हादसे पर हादसे, पर जिम्मेदारी की 'कुर्सी' सुरक्षित, नहीं बदल रही अफसरशाही की तस्वीर
योगेंद्र योगी @ जयपुर
राजस्थान में एक साल के दौरान हुए भीषण हादसों ने जनमानस को झकझोर कर रख दिया है। विडंबना देखिए कि रसूखदार नौकरशाही के पेट का पानी तक नहीं हिला। हर बड़े हादसे के बाद जांच कमेटियों का गठन होता है, कागजी घोड़े दौड़ते हैं, और अंत में गाज गिरती है तो सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर। उच्च पदों पर बैठे अफसर आज भी सुरक्षित गलियारों में बैठकर अगली फाइल का इंतजार कर रहे हैं।
बस आग के हादसों की कतार
हाल ही में जैसलमेर के नाचना से अहमदाबाद जा रही एक प्राइवेट स्लीपर बस गुजरात के धानेरा के पास आग का गोला बन गई। हादसे में खीनसर निवासी अम्बालाल की मौत हो गई और कई यात्री झुलस गए।
कारण वही पुराना-एसी की वायरिंग में शॉर्ट सर्किट। यात्रियों की चीख-पुकार के बावजूद चालक बस को भगाता रहा। यह कोई अकेली घटना नहीं है। इससे पहले 14 अक्टूबर 2025 को जोधपुर-जैसलमेर हाईवे पर बस में आग लगने से कुल 29 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।
जैसलमेंर में 29 यात्रियों की मौत की जांच रिपोर्ट रोंगटे खड़े कर देने वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक आरटीओ अफसरों और ट्रेवल्स एजेंटों के बीच गहरा गठजोड़ है। बिना बॉडी वाली बसों का फर्जी रजिस्ट्रेशन किया गया। कागजों में जो बस नॉन-एसी थी, उसे सड़क पर लग्जरी एसी बस बनाकर उतारा गया। मानक ताक पर रखकर सीटें बढ़ाई गईं। सबसे घातक कदम यह रहा कि इमरजेंसी गेट के ठीक सामने सीटें जड़ दी गईं, जिससे संकट के समय यात्रियों के निकलने का रास्ता ही बंद हो गया।
जांच हुई, रिपोर्ट आई, हुआ कुछ नहीं?
28 अक्टूबर 2025 को जयपुर के मनोहरपुर में हुआ हादसा सिस्टम की एक और बड़ी लापरवाही का सबूत है। उत्तर प्रदेश के मजदूरों से भरी बस 11000 वोल्ट की हाईटेंशन लाइन की चपेट में आ गई। तीन मजदूरों की मौत हुई और कई जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो गए। जांच में सामने आया कि बस जिस कच्चे रास्ते से गुजर रही थी, वह भारी वाहनों के लिए था ही नहीं। साथ ही, बस की छत पर अवैध रूप से एलपीजी सिलेंडर लदे थे। मानवाधिकार आयोग ने नोटिस जारी किए, रिपोर्ट मांगी गई, लेकिन सवाल वही है-क्या किसी बड़े अधिकारी की गिरफ्तारी हुई? क्या किसी ने नैतिक जिम्मेदारी ली? जवाब नहीं में है।
कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति
जब परिवहन विभाग ने अक्टूबर 2025 को जैसलमेर में हुए बस आग हादसे के बाद दबाव में आकर राज्य के 700 में से 200 बस बॉडी बिल्डर्स को सीज किया और 100 से अधिक बसों पर कार्रवाई की, तो निजी बस ऑपरेटरों की हड़ताल कर 'चक्का जाम' की धमकी दे दी। 30 हजार बसों के पहिए थमने के डर से सरकार ने घुटने टेक दिए। समझौतों की आड़ में अभियान को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। यह मिलीभगत का सबसे बड़ा प्रमाण है, जहां रसूख के आगे नियम बौने साबित हो रहे हैं।
मौत का तांडव और अफसरों को 'अभयदान'
सिर्फ सड़कें ही नहीं, सरकारी अस्पताल भी अब सुरक्षित नहीं रहे। जयपुर के प्रतिष्ठित एसएमएस अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर के आईसीयू में शॉर्ट सर्किट से लगी आग में आठ मरीजों की मौत हो गई। सरकार ने अधीक्षक और ट्रॉमा इंचार्ज को हटाकर और एक इंजीनियर को निलंबित कर अपनी इतिश्री कर ली। क्या आठ इंसानी जिंदगियों की कीमत बस एक तबादला या निलंबन है?
यही कहानी भिवाड़ी के खुशखेड़ा की अवैध पटाखा फैक्ट्री में धमाकाकी है। 16 फरवरी 2026 को हुए ब्लास्ट में 9 श्रमिकों की जान चली गई। एक महीना बीत जाने के बाद भी रीको, प्रदूषण मंडल, नगर परिषद और श्रम विभाग के किसी भी वरिष्ठ अधिकारी पर आंच नहीं आई। प्रशासन ने उन्हीं विभागों के अफसरों की 'संयुक्त टीम' बना दी, जो खुद कटघरे में थे। छोटे स्तर के कर्मचारियों और सुपरवाइजरों की गिरफ्तारी कर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की जा रही है।
आखिर कब तय होगी जवाबदेही?
विधि विशेषज्ञों का का कहना है कि प्रदेश में परिवर्तन का दावा करने वाली सरकार ने अब तक जवाबदेही तय करने का सख्त कानून नहीं बनाया है। यही कारण है कि नौकरशाही बेखौफ है। हादसों की श्रृंखला जारी है, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ न तो एफआईआर दर्ज होती है और न ही उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाता है।
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