निजी अस्पतालों के आगे बेबस हो रही सरकार, लुट रहे मरीज, बात-बात पर कर रहे हड़ताल
योगेंद्र योगी@जयपुर
चिकित्सा जगत में हिप्पोक्रेटिक ओथ (चरक शपथ) का स्थान सर्वोच्च है। एक चिकित्सक अपनी डिग्री प्राप्त करते समय मानवता की सेवा, बिना भेदभाव के उपचार और मरीजों की जान बचाने की शपथ लेता है। लेकिन राजस्थान में यह पवित्र शपथ निजी अस्पतालों के संचालकों के स्वार्थों की भेंट चढ़ती दिखाई दे रही है। हाल ही में जयपुर के निविक अस्पताल प्रकरण ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या सरकारों की लगाम निजी अस्पताल प्रबंधकों के हाथ में है?
अपराध के बचाव में उतरा चिकित्सा जगत
जयपुर के निविक अस्पताल के निदेशक डॉ. सोमदेव बंसल की गिरफ्तारी ने चिकित्सा क्षेत्र की नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अक्टूबर 2025 को जितेन्द्र कुमार शर्मा ने अपनी मां शशि शर्मा के इलाज में धोखाधड़ी और लापरवाही का मामला दर्ज कराया। इसमें बिना रसीद लाखों की वसूली, आरजीएचएस (RGHS) योजना में फर्जीवाड़ा और दस्तावेजों में हेराफेरी का आरोप लगाया।
एफएसएल (FSL) जांच और आरजीएचएस कार्यालय की पड़ताल में यह प्रमाणित हुआ कि निविक अस्पताल ने एक ही सहमति पत्र पर काट-छांट कर बार-बार डिस्चार्ज और भर्ती दिखाया।
हड़ताल का औचित्य?
हैरानी की बात यह है कि जब भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के आरोप वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित पाए गए, तब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) राजस्थान ने आरोपी डॉ. सोमदेव के समर्थन में 24 घंटे की हड़ताल का ऐलान कर दिया। 14-15 अप्रैल 2026 को प्रदेश के लाखों मरीज इलाज के लिए भटकते रहे। क्या एक आपराधिक आरोपी का बचाव करना चिकित्सा धर्म है? यह सवाल आज प्रदेश की जनता पूछ रही है।
ब्लैकमेल की राजनीति और मरीजों की बलि
निजी अस्पतालों द्वारा अपनी मांगों को मनवाने के लिए हड़ताल को हथियार बनाना एक खतरनाक परिपाटी बन गई है। यह पहली बार नहीं है जब मरीजों को बलि का बकरा बनाया गया हो।
26 मार्च 2026 को राजस्थान एलायंस ऑफ ऑल हॉस्पिटल एसोसिएशन ने आरजीएचएस के बकाया भुगतान में देरी का हवाला देकर कैशलेस सेवाएं बंद कर दीं।
करीब 700 अस्पतालों और 5 हजार डॉक्टरों ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए आर्थिक मोर्चा खोला। यद्यपि भुगतान में देरी एक प्रशासनिक विफलता हो सकती है, लेकिन उसका खामियाजा उन मरीजों ने भुगता जो सरकारी योजनाओं के भरोसे इलाज कराने पहुंचे थे।
राइट टू हेल्थ (RTH) का विरोध
अप्रैल 2023 में राजस्थान ने राइट टू हेल्थ एक्ट लाकर देश में एक मिसाल पेश करने की कोशिश की, लेकिन निजी डॉक्टरों के उग्र विरोध ने सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया। परिणाम यह हुआ कि सरकार को बिल में संशोधन करना पड़ा।
50 बेड से कम वाले मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल और जिन्होंने सरकार से कोई रियायत नहीं ली, उन्हें इस दायरे से बाहर कर दिया गया। यह निजी लॉबी की एक बड़ी जीत और आम जनता की बड़ी हार थी।
सरकारों का आत्मसमर्पण
