क्यों राजस्थान बन रहा घटिया दवाओं का सेफ जोन, जानिए पूरा मामला
राजस्थान नकली और सब-स्टैंडर्ड दवाओं की सुरक्षित मंडी बनता जा रहा है। एक ओर सरकार जनता को स्वास्थ्य का अधिकार (राइट टू हेल्थ एक्ट) कानून देकर अपनी पीठ थपथपा रही है। वहीं नकली दवा माफिया ने पूरे प्रदेश में अपना जाल फैला लिया है।
चिकित्सा विभाग की सुस्ती के कारण प्रसूताएं इस खतरनाक कारोबार की सबसे बड़ी शिकार हो रही हैं। कोटा और बीकानेर के बाद अब जोधपुर के जिला पावटा अस्पताल में प्रसूताओं की तबीयत बिगड़ गई।
कोटा में पांच प्रसूताओं की मौत के बाद हुई जांच में यह साबित हो चुका है कि प्रसूताओं को लगाया गया ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन नकली था। यह इंजेक्शन प्रसव (डिलीवरी) के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव को रोकने और महिलाओं की जान बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
जयपुर में ही पकड़ा स्टॉक, सोता रहा विभाग
ड्रग कंट्रोल डिपार्टमेंट की सुस्त मॉनिटरिंग और इंटेलिजेंस फेलियर के कारण राजस्थान दवा माफिया के लिए सेफ जोन बन गया है।
इसकी बानगी दिसंबर 2025 में देखने को मिली। जब जयपुर में ही बिना किसी वैध लाइसेंस के 3.73 करोड़ रुपए की नकली दवाओं का साम्राज्य पकड़ा गया था।
सवाल यह उठ रहा है कि राजधानी के मुख्य बाजारों में बिना लाइसेंस के इतना बड़ा जानलेवा स्टॉक बिकता रहा और ड्रग विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी।
नामी ब्रांड्स के नाम पर चॉक पाउडर
औषधि नियंत्रण आयुक्तालय की पिछले 7 महीनों की जांच रिपोर्ट से साफ है कि राजस्थान के बाजारों में ब्रांडेड दवाओं के नाम पर सिर्फ भ्रम बेचा जा रहा है।
हालिया जांच में 133 नामी ब्रांडेड दवाएं और कॉस्मेटिक्स पूरी तरह फेल (Not of Standard Quality) पाए गए हैं।
प्रसूताओं को दिए जाने वाले ऑक्सीटोसिन इंजेक्शनों में मूल सॉल्ट (सक्रिय तत्व) की मात्रा 0% (शून्य) पाई गई। इसका अर्थ है कि इंजेक्शन में सिर्फ पानी था। गंभीर संक्रमण के इलाज में काम आने वाली एंटीबायोटिक और एलर्जी की दवाओं में भी मूल सॉल्ट गायब मिले।
आंकड़ों से ही साबित है
सरकारी लैब के तीन साल के आंकड़ों से ही साबित है कि प्रदेश घटिया दवाओं का सेफ जोन बन रहा है। अकेले अक्टूबर 2025 से 15 मई 2026 के बीच ही 150 दवाएं अमानक मिली हैं।
पिछले तीन साल में कुल 217 दवा घटिया मिली हैं। इसी अवधि में ऑक्सीटोसिन से लेकर बच्चों के लिए खांसी का सिरप और मल्टीविटामिन की गोलियां नकली मिली हैं।
मुफ्त दवा योजना में सस्ते के चक्कर में घटिया सप्लाई
प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में घटिया दवाओं के पहुंचने का एक बड़ा कारण मुख्यमंत्री निःशुल्क दवा योजना भी है।
डॉ.विवेक शर्मा का कहना है कि सरकारी टेंडर में सबसे सस्ती बोली (L1) लगाने वाली कंपनियों को ही दवा सप्लाई के आर्डर देने का नियम है। दवा निर्माता कंपनियां में गलाकाट प्रतिस्पर्धा होती है। इसलिए कंपनियां बेहद कम दाम ऑफर करती हैं।
उनका कहना है कि इस कारण से सरकारी सप्लाई में घटिया या सब-स्टैंडर्ड दवा आ रही हैं। दवाईयों के मामले में सरकार को गुणवत्ता को प्राथमिकता देनी चाहिए। सबसे बड़ी बात मेडिकल प्रोफेशन एक्सपर्ट फील्ड है। सिर्फ डॉक्टर की बीमारियों का इलाज कर सकते हैं।
डॉ. शर्मा के अनुसार डॉक्टर को ही पता है कि किस बीमारी के इलाज के लिए कौनसी दवा देना है ऐसे में सरकारी हो या निजी, दवा खरीद का काम एक्पसर्ट को ही करना चाहिए। उन्हें ही तय करने देना चाहिए कि किस कंपनी की कौनसी दवा खरीदी जाए। बाकी घटिया दवाओं को रोकने के लिए ड्रग डिपार्टमेंट को और ज्यादा तेजी से कार्रवाई करनी चाहिए।
महीनों बाद आती है रिपोर्ट
दवा सेक्टर में काम कर रहे लोगों का कहना है कि हिमाचल (बद्दी),उत्तराखंड (देहरादून), गुजरात और महाराष्ट्र से सक्रिय दवा माफिया नियमों के लूपहोल का पूरा फायदा उठा रहा है। कंपनियां खुद की गुणवत्ता रिपोर्ट जारी कर दवा सीधे प्रदेश के बाजारों में उतार देती हैं। ड्रग विभाग इसके बाद रैंडम सैंपलिंग करता है।
सरकारी लैब से सैंपल फेल होने की रिपोर्ट आने में कई महीने लग जाते हैं। रिपोर्ट के आने के बाद ड्रग डिपार्टमेंट अलर्ट जारी कर स्टॉक हटाने का आदेश देता है। ऐसे में तब तक उस बैच की हजारों दवाइयां मरीज खा चुके होते हैं। ड्रग डिपार्टमेंट यही सुस्ती मरीजों व प्रसूताओं की जान की आफत बनी हुई है।
मंत्री का व्यवहार कोढ़ में खाज वाला
चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर का इस मामले में व्यवहार कोढ़ में खाज जैसा रहा है। वे अपने विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाते रहे हैं।
हाल ही में बीकानेर में प्रसूताओं की मौत हुईं हैं। इस मामले पर स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर से सवाल पूछा गया तो वह जिम्मेदारी लेने की बजाय नाराज हो गए। उन्होंने वहां प्रसूताओं को लेकर मर्यादित टिप्पणी कर दी।
तत्काल हटवा रहे बाजार से दवाएं
राजस्थान के ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक कहते हैं कि ऐसी स्थितियां नहीं हैं कि प्रदेश घटिया या नकली दवाओं का हब बनता जा रहा हो। हम निरंतर कार्रवाई कर रहे हैं। जांच के बाद जो भी दवा सबस्टैंडर्ड मिलती हैं, उन्हें फौरन बाजार से हटवा रहे हैं।
ड्रग कंट्रोलर के अनुसार यह धारण गलत है कि जांच रिपोर्ट आने तक दवा का काफी स्टॉक खप जाता है। सैंपल लेने से लेकर लैब में जांच के लिए भेजने तक की एक तय कानूनी प्रक्रिया है। अब तो जांच रिपोर्ट समय सीमा में ही मिल रही हैं।
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