राजस्थान में 8.5 लाख किसानों को दिए गए मक्का बीज की गुणवत्ता पर उठे सवाल, DNA जांच शुरू
समझें क्या है पूरा मामला
- 8.5 लाख किसानों को बांटे मक्का बीज की गुणवत्ता पर सवाल।
- DNA जांच में दो सैंपल फेल होने का दावा।
- प्रताप हाइब्रिड-6 के नाम पर बांटे गए बीज की जांच शुरू।
- घटिया बीज से 25 से 30 फीसदी तक फसल कम होने की आशंका।
- 85 करोड़ रुपए के बीज वितरण के बाद गुणवत्ता पर उठे सवाल
राजस्थान में करीब 8.5 लाख किसानों को बांटे गए मक्का बीज की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकार ने वर्ष 2026 के बजट में किसानों को उन्नत मक्का बीज मुफ्त देने की घोषणा की थी। इसके तहत प्रत्येक किसान को पांच किलो बीज दिया जाना था।
किसानों को प्रताप हाइब्रिड-6 किस्म का बीज वितरित किया गया। जून 2026 में बीज किसानों तक पहुंचा, लेकिन अब इसकी गुणवत्ता को लेकर जांच शुरू हो गई है। बीज के दो सैंपल की DNA जांच कराई गई। जांच में दोनों सैंपल के निर्धारित वेरायटी से मैच नहीं होने की बात सामने आई है। वहीं कृषि विभाग ने भी अपने स्तर पर बीज के सैंपल जांच के लिए भेजे थे। विभाग की रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है।
चार कंपनियों को दिया गया बीज तैयार करने का काम
मक्का बीज तैयार करने का काम आंध्रप्रदेश की चार निजी कंपनियों को दिया गया। इन कंपनियों ने विश्वविद्यालय से ब्रीडर सीड लिया और मई 2026 में तैयार बीज आरएसएससी को भेजा। इसके बाद जून 2026 में बीज किसानों को वितरित कर दिया गया।
अब सवाल इस बात को लेकर उठ रहा है कि इतनी बड़ी मात्रा में बीज तैयार होने और किसानों तक पहुंचने से पहले इसकी वेरायटी और गुणवत्ता की पर्याप्त जांच क्यों नहीं की गई।
DNA जांच में नहीं हुआ मैच
मामला सामने आने के बाद मक्का बीज के सैंपल की DNA जांच कराई गई। जांच में दो सैंपल के निर्धारित वेरायटी से मैच नहीं होने की बात सामने आई है। यानी जिस प्रताप हाइब्रिड-6 किस्म के नाम पर किसानों को बीज दिया गया था, उसकी जेनेटिक पहचान को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
कृषि विभाग की ओर से भी सैंपल की जांच कराई गई है। हालांकि विभाग ने अभी तक इस जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया है।अब इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद ही स्थिति ज्यादा साफ होगी कि किसानों को बांटा गया बीज निर्धारित मानकों पर खरा उतरता है या नहीं।
एक्सपर्ट बोले- फसल 25 से 30 फीसदी तक घट सकती है
बीज की जेनेटिक प्योरिटी फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।विशेषज्ञों के मुताबिक यदि हाइब्रिड बीज की जेनेटिक प्योरिटी तय मानक से कम होती है तो इसका असर सीधे फसल की पैदावार पर पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में मक्का की फसल 25 से 30 फीसदी तक कम होने की संभावना जताई जा रही है। इसका मतलब है कि यदि बड़ी संख्या में किसानों को खराब या निर्धारित वेरायटी से अलग बीज मिला है तो इसका असर बड़े क्षेत्र की मक्का फसल पर पड़ सकता है।
35 हजार क्विंटल बीज पर भी सवाल
मक्का बीज की मात्रा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जानकारी के मुताबिक प्रताप हाइब्रिड-6 वेरायटी को वर्ष 2024 में नोटिफाइड किया गया था। इसके बाद कम समय में करीब 35 हजार क्विंटल बीज तैयार किए जाने की प्रक्रिया पर विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक कम समय में इतनी बड़ी मात्रा में हाइब्रिड बीज तैयार करना तकनीकी और व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है। अब जांच में यह भी देखा जा रहा है कि बीज उत्पादन की पूरी प्रक्रिया किस तरह हुई और निर्धारित गुणवत्ता मानकों का पालन किया गया या नहीं।
