पंचायत—निकाय चुनाव से जुड़ी अवमानना याचिका पर टली सुनवाई, हाई कोर्ट ने यह बताया कारण?
News In Short
- राजस्थान पंचायत-निकाय चुनाव को लेकर अवमानना याचिका पर हाई कोर्ट में टली सुनवाई।
- पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने राज्य चुनाव आयोग के खिलाफ दायर की थी अवमानना याचिका।
- सुनवाई 26 मई तक टाल दी गई, क्योंकि सरकार और आयोग की अर्जी पर फैसला रिजर्व है। ।
- हाई कोर्ट ने 15 अप्रैल की समय सीमा से बाहर मतदाता सूची जारी करने का कारण पूछा।
- सरकार और आयोग ने ओबीसी रिजर्वेशन के कारण चुनाव टालने के तर्क दिए।
News In Detail
राजस्थान में पंचायत-निकाय चुनाव में हो रही देरी को लेकर दायर अवमानना याचिका पर हाई कोर्ट में सुनवाई टल गई है। जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की बैंच में पूर्व विधायक संयम लोढ़ा, गिर्राज सिंह देवंदा और अन्य की याचिका पर सुनवाई होनी थी।
बैंच ने सरकार और राज्य चुनाव आयोग के चुनाव टालने के प्रार्थना पत्र पर फैसला रिजर्व होने के कारण सुनवाई 26 मई तक टाल दी है।
पिछली सुनवाई और नोटिस
पिछली सुनवाई में कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग और चुनाव आयुक्त को अवमानना नोटिस जारी किए थे। अदालत ने आयोग से पूछा था कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का कार्यक्रम तय समय सीमा से बाहर कैसे जारी किया गया।
जानबूझकर चुनाव टालने के आरोप
अवमानना याचिका में पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने आरोप लगाया है कि सरकार और चुनाव आयोग जानबूझकर चुनाव टाल रहे हैं। यह हाई कोर्ट के आदेश की सीधे तौर पर अवमानना है।
मतदाता सूची का जारी कार्यक्रम
राज्य चुनाव आयोग ने पंचायत-निकाय चुनाव के लिए 22 अप्रैल तक फाइनल मतदाता सूची जारी करने का कार्यक्रम तय किया है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि चुनाव हाईकोर्ट द्वारा तय 15 अप्रैल की समय सीमा में पूरे नहीं हो सकते।
सरकार और चुनाव आयोग का प्रार्थना पत्र
प्रदेश में पंचायत और निकाय चुनाव टालने को लेकर राज्य सरकार और चुनाव आयोग ने प्रार्थना पत्र दायर किया। 11 मई को राजस्थान हाई कोर्ट में सुनवाई हुई और कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया।
सरकार ने प्रार्थना पत्र में हर माह की परिस्थितियां बताते हुए दिसंबर तक चुनाव टालने की अपील की थी। चुनाव आयोग ने भी अपनी एप्लीकेशन में ओबीसी रिजर्वेशन के निर्धारण से पहले चुनाव कराना संभव नहीं होने के सरकारी तर्कों का समर्थन किया।
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