राजस्थान में दुर्लभ “स्टोन मैन सिंड्रोम” बीमारी का पहला मामला, मांसपेशियां धीरे-धीरे बन जाती हैं हड्डी
News In Short
- राजस्थान में दुर्लभ “स्टोन मैन सिंड्रोम” का पहला मामला आया सामने।
- इसे मेडिकल भाषा में FOP (Fibrodysplasia Ossificans Progressiva) के नाम से जाना जाता है।
- इसमें पीड़ित मरीज की मांसपेशियां, लिगामेंट और सॉफ्ट टिश्यू धीरे-धीरे हड्डियों में बदलने लगते हैं।
- बेहद दुर्लभ, 15 से 20 लाख लोगों में से केवल एक व्यक्ति में देखने को मिलती है।
- अभी तक कोई स्थायी इलाज नहीं, शुरुआती संकेत की पहचान ही कारगर।
News In Detail
राजस्थान के सीमावर्ती जिले जैसलमेर में पहली बार एक बेहद दुर्लभ बीमारी एफओपी (Fibrodysplasia Ossificans Progressiva) का मामला सामने आया है। इस बीमारी को चिकित्सा जगत में बहुत ही दुर्लभ माना जाता है, इसलिए इसका सामने आना स्वास्थ्य विभाग और डॉक्टरों के लिए भी चर्चा का विषय बन गया है।
जैसलमेर के वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. दिनेश जांगिड़ के अनुसार FOP एक आनुवंशिक रोग है। इस रोग में शरीर की मांसपेशियां, लिगामेंट और सॉफ्ट टिश्यू धीरे-धीरे हड्डियों में बदलने लगते हैं। इस कारण शरीर के अंदर अतिरिक्त हड्डियां बनने लगती हैं और समय के साथ शरीर का मूवमेंट कम होता जाता है। यह आमतौर पर ACVR1 नाम के जीन में बदलाव के कारण होती है, जिससे शरीर में हड्डी बनने की प्रक्रिया असामान्य रूप से सक्रिय हो जाती है।
“स्टोन मैन सिंड्रोम” के नाम से भी जानी जाती है बीमारी
डॉक्टरों के मुताबिक इस बीमारी को आम भाषा में “स्टोन मैन सिंड्रोम” भी कहा जाता है। इसमें शरीर के अंदर अतिरिक्त हड्डियां बनने लगती हैं, जिससे मांसपेशियां और टिश्यू कठोर हो जाते हैं और शरीर की गतिशीलता कम होती चली जाती है।
15-20 लाख लोगों में एक को होती है
FOP दुनिया की सबसे दुर्लभ बीमारियों में से एक मानी जाती है। अनुमान के अनुसार यह बीमारी लगभग 15 से 20 लाख लोगों में से केवल एक व्यक्ति में पाई जाती है। वैश्विक स्तर पर अब तक करीब 700 से 800 मामलों की ही पुष्टि हुई है। भारत में भी इसके बहुत कम केस दर्ज किए गए हैं।
बचपन में दिखने लगते हैं लक्षण
विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी के शुरुआती संकेत अक्सर बचपन में दिखाई देने लगते हैं। कई बच्चों में जन्म के समय ही पैर के बड़े अंगूठे का असामान्य या टेढ़ा होना इसका एक संकेत माना जाता है। इसके अलावा शरीर के अलग-अलग हिस्सों में सूजन, दर्द या छोटी-छोटी गांठें बनने लगती हैं, जो बाद में हड्डियों में बदल सकती हैं।
अभी तक स्थायी इलाज नहीं
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है। डॉक्टर केवल इसके लक्षणों को नियंत्रित करने और मरीज को सावधानी के साथ जीवन जीने की सलाह देते हैं। मामूली चोट, सर्जरी या बार-बार इंजेक्शन लगने से भी शरीर में नई हड्डी बनने की प्रक्रिया तेज हो सकती है, इसलिए मरीजों को विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत होती है।
डॉक्टरों का कहना है कि शुरुआती लक्षण सामान्य सूजन या गांठ जैसे दिखने के कारण कई बार इसकी पहचान में देरी हो जाती है। ऐसे में यदि बच्चों में बार-बार सूजन, दर्द या असामान्य गांठ दिखाई दे तो तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
जैसलमेर में सामने आया यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सीमावर्ती जिले में इस तरह की दुर्लभ बीमारी का यह संभवतः पहला मामला है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे मामलों की जानकारी सामने आने से लोगों में जागरूकता बढ़ेगी और मरीजों को समय पर उचित सलाह व देखभाल मिल सकेगी।
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