राजस्थान में उत्पादन की जगह बाहर की कंपनियों पर भरोसा
आरएसएससी गेहूं, चना, जौ, मूंग, मोठ और सरसों सहित कई फसलों के बीज का उत्पादन करवाता है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से मक्का और बाजरे का बीज निजी कंपनियों के जरिए तैयार कराया जा रहा है।
इस बार भी मक्का बीज तैयार करने का काम आंध्रप्रदेश की चार कंपनियों को दिया गया।वहीं राजस्थान में ही मक्का और बाजरे का उत्पादन करने वाले कई बड़े किसान मौजूद हैं। इनमें से कई किसानों के साथ आरएसएससी का अनुबंध भी रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि राजस्थान में उपलब्ध संसाधनों और किसानों के बावजूद मक्का बीज उत्पादन के लिए बाहर की कंपनियों को जिम्मेदारी क्यों दी गई।
85 करोड़ के बीज पर उठे सवाल
कृषि विभाग आरएसएससी से बीज खरीदकर किसानों को मुफ्त वितरित करता है। इस योजना के तहत करीब 85 करोड़ रुपए के मक्का बीज का वितरण किए जाने की बात सामने आई है।
अब सवाल यह है कि जब बीज की गुणवत्ता को लेकर संदेह था और सैंपल जांच के लिए भेजे गए थे, तो किसानों को बीज का वितरण क्यों किया गया।इसके साथ ही बीज की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने के बाद भुगतान प्रक्रिया को लेकर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
कंपनी का दावा- सही बीज की सप्लाई की
मामले में बीज की आपूर्ति करने वाली कंपनी की ओर से कहा गया है कि उसकी तरफ से सही बीज की सप्लाई की गई थी। कंपनी के प्रबंध निदेशक के मुताबिक DNA मैपिंग में गड़बड़ी हुई हो सकती है। उनका कहना है कि रीडिंग में मामूली बदलाव से जांच का रिजल्ट प्रभावित हो सकता है। हालांकि बीज की वास्तविक गुणवत्ता और वेरायटी को लेकर अंतिम स्थिति आधिकारिक जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल
किसानों ने सरकारी योजना के तहत मिले बीज को अपने खेतों में लगाया है। ऐसे में अगर जांच में बीज निर्धारित वेरायटी का नहीं पाया जाता है या उसकी जेनेटिक प्योरिटी तय मानक से कम मिलती है तो इसका सीधा असर फसल पर पड़ सकता है। मक्का की पैदावार कम होने पर किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में अब किसानों की नजर कृषि विभाग की जांच रिपोर्ट और आगे होने वाली कार्रवाई पर है।
अब जांच रिपोर्ट से खुलेगा पूरा राज
मक्का बीज मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण कृषि विभाग की जांच रिपोर्ट होगी। DNA जांच और विभागीय जांच के नतीजों से यह साफ हो सकेगा कि किसानों को वितरित किया गया बीज वास्तव में प्रताप हाइब्रिड-6 था या नहीं। साथ ही यह भी पता चलेगा कि बीज उत्पादन से लेकर किसानों तक वितरण के बीच गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया में कहीं लापरवाही हुई या नहीं। यदि बीज निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरता है तो जिम्मेदारी तय करने के साथ किसानों को हुए संभावित नुकसान पर भी फैसला लेना होगा।
यह खबर क्यों जरूरी है:
राजस्थान के करीब 8.5 लाख किसानों को सरकारी योजना के तहत मुफ्त मक्का बीज दिया गया है। ऐसे में बीज की गुणवत्ता पर उठे सवाल सीधे किसानों की फसल और कमाई से जुड़े हैं। अगर जांच में बीज निर्धारित वेरायटी या गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरता है तो इसका असर बड़े क्षेत्र में मक्का उत्पादन पर पड़ सकता है। फिलहाल DNA जांच और कृषि विभाग की रिपोर्ट के आधार पर ही पूरे मामले की तस्वीर साफ होगी।