राजस्थान पंचायत चुनाव: बगावत के डर से भाजपा-कांग्रेस आखिरी वक्त पर खोल सकती हैं टिकटों के पत्ते
समझें क्या है पूरा मामला
- भाजपा और कांग्रेस अधिकांश जगहों पर उम्मीदवारों की सूची अंतिम समय तक सार्वजनिक नहीं करेंगी।
- पहले चरण के नामांकन की आखिरी तारीख 13 अक्टूबर है।
- माना जा रहा है कि टिकट वाले दावेदारों को पहले फोन पर बताया जाएगा।
- सूची नामांकन की अंतिम प्रक्रिया के दौरान ही सार्वजनिक हो सकती है।
- वजह के तौर पर निकाय चुनाव में 30 प्रतिशत वोट निर्दलीय, अन्य दलों और नोटा को जाना बताया गया है।
राजस्थान पंचायत चुनाव टिकट वितरण में इस बार दोनों बड़ी पार्टियां गोपनीयता बरत सकती हैं। टिकट बंटने के बाद बगावत की आशंका को देखते हुए भाजपा और कांग्रेस अधिकांश जगहों पर उम्मीदवारों की सूची अंतिम समय तक सार्वजनिक नहीं करेंगी। यह बात सोर्स के अनुसार सामने आई है।
पंचायत चुनाव के पहले चरण के नामांकन की आखिरी तारीख 13 अक्टूबर है। इसलिए पंचायत समिति और जिला परिषद के टिकटों को लेकर आखिरी वक्त तक रणनीतिक गोपनीयता रखी जा सकती है।
पंचायत चुनाव बगावत की आशंका क्यों बढ़ी?
सोर्स के अनुसार दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट न मिलने से नाराज दावेदारों को संभालने की होगी। पंचायत समिति और जिला परिषद की एक ही सीट पर कई दावेदार सक्रिय रहते हैं।
लंबे समय से इलाके में काम कर रहे नेता और कार्यकर्ता टिकट की उम्मीद रखते हैं। जब एक नाम पर सहमति बनती है, तो दूसरे दावेदार निर्दलीय लड़ने या विरोधी दल में जाने का फैसला कर सकते हैं।
इससे पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को अपने ही खेमे से चुनौती मिलने का खतरा रहता है। यह सोर्स का आकलन है, किसी दल का आधिकारिक बयान नहीं।सवाल यह है कि सूची आखिरी वक्त तक छिपाने से दलों को क्या फायदा मिल सकता है?
पंचायत समिति जिला परिषद टिकट दावेदार क्या कर सकते हैं?
सोर्स के अनुसार अगर सूची पहले जारी हो जाए तो नाराज दावेदारों को समर्थकों के साथ बैठक करने का समय मिल जाता है। वे निर्दलीय नामांकन की तैयारी कर सकते हैं या दूसरे दलों से संपर्क साध सकते हैं। अंतिम समय में सूची जारी होने से ऐसे राजनीतिक समीकरणों को सीमित करने की कोशिश की जा सकती है। इसे संभावित वजह माना जा रहा है, पक्की वजह नहीं।
निकाय चुनाव 30 प्रतिशत वोट निर्दलीय नोटा: क्या है आंकड़ा?
सोर्स में लिखा है कि हाल के निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ निर्दलीय, अन्य पार्टियों और नोटा के पक्ष में 30 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। नोटा यानी इनमें से कोई नहीं का विकल्प। सोर्स में यह नहीं बताया गया कि यह आंकड़ा किस स्तर का है। यह पूरे प्रदेश का है या कुछ जगहों का, यह साफ नहीं है। आंकड़े का स्रोत भी नहीं दिया गया है।
टिकट की सूचना फोन पर भाजपा रणनीति: निकाय चुनाव में क्या हुआ था?
सोर्स के अनुसार भाजपा ने हाल के निकाय चुनाव में टिकट बंटवारे में ऐसी ही रणनीति अपनाई थी। कई जगह प्रत्याशियों को फोन पर टिकट की पुष्टि की गई। फिर उन्हें एक जगह इकट्ठा कर साथ नामांकन के लिए ले जाया गया। पार्टी की उम्मीदवार सूची नामांकन की आखिरी समय-सीमा से कुछ घंटे पहले सामने आई थी।
निकाय चुनाव फॉर्मूला पंचायत चुनाव में कितना काम आएगा?
सोर्स के अनुसार सूची का प्रसार मुख्य रूप से सोशल मीडिया ग्रुपों के जरिए हुआ था। कई जगह यह साफ नहीं था कि सामने आई सूची पार्टी की आधिकारिक सूची है या नहीं।
यानी इस तरीके से उलझन भी बनी थी। निकाय चुनाव फॉर्मूला पंचायत चुनाव में अपनाने पर वही सवाल फिर उठ सकता है। सोर्स में यह नहीं बताया गया कि इस फॉर्मूले से बगावत कितनी रुकी। अब नजर इस पर रहेगी कि 13 अक्टूबर तक दोनों दल कब और कैसे सूची सार्वजनिक करते हैं। यह भी देखना होगा कि टिकट न मिलने पर कितने दावेदार निर्दलीय नामांकन करते हैं।
यह खबर क्यों जरूरी है:
पंचायत चुनाव गांव की सरकार बनाने की प्रक्रिया है। टिकट बंटवारे का तरीका सीधे मतदाताओं को मिलने वाले विकल्पों से जुड़ा है। अगर उम्मीदवारों की सूची आखिरी वक्त पर आती है, तो मतदाता और कार्यकर्ता कम समय में जानकारी पाते हैं। यह जानना जरूरी है कि पार्टियों की रणनीति पारदर्शिता पर कैसा असर डालती है। बगावत से निर्दलीय उम्मीदवार बढ़ने पर चुनावी मुकाबले की तस्वीर बदल सकती है।