दवाओं की क्वालिटी पर सरकार सख्त, जांच पास होने पर ही होगी सप्लाई
समझें क्या है पूरा मामला
- कोटा-बीकानेर में प्रसूताओं की मौत के बाद सरकार ने लिया सख्त फैसला।
- सरकारी अस्पतालों में स्थानीय खरीदी दवाएं अब जांच के बाद ही मरीजों को मिलेंगी।
- हर खेप को पहले क्वारंटाइन किया जाएगा, लैब क्लीयरेंस के बाद ही होगा इस्तेमाल।
- घटिया दवाओं की आपूर्ति करने वाले वेंडर को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा।
- ड्रग कंट्रोलर हर महीने अस्पतालों का औचक निरीक्षण करेंगे।
राजस्थान सरकार ने सरकारी अस्पतालों में स्थानीय स्तर पर खरीदी जाने वाली दवाओं को लैब टेस्ट के बाद ही मरीजों को देने का फैसला किया है। हर खेप को पहले क्वारंटाइन किया जाएगा।
तय मानकों पर खरी उतरने पर ही दवाएं आगे जाएंगी। घटिया दवा देने वाले वेंडर को ब्लैकलिस्ट किया जा सकेगा। ड्रग कंट्रोलर हर महीने औचक निरीक्षण करेंगे।
कोटा-बीकानेर मौतों के बाद फैसला
यह निर्णय कोटा और बीकानेर में सिजेरियन ऑपरेशन डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की लगातार मौतों के बाद लिया गया है। इस कड़ी में जांच में ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन फेल हो गए थे और इनकी गुणवत्ता पर सवाल उठे थे।
अब सरकार ने साफ कर दिया है कि किसी भी सरकारी चिकित्सा संस्थान में स्थानीय स्तर पर खरीदी गई दवा तब तक इस्तेमाल नहीं की जाएगी, जब तक उसे लैब से क्लीयरेंस न मिल जाए।
क्वारंटाइन और फास्ट ट्रैक टेस्टिंग
दवाओं की हर खेप अस्पताल में आते ही पहले क्वारंटाइन की जाएगी। उसके यादृच्छिक नमूने (रैंडम सैंपल) तुरंत राजकीय औषधि परीक्षण प्रयोगशाला या किसी मान्यता प्राप्त एनएबीएल लैब में फास्ट ट्रैक जांच के लिए भेजे जाएंगे।
टेस्टिंग की पूरी प्रक्रिया और उसके खर्च के लिए वेंडर को किए जाने वाले भुगतान का 1 से 15 फीसदी हिस्सा आवंटित किया जाएगा।
WHO-GMP प्रमाणित दवाएं ही मान्य
स्थानीय स्तर पर केवल वही दवाएं खरीदी जाएंगी जो डब्ल्यूएचओ-जीएमपी (World Health Organisation - Good Manufacturing Practice) प्रमाणित हों या केंद्र सरकार के मानकों पर निर्मित हों।
खरीदी जाने वाली दवाओं की शेल्फ लाइफ कुल अवधि की कम से कम 75 फीसदी शेष होनी चाहिए। इससे कम शेल्फ लाइफ वाली दवा स्वीकार नहीं की जाएगी।
फेल दवा पर वेंडर होगा ब्लैकलिस्ट
घटिया दवा की आपूर्ति करने वाले वेंडर के खिलाफ आरटीपीपी (Rajasthan Transparency in Public Procurement) नियम 2013 के नियम 11 के तहत डीबार या ब्लैकलिस्ट किए जाने की कार्रवाई हो सकती है।
यह प्रावधान उन कंपनियों को भविष्य में सरकारी खरीद से बाहर कर देगा जो मानकों पर खरी नहीं उतरतीं।
हर महीने औचक निरीक्षण, डिजिटल रिकॉर्ड अनिवार्य
ड्रग कंट्रोलर अब हर महीने सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों का औचक निरीक्षण करेंगे। वे स्थानीय स्तर पर खरीदी दवाओं के स्टॉक, रखरखाव की जांच करेंगे और नियामक नमूने भी लेंगे।
इसके साथ ही अस्पतालों को दवाओं का डिजिटल रिकॉर्ड रखना होगा। अस्पताल के सूचना पट्ट पर अधिकृत वेंडर्स की सूची और अनुमोदित दरें भी प्रदर्शित करनी होंगी। इससे मरीज और उनके परिजन जान सकेंगे कि कौन-सी कंपनी की दवाएं अस्पताल में आ रही हैं।
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