राजस्थान हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, मैटरनिटी लीव पर चल रही लेक्चरर के तबादला आदेश पर अंतरिम रोक
याचिका के अनुसार याचिकाकर्ता मैटरनिटी लीव पर है और उसका नवजात शिशु सिर्फ चार महीने का है, जो पूरी तरह मां पर निर्भर है। इसके बावजूद विभाग ने उसका तबादला करौली जिले के दूरस्थ डांग क्षेत्र में कर दिया। याचिका में इस तबादला आदेश को रद्द करने की मांग की गई है।
पवित्र बंधन की रक्षा पर अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि एक आदर्श नियोक्ता के रूप में राज्य सरकार को नई बनी मां और उसके बच्चे के बीच के पवित्र बंधन की रक्षा करनी चाहिए। सरकार को मशीनी अंदाज में तबादला करके इस बंधन को नहीं तोड़ना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि चार महीने की नव प्रसूता (नई बनी मां) का किसी दूरस्थ स्थान पर तबादला करना बच्चे को उसकी मां से जबरन अलग करने जैसा है। इससे न केवल मूल अधिकारों का हनन होगा, बल्कि शिशु को मानसिक आघात, असुरक्षा और कुपोषण का खतरा भी हो सकता है।
उचित तबादला नीति की जरूरत
अदालत ने राज्य सरकार को नव प्रसूता कर्मचारियों के लिए उचित तबादला नीति बनाने को कहा है। अदालत के अनुसार ऐसी नीति के अभाव में मां और शिशु, दोनों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यह टिप्पणी उन सभी महिला कर्मचारियों पर लागू होती है, जो प्रसव के बाद की छुट्टी पर हैं।
याचिकाकर्ता के वकील का पक्ष
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विजय पाठक ने अदालत में दलील दी। उनके अनुसार बच्चा इतना छोटा है कि मां के दूध और देखभाल के बिना उसका जीवन सुरक्षित नहीं है। उन्होंने तबादला आदेश रद्द करने की मांग की। इस दलील को अदालत ने गंभीरता से लिया और अंतरिम रोक दी।
प्रतिवेदन पर 5 सप्ताह में फैसला
अदालत ने विभाग से याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन पर 5 सप्ताह के भीतर फैसला करने को कहा है। इस दौरान तबादले का आदेश लागू नहीं होगा। यह फैसला सरकारी विभागों के लिए भी एक संदेश है कि प्रसूता कर्मचारियों के मामलों में समय पर और संवेदनशील तरीके से फैसला लिया जाए।
निचली अदालतों की कार्यशैली पर सवाल
इसी दिन एक अलग मामले में राजस्थान हाई कोर्ट ने निचली अदालतों की कार्यशैली पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि पीठासीन अधिकारियों और रीडर्स को न्यायिक कार्यवाही के बेहतर प्रबंधन के लिए उचित ट्रेनिंग देने की जरूरत है। इसके साथ आदेश की प्रति रजिस्ट्रार जनरल के जरिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने को कहा गया।
ऑर्डरशीट और जमानत का मामला
रामस्वरूप की चौथी जमानत याचिका पर अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को न्याय की प्रतीक्षा में अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता। याचिका में आरोपी के धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेज के मामले में 12 मई 2025 से जेल में होने की बात कही गई है।
अदालत ने पाया कि 19 सितंबर से 28 अक्टूबर 2026 तक की एसीजेएम की ऑर्डरशीट में कोई प्रगति नहीं हुई और न्यायिक हिरासत अवधि बढ़ाई जाती रही। सोर्स के अनुसार ऑर्डरशीट रीडर लिखते हैं और अंत में पीठासीन अधिकारी हस्ताक्षर करते हैं। हाईकोर्ट के जल्द ट्रायल के निर्देश के बाद भी अभी तक केवल एक गवाह के बयान दर्ज हुए हैं।