राजस्थान पंचायत चुनाव: सांसद राजकुमार रोत के गढ़ में चाचा हारे, कई दिग्गजों को झटका

Ashish Bhardwaj | Oct 26, 2026, 17:26 IST
सांसद राजकुमार रोत
डूंगरपुर जिले में ग्राम पंचायत चुनाव के नतीजों ने कई बड़े नेताओं के सियासी समीकरण बिगाड़ दिए हैं। भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के सांसद राजकुमार रोत को अपनी ही गृह पंचायत खरवरखुनिया में झटका लगा। यहां उनके चाचा सोहनलाल सरपंच का चुनाव हार गए। भगवतीलाल खराड़ी ने उन्हें 15 वोटों से हराया। दूसरी ओर, सागवाड़ा विधायक शंकरलाल डेचा के परिवार ने अपनी राजनीतिक पकड़ बरकरार रखी।

पंचायत में सरपंच के चुनाव ने कई दिग्गज नेताओं को आइना दिखा दिया है। इस बार चुनाव में सबसे बड़ा झटका सांसद राजकुमार रोत (Rajkumar Roat) को लगा है। रोत की अपनी पंचायत खरवरखुनिया में उनके चाचा सोहनलाल को हार का सामना करना पड़ा।



खरवरखुनिया में चाचा की हार से चर्चा में आए रोत

डूंगरपुर जिले की खरवरखुनिया ग्राम पंचायत में भगवतीलाल खराड़ी ने सोहनलाल को 15 वोटों से हराया। सोहनलाल सांसद राजकुमार रोत के चाचा हैं। इस नतीजे को रोत के राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से अहम माना जा रहा है।



सांसद की गृह पंचायत के आसपास की सांसरपुर, पाड़ली, भिंडा और झोंथरी पंचायतों में भी बीएपी समर्थित प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा। सीमलवाड़ा और भंडारी पंचायत समितियों में भी पार्टी को पिछले चुनावों की तुलना में नुकसान हुआ।



बीएपी को एक और झटका झोंथरी पंचायत समिति की पूर्व प्रधान अनिता रोत की हार से लगा। वे करावाड़ा ग्राम पंचायत से सरपंच का चुनाव हार गईं। हालांकि, तस्वीर हर जगह एक जैसी नहीं रही। चीखली पंचायत समिति में बीएपी समर्थित प्रत्याशियों को अच्छी बढ़त मिली। यहां भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा।



डेचा परिवार का दबदबा बरकरार

सागवाड़ा विधायक शंकरलाल डेचा के परिवार के लिए चुनाव के नतीजे राहत लेकर आए। उनके बेटे राहुल डामोर ने डेचा ग्राम पंचायत से सरपंच का चुनाव जीत लिया। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी राकेश को 340 वोटों से हराया।



इस जीत के साथ डेचा परिवार का करीब तीन दशक पुराना राजनीतिक प्रभाव कायम रहा। उपलब्ध चुनाव परिणामों के अनुसार, डेचा पंचायत में परिवार ने लगातार सातवीं बार सरपंच पद पर जीत दर्ज की।



हालांकि, परिवार को सागवाड़ा के पास घोटाद ग्राम पंचायत में झटका लगा। यहां विधायक के दामाद प्रकाश महज चार वोटों से चुनाव हार गए। यानी एक ही परिवार से जुड़े उम्मीदवारों के नतीजे अलग-अलग रहे।



पूर्व सांसद के परिवार को भी हार

सीमलवाड़ा पंचायत में भी बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिला। पूर्व सांसद ताराचंद भगोरा के भतीजे की बहू निमिषा भगोरा सरपंच का चुनाव हार गईं। निमिषा सीमलवाड़ा पंचायत समिति की पूर्व प्रधान रह चुकी हैं। उन्हें कलावती ने 600 वोटों के बड़े अंतर से हराया।



भाजपा के लिए भी कुछ नतीजे झटका देने वाले रहे। भाजपा से प्रधान रहे ईश्वरलाल सरपोटा के भाई गोवाड़ी ग्राम पंचायत से चुनाव हार गए। वहीं, भाजपा के मंडल अध्यक्ष और सीसीबी चेयरमैन रह चुके गोवर्धन पाटीदार वार्ड पंच का चुनाव भी नहीं जीत पाए। वे तीसरे स्थान पर रहे। इन नतीजों ने दिखाया कि स्थानीय चुनाव में राजनीतिक पद और पुराने रसूख के बावजूद मतदाताओं का समर्थन हासिल करना जरूरी है।




एक वोट ने बदल दी चुनावी तस्वीर

इन चुनावों में सबसे दिलचस्प मुकाबले वे रहे, जिनका फैसला सिर्फ एक वोट से हुआ। पाड़वा पंचायत समिति की माविता ग्राम पंचायत में मंजुला ने जयश्री को महज एक वोट से हराया। इसी तरह चीखली पंचायत समिति की कोचरी ग्राम पंचायत में मानसिंह ने जयसिंह पारगी को एक वोट से शिकस्त दी।



इन बेहद करीबी मुकाबलों ने एक बार फिर साबित किया कि पंचायत चुनाव में हर वोट की अहमियत होती है। एक वोट की कमी किसी उम्मीदवार को जीत से दूर कर सकती है।




स्थानीय चुनावों ने दिए बड़े सियासी संकेत

डूंगरपुर जिले के इन नतीजों में कहीं बड़े नेताओं के परिवारों को हार मिली, तो कहीं पुराने राजनीतिक प्रभाव ने अपनी पकड़ बनाए रखी। सांसद राजकुमार रोत के चाचा और पूर्व प्रधान अनिता रोत की हार बीएपी के लिए झटका रही। वहीं, विधायक शंकरलाल डेचा के बेटे की जीत ने उनके परिवार का दबदबा कायम रखा।



इन परिणामों को जिले की राजनीति में स्थानीय समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, ग्राम पंचायत चुनाव के नतीजों के आधार पर पूरे जिले या विधानसभा क्षेत्र में किसी पार्टी की लोकप्रियता का अंतिम निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। ये परिणाम मुख्य रूप से स्थानीय उम्मीदवारों, उनके जनसंपर्क और पंचायत स्तर के समीकरणों की तस्वीर दिखाते हैं।



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