राजस्थान में पशुधन मिशन में गड़बड़ी की जांच शुरू; रिकॉर्ड में 500 बकरियां, जमीन पर खाली फार्म
राजस्थान में पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए चलाई जा रही राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM) योजना की सब्सिडी में कथित फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है। योजना के तहत बकरी पालन के नाम पर करोड़ों रुपए की सरकारी सहायता दी गई, लेकिन कई जगह रिकॉर्ड में दिखाई गई व्यवस्थाएं मौके पर मौजूद ही नहीं मिलीं।
दस्तावेजों में कहीं 500 बकरियां, 25 बकरे, टीन शेड, पानी और बिजली की व्यवस्था बताकर फार्म को तैयार दिखाया गया। लेकिन मौके पर पहुंचने पर कई फार्म खाली मिले। कुछ जगहों पर पशुपालन की जगह सीमेंट की ईंटें बनाने की फैक्ट्री चलती मिली, तो कहीं लोहे की चद्दर बनाने का काम होता मिला।
149 लाभार्थियों को मिली करोड़ों की सब्सिडी
राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत राजस्थान में बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिए लाभार्थियों को सरकारी सब्सिडी दी गई। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक प्रदेश में 149 लाभार्थियों को करीब 25 करोड़ रुपए की सब्सिडी का लाभ मिला।
योजना का उद्देश्य बकरी पालन के लिए फार्म विकसित करना, पशुओं की संख्या बढ़ाना और ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा करना है। इसके लिए फार्म में बकरियों के साथ शेड, पानी, बिजली और दूसरी जरूरी सुविधाएं होना जरूरी है। लेकिन जांच में कई मामलों में इन दावों पर सवाल खड़े हुए हैं।
पहली किस्त के बाद 91 फार्म बंद
पड़ताल में सामने आया कि 149 लाभार्थियों में से 91 ने पहली किस्त मिलने के बाद फार्म बंद कर दिए। खास बात यह है कि इन मामलों में करीब 10 करोड़ रुपए की सब्सिडी जारी होने की बात सामने आई है।
सवाल यह है कि यदि फार्म पहली किस्त के बाद ही बंद हो गए थे, तो उनका नियमित निरीक्षण क्यों नहीं हुआ? अधिकारियों की ओर से मौके पर जाकर व्यवस्थाओं की जांच की गई या नहीं, इसे लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
रिकॉर्ड में 500 बकरियां, मौके पर कुछ नहीं
कई मामलों में सरकारी रिकॉर्ड में फार्म पर बड़ी संख्या में बकरियां होने का उल्लेख किया गया। कहीं 500 बकरियां और 25 बकरे बताए गए। साथ ही टीन शेड, पानी और बिजली जैसी सुविधाएं भी दर्ज थीं।
लेकिन मौके पर पहुंचने पर स्थिति बिल्कुल अलग दिखाई दी। कई जगह पशु नजर नहीं आए और फार्म खाली मिले। कुछ स्थानों पर उस जमीन का इस्तेमाल पशुपालन के बजाय दूसरे व्यावसायिक कामों के लिए किया जा रहा था। एक जगह सीमेंट की ईंट बनाने का काम चल रहा था, जबकि दूसरी जगह लोहे की चद्दर बनाने का काम किया जा रहा था।
दूसरी जगह से बकरियां लाकर कराई फोटो
पड़ताल में एक और गंभीर तरीका सामने आया। आरोप है कि कुछ लाभार्थियों ने दूसरी जगह से बकरियां लाकर फार्म पर खड़ा किया, फिर उनकी फोटो और जियो टैगिंग करवाई।
इन दस्तावेजों के आधार पर सब्सिडी की अगली किस्त जारी करवा ली गई। बताया गया कि पूरी सब्सिडी मिलने के बाद मौके से बकरियां हटा ली गईं और फार्म दोबारा खाली हो गए। अगर ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह सरकारी योजना की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अधिकारियों की जांच पर भी सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल सरकारी निरीक्षण को लेकर है। योजना के तहत लाभार्थियों को किस्त जारी करने से पहले फार्म की वास्तविक स्थिति, पशुओं की संख्या और जरूरी सुविधाओं की जांच बेहद महत्वपूर्ण है।
लेकिन 91 लाभार्थियों के पहली किस्त के बाद फार्म बंद करने के बावजूद करीब 10 करोड़ रुपए की सब्सिडी दिए जाने की जानकारी सामने आने से निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित मामलों की विस्तृत जांच की जाए और यह पता लगाया जाए कि किन लाभार्थियों ने नियमों का पालन किया और किन मामलों में सरकारी धन का गलत इस्तेमाल हुआ।