आबकारी आयुक्त को भारी पड़ी मनमानी, हाईकोर्ट ने लगाया 2 लाख हर्जाना, ब्याज समेत लौटानी होगी रकम
राजस्थान हाईकोर्ट ने चोरी की बस में अवैध शराब मिलने के बाद उसके निर्दोष मालिक पर जुर्माना लगाने और बस नीलाम करने के मामले में आबकारी विभाग की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने आबकारी आयुक्त पर दो लाख रुपए का हर्जाना लगाया है। साथ ही बस की नीलामी से मिले 8 लाख 3 हजार रुपए जब्ती की तारीख से छह प्रतिशत सालाना ब्याज सहित लौटाने के आदेश दिए हैं।
जस्टिस आनंद शर्मा ने राजेंद्र सिंह एस. भाटिया की याचिका मंजूर करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने माना कि बस मालिक का शराब तस्करी से कोई संबंध साबित नहीं हुआ था। इसके बावजूद उसकी बस जब्त की गई और अपील की अवधि पूरी होने से पहले ही नीलाम कर दी गई।
बैंक से कर्ज लेकर खरीदी बस, चोरी के बाद शराब तस्करी में पकड़ी गई
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता हरीकिशन सैनी ने अदालत को बताया कि राजेंद्र सिंह एस. भाटिया अहमदाबाद के निवासी हैं और श्री दुर्गा ट्रेवल्स के नाम से व्यवसाय करते हैं। उन्होंने बैंक से 10 लाख रुपए का कर्ज लेकर एक मिनी बस खरीदी थी।
5 नवंबर 2014 की रात उनकी बस चोरी हो गई। तलाश के बाद भी बस नहीं मिलने पर उन्होंने 13 नवंबर को अहमदाबाद के नारपुरा पुलिस थाने में चोरी की एफआईआर दर्ज करवाई।
इसके बाद 25 नवंबर 2014 को अजमेर की आदर्श नगर थाना पुलिस ने नेशनल हाईवे-8 पर एक ढाबे के पास बस पकड़ी। उसमें 62 कार्टन अवैध शराब मिली। पुलिस ने बस चला रहे लादूराम को गिरफ्तार कर राजस्थान आबकारी अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया।
मालिक आरोपी नहीं, फिर भी लगा दिया 10 लाख का जुर्माना
बस मिलने की जानकारी पर मालिक ने कानूनी कार्रवाई शुरू की। अहमदाबाद की मजिस्ट्रेट कोर्ट ने आरोपी और बस को पेश करने के लिए ट्रांसफर वारंट जारी किया। अजमेर की अदालत ने आरोपी ड्राइवर की कस्टडी अहमदाबाद कोर्ट को सौंप दी, लेकिन बस नहीं भेजी गई।
इसके बाद राजेंद्र सिंह ने 11 फरवरी 2015 को आबकारी आयुक्त के सामने बस रिलीज करने की अर्जी लगाई। आबकारी आयुक्त ने 30 जून 2015 को उनकी अर्जी खारिज कर दी। बस जब्त करने के साथ मालिक पर 10 लाख रुपए का जुर्माना भी लगा दिया। जुर्माना नहीं भरने पर बस नीलाम करने का आदेश दिया गया।
जबकि पुलिस ने बस मालिक को शराब तस्करी के मामले में आरोपी तक नहीं बनाया था।
अपील के 60 दिन पूरे होने से पहले ही नीलाम कर दी बस
आबकारी आयुक्त के आदेश के खिलाफ राजस्थान टैक्स बोर्ड में अपील करने के लिए 60 दिन का समय मिलता है। लेकिन विभाग ने इस अवधि के समाप्त होने से पहले ही 19 अगस्त 2015 को बस की नीलामी कर दी।
नीलामी में बस 8 लाख 3 हजार रुपए में बेची गई। बाद में मालिक ने यह राशि वापस मांगी, लेकिन विभाग ने आवेदन खारिज कर दिया। विभाग ने बस मालिक से संबंधित आपराधिक मामले में बरी होने का आदेश भी मांगा। जबकि उसके खिलाफ शराब तस्करी का कोई आपराधिक मामला दर्ज ही नहीं था।
चोरी के बाद बस मालिक का वाहन पर नियंत्रण कैसे रहता?
हाईकोर्ट ने कहा कि बस चोरी होने के बाद वाहन मालिक का उस पर कोई नियंत्रण नहीं था। चोरी की जानकारी मिलने पर उसने पुलिस में एफआईआर भी दर्ज करवाई थी। ऐसे में आबकारी आयुक्त का यह मानना गलत था कि मालिक बस का दुरुपयोग रोकने में विफल रहा।
अदालत ने कहा कि राजस्थान आबकारी अधिनियम के तहत वाहन जब्त करते समय यह देखना जरूरी है कि मालिक को अपराध में वाहन इस्तेमाल होने की जानकारी थी या नहीं और उसने इसे रोकने के लिए जरूरी सावधानी बरती थी या नहीं। इस मामले में मालिक के खिलाफ अपराध में शामिल होने का कोई आधार सामने नहीं आया।
हाईकोर्ट ने जल्दबाजी में नीलामी को माना बदनीयतीपूर्ण
अदालत ने आबकारी विभाग की उस कार्रवाई पर भी नाराजगी जताई, जिसमें अपील की समय सीमा खत्म होने से पहले ही बस नीलाम कर दी गई। हाईकोर्ट ने इस जल्दबाजी को बदनीयतीपूर्ण माना। अदालत के अनुसार, विभाग की कार्रवाई से वाहन मालिक के अपील करने के अधिकार पर असर पड़ा।
कोर्ट ने मालिक से आपराधिक मामले में बरी होने का आदेश मांगने को भी बेतुका बताया। जब वह किसी मामले में आरोपी ही नहीं था, तो बरी होने का आदेश कैसे पेश करता? अदालत ने इस मांग को वाहन मालिक को परेशान करने वाली कार्रवाई माना।
2 लाख हर्जाना, नीलामी की रकम भी ब्याज सहित लौटाने के आदेश
हाईकोर्ट ने आबकारी आयुक्त की कार्रवाई को गैरकानूनी और मनमाना मानते हुए वाहन मालिक को राहत दी है। अदालत ने दो लाख रुपए हर्जाना देने के साथ बस की नीलामी से प्राप्त 8 लाख 3 हजार रुपए भी जब्ती की तारीख से छह प्रतिशत सालाना ब्याज सहित लौटाने के निर्देश दिए हैं।
यह मामला बताता है कि किसी वाहन का अपराध में इस्तेमाल होना ही उसके मालिक को दोषी मानने का पर्याप्त आधार नहीं है। वाहन चोरी होने और मालिक की संलिप्तता साबित नहीं होने जैसी परिस्थितियों को भी जब्ती की कार्रवाई में ध्यान में रखना जरूरी है।