AAP-CPM-RLP ने 3 शहरों में बनाए बोर्ड, क्या राजस्थान में खड़ा हुआ तीसरा मोर्चा?
समझें क्या है पूरा मामला
- राजस्थान निकाय चुनाव में क्या बन रहा तीसरा मोर्चा?
- बारां-नोखा-मूंडवा में छोटे दलों ने दिखाया कमाल।
- भाजपा-कांग्रेस के बाहर बना तीसरा विकल्प।
- आप-सीपीएम-आरएलपी ने कैसे बनाए अपने बोर्ड?
जयपुर। राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई के बीच छोटे दलों ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। भाजपा ने 200 और कांग्रेस ने 94 निकाय प्रमुख पद जीते हैं। लेकिन इस बड़ी लड़ाई के बीच तीन शहरों के नतीजे अलग कहानी कह रहे हैं। बारां में आम आदमी पार्टी (AAP), नोखा में सीपीएम और मारवाड़ मूंडवा में राष्ट्रीय लोतांत्रिक पार्टी (RLP) ने अपना बोर्ड बनाया।
तीनों की जीत का रास्ता अलग रहा। बारां में आम आदमी पार्टी को जनता ने सीधा बहुमत दिया। नोखा में सीपीएम ने भाजपा-कांग्रेस दोनों को पीछे छोड़ दिया। मूंडवा में आरएलपी ने अपने 7 पार्षदों के बावजूद अध्यक्ष की कुर्सी हासिल कर ली। सवाल अब यही है कि क्या राजस्थान में भाजपा-कांग्रेस के बीच तीसरे मोर्चे की जमीन बन रही?
आंकड़े कहते हैं कि अभी इसे प्रदेशव्यापी तीसरा मोर्चा कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी। लेकिन कुछ इलाकों में तीसरा विकल्प जरूर तैयार हुआ। खास बात यह है कि इन दलों ने सिर्फ वोट नहीं काटे, बल्कि बोर्ड बनाकर सत्ता भी हासिल की।
राजस्थान में निकाय चुनाव का पूरा गणित
पहले राजस्थान की पूरी तस्वीर समझिए। 10244 वार्डों के चुनाव में भाजपा ने 4182 और कांग्रेस ने 3619 वार्ड जीते। निर्दलीयों के खाते में 2273 सीटें आईं। छोटे दलों में हनुमान बेनीवाल की आरएलपी को 63, आप को 42, सीपीएम को 38, बहुजन समाज पार्टी को 19 और भारत आदिवासी पार्टी (BAP) को 8 वार्ड मिले। यानी इन पांच दलों के कुल 170 पार्षद जीते।
भाजपा-कांग्रेस के बीच वोट शेयर में 1 फीसदी से कम का अंतर
वोट शेयर में भी भाजपा-कांग्रेस की लड़ाई बेहद करीबी रही। भाजपा को 35.18% और कांग्रेस को 34.24% वोट मिले। अंतर सिर्फ 0.94 प्रतिशत अंक का रहा। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को 0.94%, आप को 0.46% और सीपीएम को 0.32% वोट मिले। निर्दलीयों का वोट शेयर 27.38% रहा। यानी पूरे राजस्थान में तीसरा मोर्चा अभी भाजपा-कांग्रेस के बराबर खड़ा नहीं। असली कहानी उन इलाकों में है, जहां छोटे दलों ने अपनी सीमित ताकत को सीधे बोर्ड में बदल दिया।
बारां में AAP ने कैसे बोर्ड बनाया?
