राजस्थान पुलिस में सुधार का नया खाका, 20 थानों से होगी शुरुआत
News In Short
- राजस्थान पुलिस में अब इन्वेस्टिगेशन और लॉ-एंड-ऑर्डर की अलग-अलग विंग होंगी।
- 20 थानों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू होगा, जांच अधिकारी वीआईपी ड्यूटी से रहेंगे दूर।
- अभी एक जांच अधिकारी के पास 40 से 70 मामले होते हैं, जिससे गुणवत्ता प्रभावित होती है।
- 2006 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 20 साल बाद भी राजस्थान में नहीं हुआ था अमल।
- नई व्यवस्था के लिए 935 नए पद सृजित करने की सिफारिश की गई है।
News In Detail
राजस्थान पुलिस में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या पर हाई कोर्ट ने नाराजगी जताई थी। इस पर अब पुलिस में बड़े बदलाव की तैयारी है। पुलिस थानों में अब इन्वेस्टिगेशन, लॉ एंड ऑर्डर और एडमिनिस्ट्रेटिव की अलग-अलग विंग होंगी।
पुलिस ने राजस्थान हाई कोर्ट में इसका प्लान पेश किया है। जस्टिस अनूप कुमार ढंड की अदालत ने पुलिस के प्लान को रिकॉर्ड पर लेते हुए 21 जुलाई को मामले की अगली सुनवाई तय की है।
हाई कोर्ट ने क्यों दिए थे निर्देश?
हाई कोर्ट ने लंबे समय तक केस की जांच पूरी नहीं होने और पेंडेंसी बढ़ने पर पुलिस में इन्वेस्टिगेशन और लॉ एंड ऑर्डर की अलग-अलग विंग बनाने का निर्देश दिया था। कोर्ट के सामने यह बात आई थी कि एक ही पुलिसकर्मी के पास इन्वेस्टिगेशन, वीआईपी ड्यूटी, भीड़ नियंत्रण और कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है।
इससे जांच प्रभावित होती है और मामलों में अनावश्यक देरी होती है। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारियों को नियमित कानून-व्यवस्था ड्यूटी, वीआईपी सुरक्षा, चुनाव ड्यूटी और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों से मुक्त रखा जाना चाहिए।
क्या है नया प्लान?
पुलिस ने चार राज्यों (केरल, पंजाब, दिल्ली और बिहार) के मॉडल की स्टडी करके यह प्लान तैयार किया है। इसके तहत राज्य के 20 चयनित पुलिस थानों में पायलट प्रोजेक्ट लागू किया जाएगा।
प्रत्येक थाने में जांच, कानून-व्यवस्था और प्रशासन के लिए अलग-अलग इकाइयां बनाई जाएंगी। इससे जांच अधिकारी पूरी तरह से अपने केस पर फोकस कर पाएंगे और कानून-व्यवस्था के काम में उनका समय नहीं लगेगा।
एक जांच अधिकारी के पास 40 से 70 मामले
अदालत में पेश रिपोर्ट में हैरान करने वाले आंकड़े सामने आए हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध और संपत्ति संबंधी कई मामलों में दोष सिद्ध करने की दर केवल 40 से 50 प्रतिशत के बीच है। साइबर अपराध, आर्थिक अपराध और एनडीपीएस से जुड़े मामलों की जांच अक्सर दो साल से अधिक समय तक लंबित रहती है।
रिपोर्ट के अनुसार कई शहरी थानों में एक जांच अधिकारी के पास एक समय में 40 से 70 तक सक्रिय मामले होते हैं। इससे जांच की गुणवत्ता प्रभावित होती है और मामलों का निस्तारण लंबित होता जाता है।
935 नए पदों की सिफारिश
इस नई व्यवस्था को लागू करने के लिए अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता होगी। समिति ने पायलट प्रोजेक्ट के लिए चयनित थानों में लगभग 935 नए पद सृजित करने की सिफारिश की है।
साथ ही साइबर, फोरेंसिक और वित्तीय अपराधों के विशेषज्ञों को अनुबंध के आधार पर नियुक्त करने का सुझाव भी दिया है। इससे जांच में तकनीकी मदद मिलेगी और मामलों का जल्द निस्तारण हो सकेगा।
20 साल बाद भी राजस्थान में नहीं हुआ था अमल
हाईकोर्ट ने आदेश में साल 2006 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ फैसले का भी उल्लेख किया था। इस फैसले में पुलिस सुधारों के तहत जांच और कानून-व्यवस्था को अलग करने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने कहा था कि दो दशक बीत जाने के बावजूद राजस्थान में इस दिशा में प्रभावी अमल नहीं हुआ। अब कोर्ट ने सरकार से इस दिशा में ठोस कदम उठाने को कहा है।
लैब की कमी पर भी जताई चिंता
अदालत ने राज्य में आधुनिक जांच प्रयोगशालाओं की कमी पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में वैज्ञानिक जांच के लिए अन्य राज्यों पर निर्भरता के कारण देरी होती है, जिससे अपराधियों को लाभ मिलता है। कोर्ट ने राज्य में अत्याधुनिक जांच लैब स्थापित करने और तकनीकी संसाधनों को मजबूत करने पर जोर दिया।
FAQ
- पुलिस सुधारों के तहत जांच और कानून-व्यवस्था को अलग करने का ऐतिहासिक आदेश सुप्रीम कोर्ट ने किस वाद में दिया था?
यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2006 के प्रसिद्ध प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ वाद में दिया था।
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