकड़ा है। प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा सीकर-लक्ष्मणगढ़, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली अलवर में ज्यादा सक्रिय हैं। अशोक गहलोत सरकार पर हमलों के जरिए चुनावी नैरेटिव बना रहे हैं, जबकि सचिन पायलट की राज्यभर में बड़ी प्रचार श्रृंखला सामने नहीं आई है।
यानी तस्वीर साफ है- BJP ने चुनाव को CM के चेहरे पर चढ़ाया है, कांग्रेस ने अपने दिग्गजों को उनके मजबूत इलाकों में टिकाया है।
भजनलाल की सबसे ज्यादा डिमांड, 5 दिन-10 शहर
BJP के चुनाव प्रचार का सबसे बड़ा चेहरा मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा हैं। उनके रोड शो की शुरुआत भीलवाड़ा और उदयपुर से हुई। इसके बाद अजमेर, बीकानेर, जोधपुर, भरतपुर और अलवर पहुंचे। पाली-कोटा के बाद जयपुर भी कार्यक्रम में रखा गया।
7 सितंबर को अलवर में बड़ा रोड शो हुआ। 8 सितंबर को पाली और कोटा में कार्यक्रम रखा गया। पार्टी ने एक दिन में दो से तीन शहर तक कवर करने वाला शेड्यूल बनाया।
चुनाव पार्षद का है, लेकिन BJP वोट CM के चेहरे पर भी मांग रही है। यही वजह है कि पार्टी ने भजनलाल को मेवाड़ से मारवाड़, हाड़ौती से पूर्वी राजस्थान तक उतारा।
सबसे बड़ा सवाल-वसुंधरा कहां?
BJP के तमाम बड़े चेहरे किसी न किसी भूमिका में चुनाव से जुड़े हैं, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे प्रचार मैदान में नहीं उतरी हैं। 8 सितंबर तक उनके किसी रोड शो या चुनावी सभा की पुष्टि सामने नहीं आई।
\यह गैरमौजूदगी इसलिए ज्यादा चर्चा खींचती है क्योंकि राजे दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रही हैं और प्रदेश BJP के सबसे बड़े जनाधार वाले चेहरों में शामिल हैं। उनके प्रभाव वाला झालरापाटन भी निकाय चुनाव में है।
फिलहाल इतना ही साफ है- भजनलाल लगातार शहरों में हैं, वसुंधरा चुनावी मंचों से दूर हैं। इसके पीछे पार्टी की रणनीति है या कोई और वजह, BJP की आधिकारिक प्रतिक्रिया के बिना इस पर निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा।
राठौड़ जिलों में, पूनिया बूथ पर
मुख्यमंत्री के बाद BJP ने प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ को जिलों में दौड़ाया। अजमेर, नागौर, फलोदी, जैसलमेर और बाड़मेर के बाद उनका कार्यक्रम पाली, सुमेरपुर, सिरोही और पिंडवाड़ा तक पहुंचा।
वहीं सतीश पूनिया की भूमिका अलग रखी गई। बड़े रोड शो के बजाय उन्हें बूथ मैनेजमेंट और कार्यकर्ताओं के साथ माइक्रो प्लानिंग में लगाया गया। जयपुर और शेखावाटी में बूथ कार्यकर्ताओं के साथ उनकी बैठकें रखी गईं।
क्षेत्रीय समीकरण भी साधे गए। गजेंद्र सिंह शेखावत को जोधपुर और ओम बिरला को कोटा में सक्रिय किया गया। मतलब BJP ने चेहरों की तैनाती भी उनके राजनीतिक प्रभाव के हिसाब से की।
डोटासरा का जोर सीकर-लक्ष्मणगढ़ पर
कांग्रेस में BJP जैसा एक चेहरा पूरे राजस्थान में दौड़ता नहीं दिख रहा। प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का जमीनी फोकस सीकर और लक्ष्मणगढ़ पर ज्यादा रहा।
हालांकि सरकार को घेरने और कांग्रेस का चुनावी एजेंडा सेट करने में डोटासरा आगे हैं। पार्टी का निकाय चुनाव घोषणा-पत्र भी उनकी मौजूदगी में आया। सफाई, सीवरेज, कचरा उठाव और शहरी विकास जैसे मुद्दों को कांग्रेस ने चुनावी हथियार बनाया। यानी डोटासरा प्रदेश में पार्टी की आवाज हैं, लेकिन मैदान में सबसे ज्यादा जोर अपने सियासी इलाके पर है।
अलवर में जूली Vs BJP के बड़े चेहरे
नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने अलवर में मोर्चा संभाला। पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह भी उनके साथ सक्रिय रहे।
BJP ने भी अलवर को हल्के में नहीं लिया। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का रोड शो कराया गया। मंत्री संजय शर्मा, प्रदेश प्रभारी राधामोहन दास अग्रवाल और अशोक परनामी जैसे चेहरे भी मैदान में दिखे।
इससे अलवर की लड़ाई दिलचस्प हो गई- कांग्रेस ने जूली-जितेंद्र के स्थानीय प्रभाव पर दांव लगाया तो BJP ने उसके मुकाबले बड़े चेहरों की फौज उतारी।
गहलोत ने रोड शो पर ही खड़े किए सवाल
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की भूमिका अलग दिखाई दी। वे लगातार शहर बदलने के बजाय सरकार के कामकाज और मुख्यमंत्री के रोड शो पर सवाल उठाते रहे।
सड़क, ट्रैफिक, जलभराव, सफाई और पट्टों जैसे मुद्दों पर उन्होंने सरकार को घेरा। यानी गहलोत ने प्रचार की भीड़ से ज्यादा सरकार के खिलाफ मुद्दे खड़े करने की रणनीति अपनाई। उनके गृह क्षेत्र जोधपुर में 9 सितंबर के लिए रोड शो का कार्यक्रम भी सामने आया है।
पायलट की बड़ी प्रचार श्रृंखला नहीं
सचिन पायलट कांग्रेस के सबसे चर्चित चेहरों में हैं, लेकिन इस निकाय चुनाव में उनकी लगातार शहर-दर-शहर प्रचार श्रृंखला नहीं दिखी। 7 सितंबर तक राजस्थान में उनके अगले बड़े प्रचार कार्यक्रम का विस्तृत शेड्यूल सामने नहीं आया था।
इसलिए कांग्रेस में फिलहाल डोटासरा और जूली की जमीनी सक्रियता ज्यादा साफ दिखाई देती है, जबकि गहलोत और पायलट की भूमिका अलग तरह की रही है।
प्रचार का गणित: BJP का एक चेहरा, कांग्रेस के कई गढ़
निकाय चुनाव के प्रचार ने दोनों पार्टियों का फर्क खोल दिया है। BJP का फॉर्मूला- भजनलाल आगे, संगठन पीछे। CM को शहर-शहर भेजा गया। राठौड़ को जिलों में, पूनिया को बूथ पर और दूसरे बड़े नेताओं को उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों में लगाया गया। इस पूरी तस्वीर में वसुंधरा राजे की गैरमौजूदगी सबसे अलग दिखती है।
कांग्रेस का फॉर्मूला- जिसका गढ़, उसी पर ज्यादा जोर। डोटासरा सीकर-लक्ष्मणगढ़ में, जूली अलवर में मजबूत मोर्चा संभालते दिखे। गहलोत ने मुद्दों से सरकार को घेरा और पायलट की व्यापक प्रचार श्रृंखला नहीं दिखी।
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