सबसे बड़ा उलटफेर बारां के निकाय प्रमुख चुनाव में हुआ। यहां आम आदमी पार्टी (AAP) ने 60 में से 31 वार्ड जीतकर अपने दम पर बहुमत हासिल किया था। कांग्रेस 18 और भाजपा सिर्फ 9 सीटों पर रह गई। दो निर्दलीय जीते थे। इसके बाद आप की शीतल राठौर सभापति चुनीं गईं। उन्हें 31 वोट मिले। अब सवाल ये खड़ा होता है कि राजस्थान में कमजोर माने जाने वाली आम आदमी पार्टी अचानक बारां में कैसे इतनी मजबूत हो गई कि अपना बोर्ड बना लिया।
इसकी बड़ी वजह स्थानीय चेहरा रहा। पूर्व सभापति कमल राठौड़ कांग्रेस छोड़कर आप में आए हैं। उनके पास शहर में पुराना नेटवर्क था। आम आदमी पार्टी ने सभी 60 वार्ड में उम्मीदवार उतारे। सड़क, पानी और सफाई जैसे स्थानीय मुद्दों पर चुनाव लड़ा।
आम आदमी पार्टी की जीत कितनी स्थानीय है, इसका अंदाजा एक आंकड़े से लगता है। राजस्थान में पार्टी के 42 पार्षद जीते और इनमें 31 अकेले बारां से हैं। यानी करीब 74 फीसदी जीत सिर्फ बारां में मिली। बाकी 11 में पिड़ावा और झालरापाटन में पांच-पांच तथा झालावाड़ में एक पार्षद जीता। मतलब आम आदमी पार्टी की पूरी 42 सीटें बारां-झालावाड़ क्षेत्र में ही हैं।
क्या भाजपा ने आप को बारां में जिताया?
राजस्थान में निकाय चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही आम आदमी पार्टी पर भाजपा के 'बी' टीम होने के आरोप लग रहे। कांग्रेस खुलकर ये बात कह रही। बारां नगरपरिषद में सभापति पद के लिए चुनाव में भाजपा के पार्षदों ने वोटिंग का बहिष्कार किया था। इससे कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक हवा मिल रही । लेकिन नतीजों का गणित कुछ और कहता। आप के पास पहले से 31 पार्षद और साफ बहुमत था। शीतल राठौर को भी 31 वोट मिले। इसलिए बोर्ड बनाने के लिए आम आदमी पार्टी को भाजपा के 9 पार्षदों की जरूरत नहीं थी। सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस का हुआ, जिसका करीब 15 साल पुराना बोर्ड चला गया।
नोखा में सीपीएम का दबदबा
बीकानेर जिले के नोखा ने दूसरा मॉडल दिखाया। बीकानेर नगर निगम में कांग्रेस का महापौर बना, लेकिन नोखा में कांग्रेस खाता तक नहीं खोल सकी। यहां निकाय चुनाव में 45 में से सीपीएम ने 29 वार्ड जीते थे। भाजपा को 13 और निर्दलीयों को तीन सीटें मिलीं।
इसके बाद सीपीएम के बजरंग लाल सोनी अध्यक्ष बने। नोखा नगर पालिका में, सीपीएम ने 60 के दशक में राजस्थान में चुनाव लड़ना शुरू करने के बाद पहली बार बोर्ड बनाया। बजरंग लाल सोनी चेयरमैन चुने गए।
सीपीएम ने पूरे राजस्थान में 38 वार्ड जीते हैं। इनमें से 29 अकेले नोखा में हैं। यानी करीब 76% जीत सिर्फ एक नगरपालिका से आई। यह आंकड़ा बताता है कि यहां जीत किसी जोड़-तोड़ से नहीं मिली। वोटर ने वार्ड चुनाव में ही सीपीएम को साफ बहुमत दे दिया। नोखा की कहानी यह भी बताती है कि जिले का राजनीतिक मूड एक जैसा होना जरूरी नहीं। बीकानेर शहर में कांग्रेस मजबूत रही, लेकिन नोखा में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस नहीं बल्कि CPM विकल्प बन गई।
मूंडवा में RLP ने कैसे पलटा खेल?
