वन अधिकार पट्टों के 66 हजार आवेदन खारिज, पांच जिले में एक भी पट्टा नहीं, सरकार का दोबारा समीक्षा करने से इनकार
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- राजस्थान में 66000 से अधिक आदिवासियों के वन अधिकार दावे खारिज।
- आदिवासी जिले प्रतापगढ़ में सर्वाधिक 22 हजार से अधिक दावे हुए खारिज।
- प्रदेश के पांच जिलों में आदिवासियों को एक भी पट्टा आवंटित नहीं।
- राजस्थान सरकार का खारिज आवेदनों पर फिर से विचार करने से इनकार।
- आदिवासी संगठनों ने खारिज दावों की फिर से समीक्षा करने की लगाई गुहार।
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राजस्थान में सदियों से जंगलों को अपना घर मानने वाले आदिवासी परिवारों के लिए वन अधिकार कानून 2006 उम्मीद की किरण बनकर आया था। लेकिन, प्रदेश में इसकी तस्वीर अच्छी नहीं है। फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 66,213 आदिवासियों के आवेदन सरकार ने खारिज कर दिए।
इसका सीधा अर्थ है कि हजारों परिवार अब अपनी ही पुश्तैनी जमीन पर अतिक्रमी माने जाने के डर में जीने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि जयपुर, अलवर और टोंक जैसे 5 जिलों में तो एक भी आदिवासी को वन अधिकार पट्टा नसीब नहीं हुआ।
जंगल सिर्फ जमीन नहीं
आदिवासी समुदाय के लिए जंगल महज एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि उनकी आजीविका और पहचान का प्राथमिक स्रोत भी है। उनकी पूरी अर्थव्यवस्था लघु वनोपज, पशुपालन और पारंपरिक खेती पर टिकी होती है।
प्रतापगढ़ जैसे जिलों में सबसे अधिक 33244 आवेदन आए, लेकिन वहां 22 हजार से अधिक परिवारों के दावों को खारिज कर दिया गया। प्रतापगढ़ प्रदेश का सर्वाधिक आदिवासी क्षेत्र माना जाता है। एक आदिवासी नेता के अनुसार हमारे लिए कानून का क्रियान्वयन धरातल पर जटिल और चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
समीक्षा भी नहीं करेगी सरकार
सबसे अधिक चिंताजनक पहलू सरकार का वह रुख है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि इन खारिज किए गए आवेदनों पर अब फिर से विचार नहीं किया जाएगा। हाल ही में सीकर सांसद अमराराम के सवाल पर केंद्र सरकार ने जवाब में बताया है कि राजस्थान सरकार वर्तमान में खारिज किए गए आवेदनों की समीक्षा का कोई विचार नहीं रखती।
भारतीय ट्राईबल पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष वेलाराम का आरोप है कि सरकार का यह रवैया उन हजारों आदिवासियों के लिए दरवाजे बंद करने जैसा है, जो प्रशासनिक जटिलताओं या दस्तावेजी साक्ष्यों की कमी से अपना हक साबित नहीं कर पाए। महाराष्ट्र में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए खारिज दावों को दोबारा खोलने के उपाय किए हैं। लेकिन, हमारी राजस्थान सरकार ने आदिवासी वर्ग में असुरक्षा और बेदखली का भय पैदा कर दिया है।
संविधानिक अधिकार का हनन
वेलाराम कहते हैं कि हजारों आदिवासी परिवार अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। परंपराएं और संस्कृति प्रकृति से जुड़ी हैं। ऐसे में उन्हें उनकी जमीन से बेदखल करना या उन्हें कानूनी मालिकाना हक न देना उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
वेलाराम के अनुसार सरकार इन खारिज किए गए दावों की निष्पक्ष और पारदर्शी समीक्षा नहीं करती है तो यह वन अधिकार कानून की मूल भावना को कमजोर करेगा। साथ ही आदिवासियों को उनके प्राकृतिक संसाधनों से दूर कर उन्हें गरीबी और विस्थापन की आग में झोंक देगा।
ऐसी है खारिज पट्टों की स्थिति
आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी बाहुल्य जिलों में आवेदनों की संख्या और पट्टे वितरण की दर सर्वाधिक है। जबकि अन्य जिलों में कम है।
प्रतापगढ़ जिले में प्रदेश के सबसे ज्यादा 33244 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें से केवल 10223 को मंजूरी मिली और 22568 आवेदन खारिज कर दिए। इसी तरह बांसवाड़ा में 28435 आवेदन आए। इनमें से 15551 को पट्टे दिए और 12650 को रद्ध कर दिया है।
उदयपुर में 22533 आवेदनों में से 12758 को हक मिला। इसके उलट 9775 आवेदन खारिज हुए। डूंगरपुर में 13063 आवेदनों में से 6599 को पट्टे मिले और 6,464 खारिज हुए। बारां जिले में 8925 आवेदन प्राप्त हुए थे। इनमें से मात्र 1581 स्वीकृत हुए तथा 7344 खारिज हुए। सिरोही में 5768 आवेदनों में से 3422 को मंजूरी मिली।
चित्तौड़गढ़ में 1156 आवेदनों में से 457 को पट्टे मिले। राजसमंद में 1083 आवेदनों में से 260 , पाली में 1546 में से 614 और भीलवाड़ा में 534 आवेदन में से 122 स्वीकृत हुए। इसी तरह कोटा में 433 आवेदन में से 86, झालावाड़ में 302 आवेदन में से 88 और बूंदी में 567 आवेदन में से केवल 14 आवेदन मंजूर हुए हैं।
शून्य पट्टा वितरण वाले जिले
प्रदेश के पांच जिलों अलवर में 528, टोंक में 245, सवाई माधोपुर में 121, जयपुर में 98 और धौलपुर में 94 आवेदनों को खारिज कर दिया है। यानी इन जिलों में कोई भी पट्टा नहीं दिया गया। वेलाराम का कहना है कि हम कानून के तहत अपने हक की लड़ाई लडेंगे, लेकिन सरकार को मानवीय दृष्टिकोण अपनाकर खारिज आवेदनों पर दोबारा विचार करना चाहिए।
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