मरी गायों के टैग पर भी अनुदान, ₹57 करोड़ की वसूली के आदेश, जयपुर की 2 गौशालाओं से कितना पैसा लौटा?
राजस्थान में गोवंश संरक्षण के लिए दिए जाने वाले सरकारी अनुदान में सामने आई करोड़ों रुपए की अनियमितताओं का मामला अब वसूली और जिम्मेदारी तय करने पर आ गया है। महालेखाकार की ऑडिट में मृत गोवंश, अपंजीकृत टैग और वास्तविक संख्या से अधिक पशु दिखाकर अनुदान लेने जैसी गड़बड़ियां सामने आई थीं।
इसके बाद गोपालन निदेशालय ने 29 मई 2026 को प्रदेश की 38 गौशालाओं से 57 करोड़ 36 लाख रुपए की अतिरिक्त अनुदान राशि वापस लेने के लिए नोटिस जारी किए थे। अब अक्टूबर में सामने आई जानकारी के मुताबिक, इन नोटिसों के आधार पर वसूली नहीं हुई है।
जयपुर की दो गौशालाओं से 3.62 करोड़ की वसूली
जयपुर की श्री पिंजरापोल गौशाला, सांगानेर और गो पुनर्वास केंद्र, हिंगोनिया भी ऑडिट में सामने आई अनियमितताओं के दायरे में हैं। पशुपालन विभाग की ओर से अगस्त में जारी निर्देशों के अनुसार, पिंजरापोल गौशाला से 2 करोड़ 21 लाख 55 हजार 820 रुपए और हिंगोनिया स्थित गो पुनर्वास केंद्र से 1 करोड़ 41 लाख 20 हजार 100 रुपए की वसूली की जानी है।
दोनों को मिलाकर यह राशि 3 करोड़ 62 लाख 75 हजार 920 रुपए है। विभाग ने 18 अगस्त को जयपुर के संयुक्त निदेशक को इस संबंध में कार्रवाई के निर्देश दिए थे।
1307 मृत गोवंश के टैग भी अनुदान रिकॉर्ड में
सांगानेर की पिंजरापोल गौशाला में वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच अनुदान से जुड़े रिकॉर्ड में गंभीर अंतर सामने आए। ऑडिट संबंधी रिपोर्ट के अनुसार, 1307 ऐसे गोवंश के टैग अनुदान रिकॉर्ड में शामिल मिले, जिनकी मृत्यु हो चुकी थी। इसके अलावा 4858 टैग भारत पशुधन ऐप पर पंजीकृत नहीं थे।
रिकॉर्ड में 93 गोवंश के टैग दोहराए जाने की बात भी सामने आई। इनमें 54 बड़े और 39 छोटे गोवंश के टैग शामिल थे। इन गड़बड़ियों से सरकारी सहायता राशि के सत्यापन पर सवाल उठे हैं। क्योंकि अनुदान जारी करने से पहले गौशाला में मौजूद पशुओं की संख्या और उनके रिकॉर्ड की जांच जरूरी होती है।
हिंगोनिया को 31.38 करोड़ मिलने थे, भुगतान 32.79 करोड़ का
हिंगोनिया गो पुनर्वास केंद्र में वर्ष 2022-23 और 2023-24 के दौरान अनुदान भुगतान में अंतर पाया गया। ऑडिट संबंधी जानकारी के अनुसार, इस अवधि में करीब 31.38 करोड़ रुपए का अनुदान बनता था, लेकिन भुगतान करीब 32.79 करोड़ रुपए का हुआ।
इस तरह 1 करोड़ 41 लाख 20 हजार 100 रुपए के अतिरिक्त भुगतान का मामला सामने आया। जांच में आवेदन के समय बताई गई गोवंश की संख्या और गौशाला के वास्तविक रिकॉर्ड में अंतर पाया गया। इससे जिला स्तर पर गोवंश का सत्यापन करने वाली व्यवस्था की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई।
तीन महीने में राशि जमा कराने के निर्देश
जयपुर की दोनों गौशालाओं के मामले में अगस्त में जारी निर्देशों के अनुसार, वसूली राशि तीन महीने के भीतर राजकोष में जमा कराने की व्यवस्था बताई गई थी। एक साथ रकम जमा नहीं कराने की स्थिति में दो या तीन किस्तों का विकल्प भी दिया गया था। इसके लिए गौशाला प्रबंधन से सात दिन में सहमति पत्र देने को कहा गया था।
मामला हाईकोर्ट भी पहुंचा, सरकार और प्रबंधन से जवाब तलब
पिंजरापोल गौशाला से जुड़ा मामला राजस्थान हाईकोर्ट भी पहुंच चुका है। मुनीश शर्मा की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने 4 अगस्त को राज्य सरकार, गौशाला प्रबंधन और संबंधित विभागों से जवाब मांगा था।
याचिका में सरकारी अनुदान के भुगतान के साथ गोवंश की देखभाल और पर्यावरण संबंधी अनियमितताओं के आरोप भी लगाए गए थे। अदालत ने आरोपों पर संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था।
अनुदान मंजूर करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी का सवाल
गौशालाओं को सहायता राशि वास्तविक गोवंश संख्या के आधार पर दी जाती है। इसलिए ऑडिट में मिले अंतर केवल गौशाला प्रबंधन तक सीमित सवाल नहीं हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि भुगतान से पहले पशुओं की संख्या और टैग का सत्यापन किस स्तर पर हुआ। यदि रिकॉर्ड में मृत या अपंजीकृत गोवंश के टैग मौजूद थे, तो भुगतान की स्वीकृति किस आधार पर दी गई?
57.36 करोड़ के मामले में अब इन सवालों के जवाब जरूरी
राज्य में 38 गौशालाओं से 57.36 करोड़ रुपए की अतिरिक्त अनुदान राशि की वसूली के नोटिस जारी होने के बाद अब वास्तविक रिकवरी का हिसाब महत्वपूर्ण हो गया है। यह पता चलना बाकी है कि कितनी गौशालाओं ने रकम जमा कराई, कितनों ने नोटिस पर आपत्ति की और किनके विरुद्ध आगे की कार्रवाई हुई।
पशुपालन विभाग के प्रमुख शासन सचिव विकास सीतारामजी भाले ने मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने और व्यवस्था में सुधार करने की बात कही है।