35 लाख का प्लांट 6.24 करोड़ में, जानिए स्वच्छ भारत मिशन घोटाले की पूरी कहानी

Mukesh Sharma | Jun 25, 2026, 18:24 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान में स्वच्छ भारत मिशन के तहत एफएसटीपी प्लांट लगाने में बड़ा घोटाला सामने आया है। अधिकारियों ने चहेती कंपनी को ठेका देने के लिए टेंडर के नियम ही बदल दिए। इतना ही नहीं, कंपनी को कई गुना अधिक रेट पर ठेका दे दिया गया।

ऐसे समझें पूरा मामला

  • स्वच्छ भारत मिशन में बिना जरूरत के बना दिए 130 प्लांट, सरकार को करोड़ों की चपत!
  • 35 लाख में लगना था प्लांट, अफसरों ने कई गुना अधिक रेट पर 6.24 करोड़ में दिया ठेका।
  • विधानसभा में सीएम ने हाई लेवल जांच के दिए थे आदेश, इसके बाद भी दे दिए नए ठेके।
  • लागत बढ़ाने के लिए अधिकारियों ने कम लागत वाले विकल्पों को दरकिनार कर दिया।

राजस्थान में स्वच्छ भारत मिशन के तहत मल-कीचड़ उपचार संयत्र (FSTP) लगाने में 1300 करोड़ रुपए के घोटाले के आरोप लगे हैं।



आरोप है कि अधिकारियों ने अपनी चहेती फर्म एमवीआर टेक्नोलॉजी को फायदा देने केंद्र की गाइड लाइन को दरकिनार कर दिया। उसे जरुरत से ज्यादा रेट पर वर्क आर्डर दिए गए।



गंभीर तथ्य यह है कि मुख्यमंत्री की विधानसभा में जांच की घोषणा की भी अधिकारियों की परवाह नहीं की है। मामला स्वायत्त शासन निदेशालय (DLB) से जुड़ा है।



17 गुणा ज्यादा रेट पर दिया काम

केंद्र सरकार की गाइड लाइन के अनुसार 10 से 30 केएलडी के प्लांट लगाने में 35 से 71 लाख रुपए खर्चा होना चाहिए। लेकिन अधिकारियो ने इसमें खेल कर दिया।



आंध्र की फर्म एमवीआर टेक्नोलॉजी को 27 अप्रैल, 2026 को प्रति प्लांट 6.24 करोड़ की दर से 624.78 करोड़ का वर्क आर्डर दिया गया। इसमें 100 प्लांट स्थापित होने थे।



इसके पहले 1 सितंबर, 2025 को गाइड लाइन के विपरीत 13 गुणा ज्यादा रेट पर प्रति प्लांट 5.79 करोड़ की रेट से 65 प्लांट के लिए 376.68 करोड़ का काम दिया।



बिना जरुरत के नियम विरुद्ध प्लांट

राजस्थान सरकार के FSSM दिशानिर्देश 2018 (फेकल स्लज एंड सेप्टेज मैनेजमेंट गाइडलाइंस) और केंद्र सरकार के मैनुअल को नजरअंदाज कर दिया गया।



प्रावधानों के अनुसार 20 किलोमीटर की परिधि में पहले से ही कार्यरत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) या FSTP होने पर नया स्वतंत्र FSTP प्लांट नहीं लग सकता। इन स्थानों पर क्लस्टरिंग और सह-उपचार (co-treatment) मॉडल को अपनाना चाहिए।



इसके बावजूद वर्ष 2026 के 100 नोडल गांव में करीब 80 ऐसी जगह हैं, जहां 2 से 20 किमी की परिधि में पहले से प्लांट काम कर रहे हैं।



2025 के एग्रीमेंट में करीब 51 मामलों में यह गड़बड़ी की है। करीब 130 प्लांट बिना जरुरत के बना दिए। इससे सरकार को करीब 850 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।



दोषपूर्ण तकनीक का चयन

शिकायत में बताया है कि यह घोटाला केवल बढ़ी हुई कीमतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अधिकारियों ने छोटे गांवों के लिए जानबूझकर अत्यधिक जटिल, उच्च-लागत और मशीनी प्रणालियों को मंजूरी दी है।



केंद्र सरकार की एडवाइजरी ऐसी तकनीक के लिए मना करती है। क्योंकि, ग्रामीण क्षेत्रों में सेप्टिक टैंकों की सफाई (desludging) औसतन तीन साल में एक बार होती है। ऐसे में दैनिक प्रवाह का मिलना असंभव है और बैक्टीरिया निष्क्रिय हो जाएंगे।



