सड़क पर सुरक्षा संविधानिक अधिकार, हाईवे से 2 महीने में हटें अतिक्रमण-हाई कोर्ट
News in Short
- राजस्थान हाईकोर्ट ने नेशनल व स्टेट हाइवे से करीब 2,000 अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया
- हाईवे में रुकावट बनने वाले धार्मिक स्थलों को भी नहीं मिलेगी छूट
- 7 दिन में डिस्ट्रिक्ट हाईवे सेफ्टी टास्क फोर्स का गठन करने के निर्देश
- कानून के अनुसार हटाए जाएं अतिक्रमण,जीआईएस मैपिंग और वीडियोग्राफी भी हो
- सरकार को दो महीने में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश
News in Detail
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने सड़क सुरक्षा को नागरिकों के जीवन के अधिकार के तहत राज्यभर में नेशनल और स्टेट हाईवे से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि हाईवे के राइट-ऑफ-वे क्षेत्र में स्थित कोई भी संरचना, चाहे वह धार्मिक स्थल हो, मकान हो या दुकान, अवैध मानी जाएगी और यह नियमित नहीं हो सकते । कोर्ट ने कहा है कि धर्मिक स्थलों को कोई छूट नहीं मिलेगी।
अतिक्रमण की पहचान और हटाने का आदेश
मामले की सुनवाई के दौरान पेश आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में नेशनल और स्टेट हाईवे की राइट-ऑफ-वे में 103 धार्मिक संरचनाएं, 881 आवासीय और 1,232 व्यावसायिक अतिक्रमण चिन्हित हुए हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि सड़क के दोनों किनारों पर 40-40 मीटर तक और 75-75 मीटर तक नियंत्रण रेखा लागू होती है। यह सड़क सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। इसके उल्लंघन से दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ती है।
टास्क फोर्स का गठन
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार, जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, एनएचएआई , पीडब्ल्यूडी व अन्य संबंधित विभागों को समन्वित कार्रवाई करने को कहा है। कोर्ट ने सात दिन के भीतर हर जिले में डिस्ट्रिक्ट हाईवे सेफ्टी टास्क फोर्स गठन करने के निर्देश दिए हैं। इस टास्क फोर्स में विभिन्न सरकारी अधिकारी होंगे जो अतिक्रमण की पहचान करके कार्रवाई करेंगे।
विधि अनुसार अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अतिक्रमण हटाने की पूरी प्रक्रिया विधि अनुसार होनी चाहिए। इसमें पूर्व सूचना, सुनवाई का अवसर, जीआईएस मैपिंग और वीडियोग्राफी शामिल होगी। कोर्ट ने राज्य सरकार को दो महीने में अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया और भविष्य की नियामक व्यवस्था की विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
सड़क पर सुरक्षा संविधानिक अधिकार है
कोर्ट ने कहा है कि सड़क सुरक्षा केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत नागरिकों के जीवन जीने के अधिकार का हिस्सा है। राज्य का दायित्व है कि वह सुरक्षित यातायात सुनिश्चित करे। कोर्ट ने यह भी कहा है कि आदेशों की निगरानी स्वयं हाईकोर्ट करेगा और आवश्यकता पड़ने पर और निर्देश जारी किए जाएंगे।
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