मारवाड़ मूंडवा निकाय प्रमुख के चुनाव में तीसरी ही कहानी सामने आई। यहां हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी अपने दम पर बहुमत में नहीं थी। 25 वार्ड में भाजपा 10 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। आरएलपी के 7, कांग्रेस के तीन और पांच निर्दलीय पार्षद बने थे। बहुमत के लिए 13 वोट चाहिए थे। लेकिन अध्यक्ष चुनाव में RLP की अलका कंदोई ने बाजी मार ली। उन्हें कांग्रेस का समर्थन मिला। आरएलपी और कांग्रेस के मिलाकर 10 पार्षद थे, जबकि अलका को 13 वोट मिले।
भाजपा की अधिकृत उम्मीदवार को अपने 10 पार्षद होने के बावजूद कोई वोट नहीं मिला। हालांकि मतदान गुप्त था, इसलिए किस पार्षद ने किस उम्मीदवार को वोट दिया, इसका दावा नतीजों के आधार पर नहीं किया जा सकता।
आरएलपी के लिए मूंडवा की जीत इसलिए भी अहम है, क्योंकि नागौर हनुमान बेनीवाल की पार्टी का पुराना राजनीतिक इलाका है। आरएलपी ने प्रदेश में छोटे दलों में सबसे ज्यादा 63 वार्ड जीते हैं। यानी आम आदमी पार्टी और सीपीएम के मुकाबले उसका फैलाव बड़ा।
बारां, नोखा और मूंडवा को एक साथ देखने पर तीसरे विकल्प की असली तस्वीर सामने आती। बारां में AAP ने सीधा बहुमत हासिल किया। नोखा में सीपीएम ने एकतरफा स्थानीय बढ़त बनाई। मूंडवा में RLP ने चुनाव बाद के सियासी गणित से बोर्ड बनाया। इसलिए इन नतीजों को एक ही तरह की भाजपा-कांग्रेस विरोधी लहर कहना भी सही नहीं होगा। तीनों जगह स्थानीय चेहरे, संगठन और राजनीतिक समीकरण अलग हैं।
क्या राजस्थान में तीसरा मोर्चा तैयार है?
निकाय चुनावों के नतीजों के बाद यह सबसे बड़ा सवाल है कि कि क्या राजस्थान में तीसरा मोर्चा तैयार हो रहा। जवाब फिलहाल है- तीसरे मोर्चे की दस्तक जरूर है, लेकिन प्रदेशव्यापी ताकत अभी नहीं। कारण आंकड़ों में है। आम आदमी पार्टी की करीब 74% जीत अकेले बारां में है। सीपीएम की करीब 76% जीत नोखा में है।
RLP का मजबूत आधार नागौर और आसपास दिखाई देता है। इनके बीच अभी कोई साझा राजनीतिक मोर्चा भी नहीं। यानी अभी राजस्थान में एक तीसरा मोर्चा नहीं, बल्कि अलग-अलग इलाकों में तीसरे विकल्प के मजबूत आधार जरूर बने हैं।
अब अगला टेस्ट पंचायत चुनाव होगा। गांवों में जातीय समीकरण, स्थानीय उम्मीदवार और व्यक्तिगत पकड़ ज्यादा असर डालते। आरएलपी के लिए नागौर और आसपास अपना आधार बढ़ाने का मौका होगा। आम आदमी पार्टी के सामने बारां शहर की जीत को गांवों तक ले जाने की चुनौती है। सीपीएम को नोखा के संगठन को पंचायत समिति और जिला परिषद तक पहुंचाना होगा।
दिलचस्प बात यह भी है कि नोटा को 1.03 फीसदी वोट मिले, जो इनमें से हर छोटे दल के अलग-अलग वोट शेयर से अधिक है। इसलिए कुछ निकायों में मिली बड़ी जीत को सीधे पूरे राजस्थान में तीसरी राजनीतिक ताकत के उभार के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। हालांकि छोटे दलों के प्रदर्शन को सिर्फ उनके कम प्रदेशव्यापी वोट शेयर से खारिज करना भी तस्वीर का दूसरा हिस्सा छोड़ देना होगा।
छोटी पार्टियों को मिली 170 सीटों का संदेश क्या है?
राजस्थान के 10244 चुनाव वाले वार्डों में छोटे पांच दलों की 170 सीटें BJP और कांग्रेस के विशाल आंकड़े के सामने बहुत बड़ी संख्या नहीं। लेकिन इन्हें सिर्फ 170 मानकर छोड़ देना भी इन नतीजों की राजनीतिक कहानी को अधूरा पढ़ना होगा। आप के लिए बारां-झालावाड़, सीपीएम के लिए नोखा, आरएलपी के लिए नागौर क्षेत्र और भारत आदिवासी पार्टी के लिए दक्षिण राजस्थान के आदिवासी इलाके अलग-अलग राजनीतिक पॉकेट के रूप में सामने आए हैं।
फिलहाल इन दलों की चुनौती साफ है कि अपने मजबूत सियासी टापुओं को राजस्थान के नक्शे पर फैलाना। क्योंकि निकाय चुनाव ने इतना जरूर दिखा दिया है कि भाजपा-कांग्रेस के बाहर जगह खाली नहीं है, लेकिन उस जगह को प्रदेशव्यापी ताकत में बदलने के लिए बारां, नोखा या मूंडवा जैसी जीत को दूसरे शहरों में दोहराना होगा।
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