राजस्थान में 9,643 पटवार भवनों की मरम्मत के लिए सिर्फ 37 लाख, एक भवन के हिस्से में महज ₹384
9,643 पटवार भवनों के लिए सिर्फ 37 लाख रुपये
राजस्थान सरकार और राजस्व मंडल अजमेर ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए प्रदेशभर के पटवार भवनों के रखरखाव और मरम्मत के लिए बजट जारी किया है। लेकिन बजट की कुल राशि और भवनों की संख्या को देखें तो प्रति भवन मिलने वाली रकम बेहद कम है।
प्रदेश के 34 जिलों में कुल 9,643 पटवार भवन बताए गए हैं। इनके लिए 37 लाख रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है। इस हिसाब से एक भवन के हिस्से में औसतन करीब 383.70 रुपये आते हैं।
आज के समय में इस रकम से भवन की बड़ी मरम्मत कराना तो दूर, छोटे-मोटे काम कराना भी मुश्किल नजर आता है। सीमेंट, पेंट और मजदूरी का खर्च देखते हुए यह राशि बेहद कम है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिन भवनों को मरम्मत की ज्यादा जरूरत है, वहां काम कैसे पूरा होगा?
राजस्व मंडल का कहना है कि यह राशि शुरुआती चरण के लिए जारी की गई है। सभी भवनों के लिए अंतिम बजट आवंटन नहीं हुआ है। ऐसे में आगे जरूरत के हिसाब से अतिरिक्त राशि जारी होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
जयपुर में 378 और भीलवाड़ा में सिर्फ 214 रुपये का औसत
जिलेवार बजट के आंकड़े देखें तो स्थिति और साफ होती है। जयपुर के 565 पटवार भवनों के लिए 2 लाख रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इस हिसाब से प्रति भवन करीब 378 रुपये आते हैं।
वहीं, भीलवाड़ा के 466 पटवार भवनों के लिए 1 लाख रुपये का बजट बताया गया है। यहां एक भवन के हिस्से में औसतन करीब 214 रुपये आते हैं। इतनी कम राशि में मरम्मत के जरूरी काम पूरे करना बड़ी चुनौती हो सकती है।
जानकारी के मुताबिक, जयपुर और जोधपुर को 2-2 लाख रुपये स्वीकृत किए गए हैं। अन्य जिलों को 1-1 लाख रुपये दिए गए हैं। इस आवंटन को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि जर्जर भवनों की वास्तविक जरूरत के हिसाब से बजट कितना पर्याप्त है।
जिला स्तर पर राशि का इस्तेमाल प्राथमिकता के आधार पर किया जाना है। इसलिए सभी भवनों पर बराबर पैसा खर्च होना जरूरी नहीं है। जिन भवनों में मरम्मत की ज्यादा जरूरत होगी, वहां पहले काम कराने की बात कही गई है।
कई जगह पटवार भवनों की हालत खराब
पटवार भवन ग्रामीण इलाकों में जमीन से जुड़े कामकाज का अहम केंद्र होते हैं। यहां किसान नामांतरण, जमाबंदी, गिरदावरी और राजस्व से जुड़े दूसरे कामों के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में भवनों की हालत खराब होने का सीधा असर आम लोगों और कर्मचारियों पर पड़ता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भीलवाड़ा जिले के सेरिया गांव में पटवार भवन की स्थिति काफी खराब है। यहां भवन की दीवार तक ढह गई है। ऐसी हालत में इमारत की सुरक्षा और वहां बैठकर काम करने को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जयपुर के सांगानेर गेट स्थित पटवार भवन की हालत भी जर्जर बताई गई है। यहां आने वाले लोगों और कर्मचारियों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। अगर समय रहते जरूरी मरम्मत नहीं होती है, तो समस्या और बढ़ सकती है।
प्रदेश के दूसरे इलाकों में भी पटवार भवनों के रखरखाव की जरूरत है। लेकिन उपलब्ध बजट को देखते हुए यह सवाल उठ रहा है कि मरम्मत के काम किस स्तर तक कराए जा सकेंगे।