राजस्थान में स्वास्थ्य के अधिकार और निजी अस्पतालों की मनमानी रोकने के लिए कानून तो बने, लेकिन वे केवल कागजों तक सीमित रहे। मार्च 2023 में राजस्थान राइट टू हेल्थ कानून पारित होने के बावजूद इसके नियम (Rules) आज तक नहीं बन पाए हैं। नियमों के अभाव में यह कानून एक बिना धार वाली तलवार की तरह है। 6 जनवरी 2026 को राजस्थान हाई कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए नोटिस जारी किया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ढाई साल बाद भी नियमों का न बनना सरकार की मंशा पर सवाल उठाता है।
क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट: 15 साल का इंतजार
केंद्र सरकार ने 2008 में यह कानून बनाया, राजस्थान विधानसभा ने 2011 में इसे पारित किया। लेकिन 15 साल बीत जाने के बाद भी यह लागू नहीं हो सका।
इस कानून के लागू होने से निजी अस्पतालों को अपना पंजीकरण पारदर्शी रखना होगा, स्टाफ की योग्यता सार्वजनिक करनी होगी और मनमानी वसूली पर सरकार का नियंत्रण होगा। निजी लॉबी ने ब्यूरोक्रेसी के साथ मिलकर इस कानून को 'ठंडे बस्ते' में डाल रखा है।
अफसरों और अस्पताल संचालकों का नेक्सस
यह कड़वा सच है कि निजी अस्पतालों के प्रबंधक केवल डॉक्टर नहीं, बल्कि प्रभावशाली उद्यमी और राजनीतिक रसूख रखने वाले लोग हैं।
जब भी कोई सख्त कानून बनने लगता है, नौकरशाही के गलियारों में संशोधनों का दौर शुरू हो जाता है। राजनीतिक दलों को मिलने वाला सहयोग अक्सर इन कानूनों के क्रियान्वयन में आड़े आता है। चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों ही दलों ने समय-समय पर इस ताकतवर लॉबी के सामने घुटने टेके हैं।
निजी क्षेत्र के डॉक्टरों की विवशता
विश्लेषण का एक पहलू यह भी है कि हर डॉक्टर मानवता का दुश्मन नहीं है। लेकिन निजी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों के प्रबंधक अपने अधीन काम करने वाले डॉक्टरों को हड़ताल के लिए विवश करते हैं। बिना प्रबंधन की अनुमति के कोई भी डॉक्टर कार्य बहिष्कार नहीं कर सकता। इस प्रकार, सेवाभावी डॉक्टर भी इस कॉर्पोरेट खेल का हिस्सा बनने को मजबूर हो जाते हैं।
समाधान की राह क्या है?
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था वर्तमान में एक चौराहे पर खड़ी है। एक तरफ निजी क्षेत्र का बढ़ता वर्चस्व है, तो दूसरी तरफ आम आदमी का अपने जीवन के अधिकार के लिए संघर्ष। ऐसे में सरकार को ये आवश्यक कदम उठाए जाने की जरूरत है।
नियमों का तत्काल निर्माण: आरटीएच (RTH) और क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के नियमों को बिना किसी दबाव के तुरंत अधिसूचित किया जाना चाहिए।
जवाबदेही तय हो: चिकित्सा क्षेत्र में हड़ताल को 'अत्यावश्यक सेवा अनुरक्षण कानून' (ESMA) के तहत कड़ाई से नियंत्रित किया जाए।
पारदर्शिता: निजी अस्पतालों के लिए रेट लिस्ट और सुविधाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन अनिवार्य हो।
स्वतंत्र नियामक: एक ऐसी स्वतंत्र बॉडी का गठन हो जहाँ मरीज बिना किसी डर के अपनी शिकायत दर्ज करा सके और जिस पर राजनीतिक दबाव न हो।
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