राजस्थान हाई कोर्ट: नव प्रसूता कर्मचारियों के लिए बने तबादला नीति, मां और बच्चे के बंधन को तोड़ना ठीक नहीं
समझें क्या है पूरा मामला
- राजस्थान हाई कोर्ट का बड़ा फैसला।
- नव प्रसूता कर्मचारियों के लिए तबादला नीति।
- मां और बच्चे की रक्षा जरूरी।
- तबादला आदेश पर छह सप्ताह की रोक।
- सरकार को निर्देश जारी।
राजस्थान हाई कोर्ट (Rajasthan High Court) ने नव प्रसूता कर्मचारियों के तबादले को लेकर बड़ा फैसला दिया है। अदालत ने कहा कि एक आदर्श नियोक्ता के रूप में राज्य सरकार को नव प्रसूता और उसके बच्चे के बीच के पवित्र बंधन की रक्षा करनी चाहिए।
सरकार को मशीनी अंदाज में तबादला करके इस बंधन को नहीं तोड़ना चाहिए। अदालत ने राज्य सरकार को नव प्रसूता कर्मचारियों के लिए एक उचित तबादला नीति (Transfer Policy) बनाने के निर्देश दिए हैं। ऐसी नीति के अभाव में मां और शिशु दोनों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
किस मामले में आया फैसला?
जस्टिस अनूप कुमार ढंढ (Justice Anoop Kumar Dhand) ने यह आदेश सुमन मीणा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने याचिकाकर्ता से जुड़े मामले में तबादला आदेश पर छह सप्ताह के लिए रोक लगा दी है।
साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन को पांच सप्ताह के भीतर तय करने को कहा है। इससे याचिकाकर्ता को राहत मिली है। अब विभाग को तय समय में फैसला लेना होगा।
याचिका में क्या कहा गया
याचिका में अधिवक्ता संस्कृति गौतम ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता सवाई माधोपुर के गंगापुर सिटी में वरिष्ठ अध्यापिका के तौर पर कार्यरत है। उसने गत 13 मई को बच्चे को जन्म दिया था।
इसके बाद 7 जुलाई को विभाग ने उसका तबादला करौली जिले में कर दिया। याचिका में आगे कहा गया कि तकनीकी आधार पर उसे मातृत्व अवकाश नहीं दिया गया है। इसका कारण बताया गया कि वह पूर्व में दो बार मातृत्व अवकाश ले चुकी है।
हालांकि पूर्व में एक संतान के जन्म के बाद उसकी मृत्यु हो गई थी। याचिकाकर्ता ने मानवीय आधार पर तबादला आदेश को निरस्त कराने के लिए राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण में अपील दायर की थी। लेकिन अधिकरण ने उसे खारिज कर दिया।
दो महीने का है शिशु
याचिका में कहा गया है कि उसका नवजात शिशु अभी केवल दो महीने का है। वह पूर्ण रूप से अपनी मां पर निर्भर है। ऐसे में उसका किसी दूरस्थ स्थान पर तबादला करना पूरी तरह अनुचित है।
अदालत ने कहा कि किसी दूरस्थ स्थान पर तबादला करना दो महीने के बच्चे को उसकी मां से जबरन अलग करने जैसा है। इससे न केवल उनके अमूल्य अधिकारों का हनन होगा। बल्कि शिशु को मानसिक आघात, असुरक्षा और कुपोषण का खतरा भी उत्पन्न होगा।
अदालत ने कहा कि इसकी किसी भी तरह से भरपाई नहीं की जा सकती। इसलिए ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।
क्यों जरूरी है तबादला नीति
अदालत ने कहा कि नव प्रसूता कर्मचारियों के लिए उचित तबादला नीति बनाना जरूरी है। ऐसी नीति के बिना मां और शिशु दोनों को परेशानी होती है।
नीति बनने से विभाग को स्पष्ट दिशा मिलेगी। साथ ही नव प्रसूता कर्मचारियों को मानवीय आधार पर राहत मिल सकेगी। इससे मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर बुरा असर नहीं पड़ेगा।
क्यों अहम है यह फैसला
यह फैसला नव प्रसूता कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत है। इससे उन्हें मानवीय आधार पर तबादले में राहत मिल सकेगी। साथ ही राज्य सरकार को एक स्पष्ट नीति बनानी होगी।
यह फैसला अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। इसमें मां और बच्चे के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी गई है। अब देखना जरूरी है कि सरकार कितनी जल्दी नीति बनाती है।