विधायक का टकराव, रसूख पर चला कानून का डंडा, सांवलिया की श्रद्धा ने तोड़े रिकॉर्ड
यह सप्ताह राजस्थान के लिए विवादों, विरोधाभासों और व्यवस्थागत चुनौतियों से भरा रहा। जहां एक ओर जनता की प्यास बुझाने की जिम्मेदारी निभाने वाले जन-प्रतिनिधि और अधिकारी आपस में उलझ गए, वहीं दूसरी ओर सत्ता के रसूख का मुखौटा पहनकर जमीनों पर कब्जे करने वालों पर कानून का डंडा चला। पुलिस महकमे के भीतर से आई दो अलग-अलग कहानियों ने विभाग की छवि पर सवालिया निशान लगाए तो वहीं सांवलिया सेठ के दरबार में उमड़ी श्रद्धा ने अर्थव्यवस्था और आस्था के नए कीर्तिमान स्थापित किए।
प्यास, थप्पड़ और मर्यादा
श्रीगंगानगर की भीषण गर्मी में जब नल सूखे पड़े हैं, तब वहां के विधायक सेवा केंद्र में जो हुआ, उसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार कर दिया। भाजपा विधायक जयदीप बिहानी और RUIDP के अधिकारी जगनलाल बैरवा के बीच हुआ विवाद अब केवल मारपीट का मामला नहीं, बल्कि दो व्यवस्थाओं (विधायिका बनाम कार्यपालिका) के टकराव का प्रतीक बन गया है।
विधायक बिहाणी का आरोप है कि जनता की पेयजल समस्या के समाधान के लिए बुलाई गई बैठक में अधिकारियों ने न केवल सहयोग से इनकार किया, बल्कि उन पर हमला भी किया। उनका चश्मा टूटना और थप्पड़ खाने का दावा एक निर्वाचित प्रतिनिधि की सुरक्षा और सम्मान पर गंभीर प्रश्न उठाता है।
इस पर सहायक अभियंता जगनलाल बैरवा ने जो आरोप लगाए हैं, वे अधिक गंभीर हैं। उन्होंने न केवल विधायक पर मारपीट का आरोप लगाया, बल्कि इसे जातिसूचक गालियों और पूर्व-नियोजित साजिश से भी जोड़ा। बैरवा का लहूलुहान होना और आंख में गंभीर चोट आना इस मामले को एससी/एसटी एक्ट की दिशा में ले जाता दिख रहा है।
मुख्यमंत्री के कथित साले पर कानूनी शिकंजा
जयपुर के मानसरोवर में सत्ता की हनक दिखाकर जमीनों पर कब्जा करने वाले प्रमोद शर्मा का मामला पॉवर करप्शन का बड़ा उदाहरण है। खुद को मुख्यमंत्री का साला बताकर जमीनों के फर्जी कागजात तैयार करना और फिर उन पर कब्जा करना राज्य में भू-माफियाओं के दुस्साहस को दर्शाता है।
हाई कोर्ट द्वारा प्रमोद शर्मा की एफआईआर निरस्त करने की याचिका को खारिज करना स्वागत योग्य कदम है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि धोखाधड़ी और रसूख का इस्तेमाल किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मानसरोवर मेट्रो स्टेशन जैसी प्राइम लोकेशन की जमीन पर कब्जा करना यह बताता है कि अपराधियों को प्रशासन का भय नहीं था।
एफआईआर के एक साल बाद नोटिस थमाना पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाता है। क्या पुलिस राजनीतिक दबाव में थी? अब जब हाई कोर्ट ने सुरक्षा देने से मना कर दिया है तो यह देखना दिलचस्प होगा कि पुलिस अंडरग्राउंड हुए आरोपी को कितनी जल्दी सलाखों के पीछे लाती है।
दो आईपीएस, दो उलझने
राजस्थान पुलिस की साख इस सप्ताह दो बड़े अधिकारियों के आचरण के कारण चर्चा में रही। मानवाधिकारों की रक्षा के लिए नियुक्त आईजी स्तर के अधिकारी IPS किशन सहाय मीणा पर रेप के गंभीर आरोप लगे हैं। दरअसल, एक 53 वर्षीय महिला ने पुलिस अधिकारी पर शादी का झांसा देकर शोषण और मारपीट का आरोप लगाया है। आईजी मीणा इसे षड्यंत्र बता रहे हैं। चूंकि आरोपी एक उच्च पदस्थ अधिकारी है, इसलिए जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।
दूसरी ओर, एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग जैसे संवेदनशील विभाग के प्रमुख और आईजी कालूराम रावत का साढ़े तीन महीने तक लापता रहना प्रशासनिक ढिलाई की पराकाष्ठा है। बुखार का एक मैसेज भेजकर महीनों तक गायब रहना और नए पद पर जॉइन न करना यह संकेत देता है कि शायद अधिकारी अपनी नई पोस्टिंग से खुश नहीं थे या फिर कोई अन्य व्यक्तिगत/स्वास्थ्य संबंधी गंभीर कारण है। एक आईपीएस का इस तरह संपर्क विहीन होना सुरक्षा के नजरिए से भी चिंताजनक है।
श्री सांवलिया जी का रिकॉर्ड चढ़ावा
चित्तौड़गढ़ जिल में स्थित श्रीसांवलिया सेठ मंदिर ने इस वर्ष 337 करोड़ रुपये के चढ़ावे के साथ इतिहास रच दिया है। यह आंकड़ा केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि राजस्थान के धार्मिक पर्यटन की मजबूती का भी सूचक है। इतनी बड़ी राशि का प्रबंधन मंदिर ट्रस्ट के लिए बड़ी जिम्मेदारी है।
यह धन क्षेत्र के विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में किस प्रकार विनियोजित होता है, यह आने वाले समय में चर्चा का विषय रहेगा। भक्तों का बढ़ता विश्वास और पारदर्शिता के लिए मशीनों का उपयोग आधुनिक मंदिर प्रबंधन का अच्छा उदाहरण है।
सीकर में 'दुर्घटनाओं' का फर्जीवाड़ा
सीकर, चूरू और झुंझुनूं जैसे जिलों में सक्रिय एक्सीडेंट क्लेम गिरोह का खुलासा होना बीमा क्षेत्र की बड़ी सर्जरी है। सीबीआई द्वारा 17 लोगों पर केस दर्ज करना यह साबित करता है कि यह घोटाला केवल कुछ एजेंटों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें इंश्योरेंस कंपनी के बड़े अधिकारियों की भी 'मौन सहमति' या सक्रिय भागीदारी थी।
बताया जाता है कि गिरोह वाहन मालिकों को पता चले बिना उनके नाम पर क्लेम उठाते थे। एक ही गाड़ी का साल में 3 बार एक्सीडेंट दिखाया गया। इस मामले में सर्वेयर, वर्कशॉप और बीमा अधिकारियों का त्रिकोणीय गठजोड़ साफ दिखता है। सीबीआई की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, कई और सफेदपोश चेहरों के बेनकाब होने की संभावना है। यह मामला बीमा कंपनियों को अपने क्लेम वेरिफिकेशन सिस्टम को पूरी तरह डिजिटल और फुल-प्रूफ बनाने की चेतावनी देता है।
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