जानबूझकर किया खेल

विभागीय अधिकारियों को यह अच्छी तरह पता है कि 6.24 करोड़ के संयंत्र निष्क्रिय ढांचे (Dead Assets) बन जाएंगे। लेकिन लागत बढ़ाने के लिए कम लागत वाले विकल्पों को जानबूझकर दरकिनार कर दिया। इसमें स्लज ड्राइंग बेड्स के लिए 6 KLD हेतु मात्र 26.28 लाख रुपए लागत आती है।



इसके अलावा 15,000 से कम आबादी वाले इन गांवों को केवल 3 से 6 KLD के संयंत्रों की आवश्यकता थी। इसके बावजूद उन्हें ओवर-साइज किया कर दिया।



अफसरों को तो पता था

28 अक्टूबर 2025 को विभागीय समीक्षा बैठक में निदेशक और मुख्य अभियंता स्तर के अधिकारियों ने स्वयं लिखित में स्वीकार किया था कि चालू FSTP संयंत्रों पर पर्याप्त Faecal Sludge उपलब्ध नहीं हो रहा है।



रोचक बात यह है कि अपनी ही लिखित स्वीकारोक्ति को अधिकारियों ने अनसुना कर दिया। इसके कुछ महीनों बाद 100 और स्वतंत्र FSTP प्लांट के टेंडर जारी कर दिए।



सीएम ने की थी विधानसभा में जांच की घोषणा

राजस्थान विधानसभा में 7 मार्च 2025 को एकल फर्म को लाभ पहुंचाने के लिए टेंडर की लागत को अत्यधिक बढ़ाने पर चर्चा हुए थी। इस पर तत्कालीन विभागीय मंत्री ने गहन जांच कराने की आधिकारिक घोषणा की थी।



मुख्यमंत्री ने खुद विधानसभा में 12 मार्च 2025 को इन परियोजनाओं की जांच के लिए एक हाई लेवल कमेटी गठित करने की विशेष घोषणा की थी। इसके बावजूद अफसरों ने उसी विवादित फर्म को ठेका दे दिया।



प्रतिस्पर्धा खत्म करने के लिए बदली टेंडर की शर्तें

अफसरों ने चहेती फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर में दूसरी कंपनियों को नहीं आने देने के लिए टेंडर शर्तों में बदलाव कर दिए।



2022 में टेंडर देने वाली कंपनी का वार्षिक टर्नओवर 30 करोड़ होना जरुरी था। इसे 2026 में बढ़ाकर 115 करोड़ वार्षिक कर दिया।



टेंडर देने वाली कंपनी के लिए सामान्य सीवरेज और सैनिटरी कार्यों के व्यापक अनुभव को बदलकर उसे केवल FSTP-विशिष्ट तकनीक तक सीमित कर दिया गया। 2025 व 2026 में संयुक्त उद्यम वाली कंपनियों को टेंडर से बाहर कर दिया।



इस बदलाव से मिलकर काम लेने वाली छोटी फर्म बाहर हो गईं। टर्नओवर की शर्त के कारण केवल एक फर्म एमवीआर टेक्नोलॉजी ही टेंडर देने लायक बची।



गड़बड़ी की जांच करने वाले अधिकारी ने ही जारी किए वर्क आर्डर

इस मामले में अजीब बात यह है कि स्वायत्त शासन विभाग के निदेशक प्रतीक चंद्रशेखर जुइकर को 2022 में हुई गड़बड़ियों की जांच के लिए बनी विभगीय कमेटी के अध्यक्ष थे।



उन्होंने ही 2026 के वर्क आर्डर जारी किए हैं। इसके अलावा चीफ इंजिनियर अरुण व्यास और प्रदीप कुमार गर्ग ने चहेती फर्म को गैर-कानूनी रुप से फायदा देने के लिए सभी तकनीकी गाईडलाइंस को दरकिनार कर दिया।



स्वायत्त शासन निदेशालय के चीफ इंजीनियर अरुण व्यास कहते हैं कि एक ही काम अलग-अलग गुणवत्ता का होता है। हमने सभी काम नियम-कायदों व गाइड लाइन की पालना करके किए हैं। प्रदेश में उच्च गुणवत्ता के प्लांट लगाए जा रहे हैं। जानबूझकर किसी फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर शर्तों बदलाव करने और आवश्यकता से ज्यादा कीमत देने के आरोप गलत हैं।



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