किसानों को भी उठानी पड़ती है परेशानी
पटवार भवनों में रोजाना बड़ी संख्या में किसान अपने जमीन संबंधी कामों के लिए पहुंचते हैं। नामांतरण, जमाबंदी और गिरदावरी जैसे कामों के लिए इन कार्यालयों की अहम भूमिका रहती है।
जब भवन जर्जर होते हैं या वहां बुनियादी सुविधाओं की कमी रहती है, तो लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कर्मचारियों के लिए भी ऐसी इमारतों में बैठकर काम करना परेशानी भरा हो सकता है।
खासकर उन भवनों में, जहां दीवारों में दरारें हैं या कोई हिस्सा ढह चुका है, वहां सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ जाती है। ऐसे में मरम्मत के लिए पर्याप्त बजट और जरूरी कामों की पहचान करना अहम हो जाता है। सभी पटवार भवनों की स्थिति एक जैसी नहीं है। इसी वजह से प्रशासन को पहले उन भवनों की पहचान करनी होगी, जहां तत्काल मरम्मत की जरूरत है।
जिला कलेक्टर तय करेंगे कहां होगा काम
राजस्व मंडल के रजिस्ट्रार महावीर प्रसाद ने बजट को लेकर स्थिति स्पष्ट की है। उनका कहना है कि प्रदेश के सभी पटवार भवनों के लिए एक साथ या अंतिम रूप से बजट जारी नहीं किया गया है। सरकार ने शुरुआती चरण में अपने विवेक से यह राशि जारी की है।
रजिस्ट्रार के मुताबिक, जिला कलेक्टर जरूरत और प्राथमिकता के आधार पर भवनों का चयन करेंगे। उपलब्ध राशि से सबसे जरूरी काम कराए जाएंगे। जिन भवनों में मरम्मत की ज्यादा जरूरत होगी, उनके प्रस्ताव जिला कलेक्टर के माध्यम से राजस्व मंडल को भेजे जाएंगे।
इसका मतलब है कि फिलहाल जारी राशि को प्राथमिक चरण का बजट माना जा रहा है। जिन भवनों की हालत ज्यादा खराब है, उनके लिए आगे अतिरिक्त बजट की मांग की जा सकती है। अब यह देखना अहम होगा कि जिला स्तर पर किस तरह भवनों का चयन किया जाता है और कितने पटवार भवनों में मरम्मत का काम शुरू हो पाता है।
बजट आवंटन पर उठ रहे सवाल
37 लाख रुपये की कुल राशि और 9,643 भवनों की संख्या के बीच का अंतर चर्चा का विषय बन गया है। औसतन 384 रुपये प्रति भवन का आंकड़ा सामने आने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि मरम्मत की वास्तविक लागत का आकलन किस आधार पर किया गया है।
एक तरफ कई भवनों की हालत खराब बताई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ शुरुआती बजट सीमित है। ऐसे में प्रशासन के सामने चुनौती होगी कि उपलब्ध राशि को सबसे जरूरी कामों पर कैसे खर्च किया जाए।
दूसरी ओर, राजस्व मंडल ने साफ किया है कि यह अंतिम आवंटन नहीं है। इसलिए पूरे वित्तीय वर्ष में मरम्मत के लिए कुल कितनी राशि उपलब्ध होगी, यह आगे के फैसलों पर निर्भर करेगा।
आगे क्या?
अब जिला कलेक्टरों को पटवार भवनों की हालत के हिसाब से प्राथमिकताएं तय करनी होंगी। जिन इमारतों में दीवारें ढह चुकी हैं या मरम्मत की तत्काल जरूरत है, वहां पहले काम कराना जरूरी होगा। इसके साथ ही जिन भवनों में बड़े स्तर पर मरम्मत की जरूरत है, उनके प्रस्ताव राजस्व मंडल को भेजे जा सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि शुरुआती 37 लाख रुपये से कितने भवनों में काम हो पाएगा और क्या आगे अतिरिक्त बजट जारी किया जाएगा। फिलहाल सरकार की ओर से जारी राशि को अंतिम बजट नहीं बताया गया है। आने वाले समय में जिला स्तर पर होने वाली कार्रवाई से साफ होगा कि यह बजट जर्जर पटवार भवनों की हालत सुधारने में कितना कारगर साबित होता है।