क्या राजस्थान पुलिस का डेटा हैकर्स के पास पहुंचा? 86 लाख ईमेल और 59 हजार मोबाइल नंबर होने का दावा
5,926 मेलबॉक्स और 86.3 लाख ईमेल हैक होने का दावा
Scarlettgroup के दावे के मुताबिक, उसके पास 5,926 मेलबॉक्स में मौजूद करीब 86.3 लाख ईमेल का डेटा है। इसके अलावा 7.83 लाख से ज्यादा अलग-अलग ईमेल एड्रेस, 70,301 पहचान रिकॉर्ड और 59,460 मोबाइल नंबर होने की बात कही गई है।
दावे में 22,686 अटैचमेंट का भी जिक्र है, जिनका कुल आकार करीब 6.63 GB बताया गया है। कथित डेटा में FIR, ई-केवाईसी (eKYC), गवाहों के बयान और सरकारी ईमेल से जुड़े दस्तावेज शामिल होने की बात कही गई है। हालांकि, इनमें कितने रिकॉर्ड असली हैं, कितने पुराने हैं और कितने एक ही व्यक्ति से जुड़े हैं, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
वरिष्ठ अधिकारियों के ईमेल और VPN भी निशाने पर
हैकर्स ने सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग (DoIT&C) से जुड़े डेटा की बिक्री का दावा भी किया है। कथित सूची में वरिष्ठ अधिकारियों के 1,065 मेलबॉक्स, 69 लॉगिन क्रेडेंशियल, 21 VPN लॉगिन और 64 VPN सर्टिफिकेट शामिल बताए गए हैं।
यदि ये जानकारियां असली हैं, तो मामला सिर्फ ईमेल लीक तक सीमित नहीं रहेगा। लॉगिन जानकारी का दुरुपयोग कर सरकारी खातों या नेटवर्क तक अनधिकृत पहुंच बनाने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन अभी यह साबित नहीं हुआ है कि इन क्रेडेंशियल के जरिए किसी सरकारी सिस्टम में प्रवेश किया गया या नहीं।
पुलिसकर्मियों को पासवर्ड बदलने की सलाह
मामला सामने आने के बाद सरकारी ईमेल और डिजिटल सिस्टम की सुरक्षा को लेकर सख्ती बढ़ाई गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पुलिसकर्मियों को ईमेल के पासवर्ड बदलने और मोबाइल-लैपटॉप सहित उपकरणों को अपडेट रखने के निर्देश दिए गए हैं। 14 अक्टूबर को इस संबंध में एडवाइजरी जारी किए जाने की बात भी सामने आई है।
सरकारी ईमेल के इस्तेमाल पर प्रतिबंध
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान पुलिस मुख्यालय ने सरकारी ईमेल के इस्तेमाल पर भी नए प्रतिबंध लगाए हैं। अब पुलिसकर्मी अपनी आधिकारिक ईमेल आईडी से अमेजन, फ्लिपकार्ट और जोमैटो जैसी निजी वेबसाइटों पर खाते नहीं बना सकेंगे। पहले से ऐसे खातों से जुड़ी सरकारी ईमेल आईडी हटाने के निर्देश भी दिए गए हैं।
पुलिस मुख्यालय ने FIR, केस डायरी, गवाहों के बयान, बैंक विवरण और जांच रिपोर्ट जैसे दस्तावेजों तक पहुंच अधिकृत कर्मचारियों तक सीमित रखने पर भी जोर दिया है। ऐसे दस्तावेजों को बिना अनुमति डाउनलोड करने या निजी ईमेल पर भेजने पर रोक लगाई गई है।
फर्जी ईमेल और ठगी का खतरा
साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि कथित डेटा लीक सही साबित होता है, तो उसका इस्तेमाल लोगों को ठगी के जाल में फंसाने के लिए किया जा सकता है। अपराधी किसी व्यक्ति का नाम, मोबाइल नंबर या केस से जुड़ी जानकारी लेकर भरोसेमंद दिखने वाला फर्जी ईमेल या संदेश भेज सकते हैं।
यदि किसी पुलिसकर्मी के लॉगिन क्रेडेंशियल भी बाहर गए हैं, तो उसके खाते में मौजूद दस्तावेजों तक पहुंचने की कोशिश हो सकती है। कमजोर पासवर्ड या एक ही पासवर्ड का कई जगह इस्तेमाल खतरा बढ़ा सकता है। हालांकि, अभी यह पुष्टि नहीं हुई है कि कथित डेटा में कितने आम नागरिकों, पुलिसकर्मियों या सरकारी अधिकारियों की जानकारी है।
रैनसमवेयर जैसे हमलों में अपराधी डेटा चुराकर सार्वजनिक करने की धमकी भी दे सकते हैं। लेकिन राजस्थान पुलिस के इस मामले में सिस्टम लॉक किए जाने, फिरौती मांगे जाने या किसी सेवा के ठप होने की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है।
CERT-In को सूचना, जांच से खुलेगा राज
साइबर डीआईजी शांतनु कुमार के अनुसार, मामले की जानकारी भारतीय कंप्यूटर आपात प्रतिक्रिया टीम (CERT-In) को दी गई है। दिल्ली से तकनीकी टीम के जांच में शामिल होने की बात भी कही गई है। जांच में यह पता लगाना जरूरी होगा कि क्या वास्तव में किसी सरकारी सिस्टम में अनधिकृत प्रवेश हुआ, FIR और CDR की प्रतियां कहां से आईं और कितने रिकॉर्ड प्रभावित हुए।
Scarlettgroup से कथित संपर्क और 100 से 200 डॉलर में समझौते की कोशिश की जानकारी भी सामने आई है, लेकिन इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। फिलहाल जांच का सबसे अहम सवाल यही है कि हैकर्स के पास वास्तविक सरकारी डेटा है या वे दबाव बनाने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर दावा कर रहे हैं। असली स्थिति तकनीकी जांच और डिजिटल साक्ष्यों से ही सामने आएगी।